उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में घमासान

बीजेपी के रणनीतिकार लोहिया के  जाति तोड़ो  के उस नारे को मूर्त रुप देने में जुटे हैं जो सपा और बसपा सहित लगभग सभी राजनीतिक दलों ने अपना आधार बना रखा है। उत्तर प्रदेश में अगर यह प्रयोग सफल रहा तो देश की राजनीतिक दिशा और दशा तो बदलेगी ही साथ ही तमाम राजनीतिक दलों को बदलती राजनीति का अंग बनना पड़ेगा।

चुनाव आयोग की चुनावों की घोषणा के बाद उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में विधान सभा चुनाव के लिए राजनीतिक दलों में उठापटक और जोड़ तोड़ धीरे धीरे चरम पर पहुंच रही है। उत्तर प्रदेश में 7 तो उत्तराखंड में 1 चरण में मतदान होगा। यूपी में 10 फरवरी को पहले चरण का मतदान होगा तो 7 मार्च को सातवें और अंतिम चरण का। परिणाम 10 मार्च को आएगा।

उत्तर प्रदेश में तो दो मंत्रियों स्वामी प्रसाद मौर्य और धर्म सिंह सैनी सहित 8 विधायक भारतीय जनता पार्टी को छोड़ कर  मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की मौजूदगी में समाजवादी पार्टी में शामिल होकर ताल ठोक रहे हैं। स्वामी प्रसाद मौर्य तो दावा कर रहे हैं कि जिस तरह से बहुजन समाज पार्टी को त्याग कर उन्होंने मायावती को राज्य की राजनीति में पटकनी दी थी। इस बार वही हाल बीजेपी और वर्तमान मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ का होने वाला है। इन सभी नेताओं ने पिछड़ा वर्ग और दलित वर्ग की उपेक्षा का आरोप भी योगी आदित्यनाथ की सरकार पर मढ़ा है। आने वाले दिनों टिकट बंटवारे की सूची घोषित होने के बाद बीजेपी से कुछ और मंत्री विधायक या दूसरे नेता सपा का दामन थाम सकते हैं। सपा से भी बीजेपी में कुछ बड़े नाम अंतिम मौके पर आ सकते हैं। इन सब के पीछे असली कारण बदले हुए राजनीतिक समीकरण हैं जिससे कई नेताओं को अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए दल बदल को मजबूर हैं। एक और बड़ा कारण यह भी है कि प्रचंड बहुमत पाने के बाद से उत्तर प्रदेश में जिस अन्य पिछड़ा वर्ग, दलित और ब्राह्मण समाज को जोड़ कर बीजेपी ने सामाजिक गठबंधन का नाम 2017 में दिया था, उसमें भी काफी हद तक दरकन आई है। एक एक करके छोटे दल बीजेपी को छोड़ते रहे उनको जोड़ने का प्रयास पूरी शिद्दत के साथ नहीं किया गया। जिस समय यह सब हो रहा था समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव अन्य पिछड़ा वर्ग के नेताओं से संपर्क साध कर अपने पाले में करने की रणनीति तैयार करते रहे। वैसे भी पश्चिम उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन के कारण बीजेपी से जाट वोट बैंक का एक बड़ा हिस्सा टूटता दिख रहा था। साथ ही राष्ट्रीय लोक दल के अध्यक्ष जयंत चौधरी के साथ सीटों का बंटवारा करके अखिलेश यादव ने बीजेपी विरोधी वोटों के बंटवारे को रोकने की चाल चल दी है इसके दूरगामी परिणाम भी होंगे। समाजवादी पार्टी ने शिवपाल यादव की प्रगतिशील समाजवादी पार्टी, ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा के साथ ही जनवादी सोशलिस्ट पार्टी, महान दल, अपना दल