स्वतंत्रता संग्राम में योगदान

1857 के स्वतंत्रता संग्राम के पश्चात पहाड़ी रियासतों में जन आक्रोश बढ़ता जा रहा था। हिमाचल में भी राजनीतिक चेतना का विकास दिखाई देने लगा था। छोटी-बड़ी रियासतों में बंटे हिमाचलवासी अंग्रेजों के पिट्ठू राजाओं से अपने अधिकारों की मांग करने लगे थे, साथ ही उनके अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठाने लगे थे।

हिमाचल प्रदेश को देवभूमि व वीरभूमि कहा जाता है। हिमाचल प्रदेश के वीरों ने स्वतंत्रता संग्राम में बढ़-चढ़ कर भाग लिया। गोरखों-अंग्रेजों के बीच 1814-15 में हुए युद्ध में गोरखों की पराजय हुई। युद्ध के उपरांत हुई संधि के फलस्वरूप सतलुज घाटी और शिमला की पहाड़ी रियासतों पर अंग्रेजों का स्वामित्व हो गया। सिक्खों और अंग्रेजों के बीच प्रथम युद्ध 1845 में आरंभ हुआ। उसका अंत मार्च, 1846 में लाहौर की संधि से हुआ। इस संधि के कारण कांगड़ा की पहाड़ी रियासतें और कुल्लू एवं लाहौल-स्पीति अंग्रेजों के अधीन हो गए। यहां के राजाओं ने इस अवसर पर अंग्रेजों का साथ दिया। परिणामस्वरूप अंग्रेजों ने उन्हें जागीरें देकर उनकी रियासतों को अंग्रेजी साम्राज्य में मिला लिया। अब यहां जनता एक तरफ अंग्रेजों के अत्याचार तो दूसरी ओर राजाओं के शोषण से पीड़ित थी। इस पहाड़ी राज्य की जनता की प्राथमिकता केवल अंग्रेजों से स्वतंत्रता ही नहीं बल्कि रजवाड़ाशाही से भी छुटकारा पाना थी।

1848-49 में कांगड़ा जनपद के विस्थापित शासकों तथा प्रथम सिख गुरु नानक देव के वंशज ऊना के विक्रम सिंह बेदी ने अंग्रेजों की कुटिल नीति के विरोध में विद्रोह किया। इसी समय तत्कालीन नूरपुर राज्य के वजीर राम सिंह पठानिया ने 1857 में लड़े गए प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से 9 वर्ष पूर्व अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह कर पर्वतीय राज्यों में स्वतंत्रता की अलख जगाई थी।

1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम ने अंग्रेजी सत्ता की नींव को हिलाकर रख दिया था। हिमाचल प्रदेश में भी इस संग्राम की गूंज सुनाई दी थी। इस क्रान्ति में पहाड़ी जनता ने बढ़-चढ़ कर भाग लिया। हिमाचल प्रदेश में कम्पनी सरकार के विरुद्ध क्रान्ति की पहली चिंगारी 20 अप्रैल, 1857 को कसौली की पुलिस चौकी में भड़की। इस क्रान्ति में बुशहर के राजा शमशेर सिंह, कुल्लू (सिराज) के युवराज प्रताप सिंह, सुजानपुर के राजा प्रताप चन्द तथा अन्य रियासतों के असंतुष्ट शासकों व पहाड़ी जनता ने अंगे्रजों के विरुद्ध संघर्ष किया। इस क्रान्ति का व्यापक प्रभाव शिमला, नालागढ़, सिरमौर, कांगड़ा, कुल्लू, लाहौल, चम्बा व मण्डी-सुकेत में रहा। कुल्लू (सिराज) के युवराज प्रताप सिंह उसके मुख्य सलाहकार वीर सिंह, साथी सरदूल, कांशी, थुला राम, मानदास, सूरत राम, केशव राम, देवीदत्त व अन्य क्रान्तिकारियों पर अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध तख्ता पलटने और राजद्रोह का अभियोग लगाया गया। युवराज प्रताप सिंह तथा वीर सिंह को धर्मशाला में 3 अगस्त, 1857 को फांसी दे दी गई। इस महान क्रान्ति में हिमाचल के 50 देशभक्तों को फांसी की सजा, 500 को जेल तथा 30 आन्दोलनकारियों को देश निकाला दिया गया था।

