युद्ध में शत्रुबोध है आवश्यक

जनरल रावत कोई राजनेता नहीं थे कि कोई उनका समर्थक और कोई उनका विरोधी होता। वे एक पत्रकार नहीं थे जिनके व्यूज के लिए कोई उनको पसंद या नापसंद करता। वे एक सेलिब्रिटी नहीं थे जिन्हें एडमायर या क्रिटिसाइज किया जाता।

वे सैनिक थे, भारत की सशस्त्र सेनाओं के प्रमुख थे। उनका एक ब्रिलियंट सैनिक रिकॉर्ड था। उनके नेतृत्व में भारतीय सेनाओं ने सफलताएँ पाई थीं, देश और सेना का मनोबल ऊँचा हुआ था। वे किसी एक समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करते थे, बल्कि हमारी सेना का नेतृत्व करते थे जो सभी की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। फिर भी अगर कोई उनकी असमय मृत्यु पर हर्ष प्रकट कर रहा है तो उसके पीछे क्या कारण हो सकता है? जनरल रावत से तो किसी की दुश्मनी नहीं हो सकती, जो दुश्मनी है भारत की सेना से है, भारत राष्ट्र से है। उनकी मृत्यु पर खुशी मनाना कहीं से भी एक व्यक्तिगत ओपिनियन का विषय नहीं हो सकता। यह खुला राष्ट्रद्रोह है।

जो भी व्यक्ति, समूह, विचारधारा इस अवसर पर अपने आप को एक्सपोज़ कर रहे हैं, उन्हें पहचानें, हम युद्ध में हैं, और युद्ध में शत्रु बोध आवश्यक है।

आपकी बात याद रहेगी जनरल, हम दो और आधे मोर्चे पर लड़ रहे हैं। दो मोर्चे वर्दी वाली फौजें संभालेगी… पर यह आधा मोर्चा हमारा है, और यह वादा है जनरल… इस मोर्चे पर हमारे हाथ नहीं कांपेंगे। हम आम जनता जिनके लिए आप अपना सर्वोच्च बलिदान देते हैं, हम प्रतिज्ञा करते हैं कि देश के सम्मान को झुकने नहीं देंगे, देश की अखंडता पर आंच नहीं आने देंगे।

असहनीय पीड़ा, क्षोभ, गुस्से और दुख के साथ ॐ शांति, वंदे मातरम

आपकी प्रतिक्रिया...