कमेरा वादी और एनसीपी से गठबन्धन किया है। क्षेत्रीय और जातिगत समीकरण साधने के लिए अखिलेश यादव का यह बड़ा दांव हो सकता है। अखिलेश यादव दावा कर रहे हैं कि इस बार बीजेपी को मात देकर वे मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी दोनों को हरा देने वाला गठबंधन बना चुके हैं। जो सामाजिक न्याय के लिए लड़ रहा है। अखिलेश यादव हिंदू समाज को जोड़ने के लिए कृष्ण और राम का सहारा भी लेने से नहीं चूक रहे। उसी हद तक जहां तक उनका मुस्लिम वोट बैंक नाराज नहीं हो। वास्तव में यूपी में समाजवादी पार्टी का दांव मुस्लिम, यादव के साथ अन्य पिछड़ा वर्ग पर आ टिका है।

उधर भारतीय जनता पार्टी को अपने उन कामों पर अधिक भरोसा दिख रहा है जो उत्तर प्रदेश के सामाजिक और आर्थिक विकास को नई दिशा देते हैं। उत्तर प्रदेश में बीजेपी योगी और मोदी के चेहरे पर ही चुनाव मैदान में है। बीजेपी के रणनीतिकार लोहिया के  जाति तोड़ो  के उस नारे को मूर्त रुप देने में जुटे हैं जो सपा और बसपा सहित लगभग सभी राजनीतिक दलों ने अपना आधार बना रखा है। उत्तर प्रदेश में अगर यह प्रयोग सफल रहा तो देश की राजनीतिक दिशा और दशा तो बदलेगी ही साथ ही तमाम राजनीतिक दलों को बदलती राजनीति का अंग बनना पड़ेगा। उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ कहते हैं कि वंशवाद और परिवारवाद की राजनीति करने वाले सामाजिक न्याय के समर्थक नहीं हो सकते। सपा सरकार के समय माफिया, अपराधी, कब्जा, दलित उत्पीड़न, अपराधियों को संरक्षण देने का भी आरोप लगाते हैं। वास्तव में बीजेपी से जाने वाले लोग वही हैं जो अपने परिजनों के लिए भी टिकट चाहते थे या फिर मुस्लिम यादव वोट बैंक के कारण उनको चुनाव जीतना संभव नहीं लग पाया था। गरीबों को घर, शौचालय, कोविड काल में मुफ्त राशन, माफिया के ख़िलाफ़ कार्रवाई, राम मंदिर निर्माण, काशी विश्वनाथ कारीडोर, यूपी को बिगड़ी आर्थिक स्थिति से निकाल कर विकास के मार्ग पर लाने के दावे किए जा रहे हैं। साथ ही कानून व्यवस्था को दुरुस्त करने बेटियों को सुरक्षित रखने, दंगा मुक्त प्रदेश बनाने का भी बीजेपी प्रचार कर रही है। यूपी के लोगों के मन में यह बात बैठा दी गई है कि यदि बीजेपी के स्थान पर कोई दूसरा दल आता है तो बहू बेटियों की अस्मत से खिलवाड़ करने से, दंगाई, माफिया और विकास कार्यों में लूट खसोट करने वाले फिर हावी हो जायेंगे। केंद्र सरकार द्वारा शुरू की प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की गरीबों को बिजली, गैस , पानी, बैंक खाते, जिलावार , तमाम उद्योगों को जो अलग अलग वर्ग को आर्थिक विकास में सहायक होते हैं। राज्य में रक्षा सामग्री निर्माण के लिए एक क्षेत्र विकसित करना ऐसी बातें हैं जो उत्तर प्रदेश में जाती और क्षेत्र की राजनीति को तोड़ कर नया संदेश दे सकती हैं। यदि बीजेपी अपने जमीनी कार्यकताओं के माध्यम से मतदाताओं में यह बात बैठा पाएगी तो वह पुनः सत्ता में आ सकती है। क्योंकि कांग्रेस भी जातिगत समीकरण को साधने के साथ हों महिलाओं पर अधिक ध्यान केंद्रित कर रही है। प्रियंका गांधी ने बेटी