1857 के स्वतंत्रता संग्राम के पश्चात पहाड़ी रियासतों में जन आक्रोश बढ़ता जा रहा था। हिमाचल में भी राजनीतिक चेतना का विकास दिखाई देने लगा था। छोटी-बड़ी रियासतों में बंटे हिमाचलवासी अंग्रेजों के पिट्ठू राजाओं से अपने अधिकारों की मांग करने लगे थे, साथ ही उनके अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठाने लगे थे। 1859 में बुशहर रियासत के दूम्म किसान आंदोलन, 1862 में सुकेत रियासत का जन आंदोलन व 1876 का दूसरा जन आन्दोलन, सिरमौर रियासत की पालवी तहसील में 1870-74 जन आन्दोलन, 1876-77 नालागढ़ में किसान आन्दोलन, बिलासपुर में 1883 का झुग्गा जन सत्याग्रह, 1895 में चंबा का किसान आंदोलन, 1897 में बाघल रियासत में भूमि आन्दोलन, 1897 में क्योंथल भूमि आन्दोलन, 1898 में ठियोग और बेजा रियासत में, आन्दोलन व बाघल रियासत, डोडरा-क्वार, मण्डी व कुनिहार यह सभी आंदोलन इस बात के परिचायक थे कि जनता अब अंग्रेजों और राजा-राणाओं की गुलामी से मुक्त होना चाहती थी।

19वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में हिमाचल प्रदेश के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों की प्रजा में राजनीतिक जागृति और गतिशीलता स्पष्ट दिखाई देती थी। इनमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, आर्य समाज, ब्रह्मा समाज व सनातन धर्म सभा आदि संस्थाओं ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। ऊना के प्रमुख देशभक्त बाबा लक्ष्मण दास आर्य ने 1905 में पुलिस की नौकरी छोड़ कर अपनी पत्नी दुर्गाबाई आर्य के साथ राष्ट्रीय आंदोलन में प्रवेश किया। लाला लाजपत राय और महात्मा हंसराज से मार्गदर्शन प्राप्त कर ऊना में उन्होंने अपनी गतिविधियां चलाईं। ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध गतिविधियों के जुर्म में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 2 वर्ष तक लाहौर जेल में रखा गया। 1910 में रिहा होकर वे पुन: ऊना आए और प्रजा में जागृति लाकर स्वतंत्रता के लिए कार्य करते रहे। 1912 में मंडी के राजा भवानी सिंह की मृत्यु के पश्चात उनकी विधवा रानी ललिता कुमारी जिन्हें रानी खैरगढ़ी के नाम से जाना जाता है, ने राज वैभव त्याग कर देश की आजादी के लिए क्रांति की राह अपनाई। 1913 में मंडी के हरदेव राम जो बाद में स्वामी कृष्णानंद के नाम से प्रसिद्ध हुए अध्यापक की नौकरी छोड़कर गदर पार्टी में शामिल हो गए और देश के कई स्थानों पर गदर पार्टी में सक्रिय भूमिका निभा कर इन्होंने स्वतंत्रता के संघर्ष में महत्वपूर्ण योगदान दिया। दिसम्बर 1914 में मंडी से भाई हिरदाराम अमृतसर में बम बनाने में सिद्धहस्त हुए। फरवरी 1915 में वे अन्य क्रांतिकारी नेताओं के साथ पकड़े गए। उनके पास बम भी बरामद हुए। जिसके कारण भाई हिरदाराम को आजीवन कारावास के रूप में काले पानी की सजा देकर अंडमान भेज दिया। म.गांधी के प्रभाव से हिमाचल के बाबा लक्ष्मण दास आर्य और दुर्गाबाई आर्य ने कांग्रेस में प्रवेश किया। कांगड़ा के पंचम चंद कटोच, लाला बासी राम, कांशी राम, नाहन से चौधरी शेरजंग और पंडित राजेंद्र दत्त आदि देशभक्तों ने कांग्रेस के झंडे तले इकट्ठा होकर स्वतंत्रता में संग्राम में अपने आपको समर्पित किया।

17 दिसंबर, 1927 को मुंबई में अखिल भारतीय देसी राज्य लोक परिषद का गठन किया गया। इस परिषद के प्रस्ताव से प्रभावित होकर सिरमौर के जागरूक देश प्रेमियों ने राजनीतिक आंदोलन की योजना बनाई और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए हिमाचल की प्रथम ‘प्रजा मंडल’ संस्था का गठन किया। बाद में अन्य रियासतों में भी इसकी स्थापना हुई। प्रजा मंडल संगठन का हिमाचल प्रदेश में स्वतंत्रता आंदोलन को गतिशील तथा सफल बनाने में उल्लेखनीय योगदान रहा है। मार्च 1937 में गढ़-दी-वाला, जिला होशियारपुर में कांग्रेस की पॉलिटिकल कॉन्फ्रेंस हुई। इस कॉन्फ्रेंस में बाबा कांशी राम को ‘पहाड़ी गांधी’ की उपाधि देकर सम्मानित किया गया।

16 जुलाई, 1939 को हिमालयी रियासत प्रजामंडल तथा धामी प्रजा मंडल के सदस्यों का एक शिष्टमंडल भागमल सौहटा के नेतृत्व में राजा धामी से मिलने हलोग गया। हलोग पहुंचने तक यह शिष्टमंडल लगभग 150 लोगों के जुलूस में बदल गया। हलोग में धामी पुलिस ने लोगों पर गोलियां चलाईं और पत्थर बरसाए। जिससे मन्देआ गांव का दुर्गा दास तथा टन्गोरा का उमादत्त गोली लगने से शहीद हो गए और 80 से 90 लोग घायल हुए।

अक्टूबर, 1942 में सिरमौर रियासत के गिरीपार के कुछ जागरूक किसानों ने किसान सभा का गठन किया। यह किसान सभा बाद में पझौता किसान सभा के नाम से प्रसिद्ध हुई। सभा के सभी सदस्यों ने ‘लोटे-लूण’ किया अर्थात लोटे में नमकीन पानी बनाकर सबको चखाया और आपसी सहयोग एवं दायित्व की शपथ ली। किसान सभा ने विकास एवं सुधार कार्यों के संबंध में रियासती सरकार को मांग पत्र दिया। सरकार ने इनकी मांग पर ध्यान नहीं दिया और किसान रियासती शासन के विरोध में संगठित होकर आंदोलन की राह पर चल पड़े। आन्दोलनकारियों ने पझौता क्षेत्र में सरकारी अधिकारियों व कर्मचारियों को काम नहीं करने दिया। 14 मई 1943 को पझौता क्षेत्र में सेना और पुलिस की मनमानी कार्यवाही शुरू हुई। 21 मई 1943 को वैद्य सूरत सिंह का मकान डायनामाइट से उड़ा दिया। 11 जून 1943 को आंदोलनकारी कली राम का मकान जलाकर राख कर दिया। आसपास के लोग आग बुझाने पहुंचे तो पुलिस और सेना ने लोगों पर गोली चला दी। इस प्रकार बड़े दमन के बावजूद समस्त पहाड़ी क्षेत्र में आंदोलनकारी साहस से मुकाबला करते रहे और आजादी की अलख जगाते रहे। हिमाचल प्रदेश के 4000 जवानों ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज में सक्रियता से भाग लिया। 27 फरवरी 1944 को गुप्तचर विभाग कमांडर दुर्गा मल्ल ब्रिटिश सेना के बीच जासूसी करते हुए पकड़े गए। उन्हें 25 अगस्त 1944 को लाल किले में फांसी की सजा दी गई। दाढ़ी गांव, धर्मशाला के अन्य युद्धबंदी वीर कैप्टन दल बहादुर थापा को भी लाल किले में ब्रिटिश सरकार ने 3 मई 1945 को फांसी दे दी। आजाद हिंद फौज का कौमी गीत ‘कदम-कदम बढ़ाए जा’ के संगीत निर्देशक खनियारा कांगड़ा के आजाद हिंद फौज के कैप्टन रामसिंह ठाकुर थे। हिमाचल के पहाड़ी वीरों ने अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र लड़ाई में कठिन परिस्थितियों के होते हुए भी अदम्य साहस, अद्भुत शौर्य और युद्ध कौशल का परिचय दिया। इस प्रकार हिमाचल प्रदेश का 15 अगस्त 1947 तक राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में निरंतर और सक्रिय योगदान रहा है।

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