हूं लड़ सकती हूं के माध्यम है और लगातार बीजेपी सरकार के खिलाफ यूपी में सक्रिय रह कर कांग्रेस को चर्चा में तो ला ही दिया है। उधर बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने अपने पत्ते अभी तक नहीं खोले हैं। दलित और मुस्लिम वर्ग के एक हिस्से पर आज भी उनकी पकड़ है। बीएसपी के सतीश चंद्र मिश्रा ने भी अधिकतम ध्यान ब्राह्मण वोटों पर ही लगाया है। ए आई एम आई एम के असदुद्दीन ओवैसी के सक्रिय होने से कारण मुस्लिम बंट सकता है। कुल मिला कर इस बार उत्तर प्रदेश में मुकाबला दिलचस्प और कड़ा होने वाला है। टिकटों के बंटवारे के बाद बनते बिगड़ते समीकरण भी चुनाव को प्रभावित करेंगे। सपा मुखिया अखिलेश यादव को इसका अहसास है। वे कह भी चुके हैं कि कुछ इधर से भी जा सकते हैं। बीजेपी को यह सुकून है कि उसका मूल काडर और नेता एकजुट हैं दलबदल उन्हीं ने किया है पहले भी ऐसा करते रहे हैं। दुर्भाग्य से उत्तर प्रदेश की राजनीति का नंगा सच आजादी के बाद से ही यही रहा है कि जाति और धर्म को वोटबैंक बना कर रखा गया। पिछले दस साल की बात करें तो समाजवादी पार्टी के पर यादव और मुस्लिम वाद के का आरोप लगा। बीजेपी पर इस बार ठाकुरवाद और हिंदू एजेंडे का आरोप है। इन सब के बीच आने वाले दिनों में बहुत से आरोप प्रत्यारोप लगने वाले हैं। हां पहली बार ऐसा हो रहा है कि पांच साल मुख्य मंत्री रहे योगी आदित्यनाथ और उनकी सरकार भी भ्रष्ट्राचार और कदाचार के आरोप कट्टर राजनीतिक विरोधी भी नहीं लगा पा रहे हैं। यह योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार के लिए उपलब्धि मानी जाएगी। फिलहाल यूपी में योगी आदित्यनाथ के कड़े फैसले लेने, दो टूक साफ साफ बात कहने, धार्मिक तुष्टिकरण से दूर रहने, अपराधियों से कड़ाई से निपटने, किसी भी तरह के दबाव में नहीं आने के साथ ही सबके लिए सहज उपलब्ध होने का जो प्रभाव जन मानस पर पड़ा है वह बीजेपी को बढ़त दिलाता नजर आ रहा है। बीजेपी का यह भी दावा है कि केंद्र की योजनाओं को लागू करने में धर्म और जाति बाधा नहीं बनी है। इसके कारण और तीन तलाक के मामले में मुस्लिम आबादी का एक हिस्सा भी बीजेपी के साथ दिख रहा है।
उत्तराखंड में सत्तारूढ़ बीजेपी और मुख्य विपक्ष में बैठी कांग्रेस के बीच आम आदमी पार्टी ने कूद कर चुनाव को दिलचस्प बना दिया है। उत्तराखंड में 14 फरवरी को सभी सीटों पर मतदान होगा। इसके पहले जब उत्तराखंड राज्य के गठन के बाद 14 फरवरी को मतदान हुआ था तो बीजेपी बुरी तरह हार गई थी। दोनों दलों में गुटबाजी है। कांग्रेस में अधिक है। कारण पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत अपना वर्चस्व कायम करना चाहते हैं ताकि उनके अधिक से अधिक समर्थक टिकट पाकर चुनाव में सफल हों और कांग्रेस के हाथ सत्ता लगने पर मुख्य मंत्री पद के लिए उनके अतिरिक्त कोई विकल्प ही नहीं रह जाए। चुनाव संचालन समिति की बागडोर इसी लिए उन्होंने अपने हाथ में ले ली है। हालांकि जिन गणेश गोदियाल को हरीश रावत ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनवा रखा है, वे रावत के खास माने जाते रहे हैं। बदलते राजनीतिक समीकरण में वे खुद को गुटबाजी में फंसा पा रहे हैं। पिछले पांच सालों में उत्तराखंड कांग्रेस में जो चेहरा सबसे अधिक प्रभावित उभर कर सामने आया है। वह है विधान सभा में विपक्ष के नेता प्रीतम सिंह का। प्रीतम सिंह ने विषम परिस्थितियों में जिस तरह से बहुत कमजोर हो चुकी कांग्रेस को पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद फिर से खड़ा करने का अभियान चलाया था उसके कारण ही वे कांग्रेस हाई कमान की पसंद बनते जा रहे थे। खुद को पंजाब के प्रभारी के झमेले से निकाल कर हरीश रावत का फिर से खुद को उत्तराखंड में केंद्रित करने का एक बड़ा कारण भी यही माना जाता है। ताकि सत्ता मिलने पर सारे मोहरे उनके पक्ष में हों। लेकिन पंगा यह है कि कांग्रेस संगठन में जिलों में प्रीतम सिंह के समर्थक गढ़वाल मंडल में बहुत मजबूत हैं। गढ़वाल मंडल में 41और कुमाऊं मंडल में 29विधान सभा क्षेत्र आते हैं। उत्तराखंड की राजनीति में सबसे बड़ा चेहरा हरीश रावत ही हैं। अभी तक उत्तराखंड की राजनीति ठाकुर और ब्राह्मण वोटों पर ही निर्भर करती रही है। बीजेपी और कांग्रेस दोनों दलों में इस वर्ग के समर्थक हैं जो एक बार कांग्रेस और एक बार बीजेपी को सत्ता सौंप कर अपनी अहमियत का अहसास कराता रहा है। बीजेपी में भी गुटबाजी है लेकिन मुखर होकर कोई सामने नहीं आया। प्रचंड बहुमत के बाद पांच साल में तीन मुख्य मंत्री बदलना उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है। हालांकि पुष्कर सिंह धामी ने मुख्य मंत्री बनने के बाद मिले 9 महीनो में जिस तरह से फैसले लिए। बड़े विवादों को सुलझाया। आंगन वाडी कार्यकर्ती , आशा कार्यकर्ती , ग्राम प्रधानों, पीआरडी जवान, गार्ड के मानदेय बढ़ाकर, पुलिस ग्रेड पे में राहत देकर, सरकारी कर्मचारी संगठनों की मांगे मान कर, कोरोना वारियर्स कर्मचारियों को प्रोत्साहन राशि देने जैसे तमाम फैसले कर अपनी अलग पहचान बनाई है। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष जे पी नड्डा सहित केंद्रीय नेताओं और आर एस एस की भी शाबाशी हासिल की है। यह धामी और बीजेपी के लिए चुनाव में लाभ का सौदा हो सकता है। रही बात आम आदमी पार्टी की तो वह कहीं कांग्रेस और कहीं बीजेपी को हराने की भूमिका निभा सकती है।
उत्तराखंड में बसपा और सपा के वोट बैंक को आम आदमी पार्टी अपने साथ जोड़ सकती है और दोनों मुख्य दलों के कुछ मतदाताओं को भी प्रभावित कर सकती है। उत्तराखंड के क्षेत्रीय दल यू के डी के पास खोने को कुछ नहीं बचा है। वह एक सीट भी जीत लेती है तो उसके लिए लाभ का सौदा होगा यह विधान सभा चुनाव। कुल मिला कर अभी तक बीजेपी का पलड़ा भारी दिख रहा है। इस विधान सभा चुनाव से एक बात और साफ हो रही है कि बीजेपी से सभी राजनीतिक दलों को अपने अस्तित्व के लिए बढ़ता खतरा नजर आने लगा है। इसलिए महाराष्ट्र से शरद पवार भी यूपी में रुचि दिखा रहे हैं। मौकापरस्त दलबदलुओं के लिए भी यह चुनाव क्या इतिहास लिखेगा, इसका इंतजार 10 मार्च तक सभी को रहेगा।

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