नारीवाद का यथार्थ

दरअसल, इन फर्जी नारीवाद का उद्देश्य सिर्फ पुरुषों को नीचा दिखाना है। इन्हें अधिकारों की बात नहीं करनी, बल्कि इनका असल मकसद है पितृसत्ता के खिलाफ भड़काऊ बेहूदा पोस्ट डालकर उनके ख़िलाफ़ नफरत फैलाना। अगर सच में ही ऐसी महिलाएं ’नारीवादी’ होतीं, तो ये ज़मीनी स्तर पर उनके अधिकारों और महिलाओं पर हो रहे शोषण के खिलाफ लड़ रही होतीं, फेसबुक और ट्विटर पर रात-दिन बयानबाजी नहीं कर रही होती।

हर देश में स्त्री संघर्ष का अपना एक अलग इतिहास है, जो अपने लिए एक अलग सैद्धांतिकी की मांग करता है। इसके आधार पर ही वहां के स्त्री-विमर्श को समझा जा सकता है। इस बात को स्त्री-विमर्श के अनेक पैरोकारों ने बहुत पहले ही महसूस कर लिया था। दरअसल, स्त्री-विमर्श का पश्चिमी मॉडल भारतीय स्त्री-विमर्श से पूर्णत: भिन्न है। कारण, भारतीय और पश्चिमी समाजों के स्त्री सरोकारों के संबंध में पुरुषों की भूमिका भिन्न है। पश्चिम में नारीवाद की मुहिम स्त्रियों द्वारा शुरू की गई थी। बहुत बाद में जाकर इसे पुरुषों का समर्थन मिला, जबकि भारत में स्त्री सरोकारों की सैद्धांतिक और व्यावहारिक लड़ाई पुरुषों द्वारा शुरू की गई, जिसमें स्त्रियों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। इसी कारण स्त्री-विमर्श के पश्चिमी मॉडल से भारतीय स्त्री-विमर्श को समझना मुश्किल है। भारतीय समाज में स्त्री की स्थिति अंतर्विरोधों से भरी हुई है। परंपरा से नारी को शक्ति का रूप माना गया है, पर आम बोलचाल में उसे अबला कहा जाता है। मध्यकालीन भक्त कवियों के यहां भी स्त्री को लेकर अंतर्विरोधी उक्तियां विद्यमान हैं। आज भी हमारे समाज और साहित्य में स्त्री के प्रति कमोबेश यही अंतर्विरोधी रवैया मौजूद है।

भारत के नारीवादी आंदोलन में पुरुषों का है अहम योगदान

भारत में आधुनिक युग में स्त्री सरोकारों की सारी लड़ाइयां एक मुहिम के रूप में नवजागरण काल के पुरुष समाज सुधारकों द्वारा शुरू की गईं। राजा राममोहन राय, मृत्युंजय विद्यालंकार, ज्योतिबा फुले, ईश्वरचंद विद्यासागर, बेहराम मलबारी, महादेव रानाडे आदि ने स्त्रियों से जुड़े लगभग हर मुद्दे को उठाया और स्त्रियों को समाज में सम्मानजनक स्थान दिलाने का प्रयास किया। महात्मा ज्योतिबा फुले, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, राजा राममोहन राय, विष्णु शास्त्री पंडित, डीके कर्वे आदि पुरुषों ने न सिर्फ महिलाओं को शिक्षित करने के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किए, बल्कि उन्हें सामाजिक और आर्थिक रूप से सशक्त बनने के लिए भी प्रोत्साहित किया। महात्मा ज्योतिबा फुले जी यह मानते थे कि जब तक भावी पीढ़ी का निर्माण करने वाली माताएं व बहने अशिक्षा के अंधकार में डूबी रहेंगी तब तक हमारा देश व समाज की वास्तविक उन्नति नहीं हो सकतीं। इनके अलावा रमाबाई रानडे, पंडिता रमाबाई सरस्वती, नवाब फेजुनेसा चौधरानी, सावित्री फुले, रुकैया, गंगाबाई, बहिन सुब्बलक्ष्मी, सरोजनी नायडू, ज्योतिर्मयी देवी, अबला घोष जैसी कई महिलाओं ने भी स्त्री अधिकारों की लंबी लड़ाई लड़ी।

मातृसत्ता की बात करता है ‘फर्जी नारीवाद’

“महिलाओं के प्रति होनेवाला हर अन्याय विचलित करता है, नारीवाद का अर्थ नकारात्मकता नहीं समानता है, औरतों को दबाव में आने के बदले सवाल करने होंगे।”

पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया के गलियारों में नारीवाद की एक अलग ही परिभाषा प्रचलित हो रही है, जिसे ‘छद्म नारीवाद’ कहा जा सकता है। इसके पैरोकारों की सुई लड़कियों द्वारा रात को अकेले बाहर घूमने, शराब-सिगरेट पीने, आदि जैसे सनसनी मुद्दों पर सरेआम चर्चा करने तक ही अटक कर रह गयी है। इन्हें पुरुषों से भी कम कपड़े पहन कर लेट नाइट पार्टी करने का अधिकार चाहिए, जबकि कौन क्या पहनेगा- यह किसी व्यक्ति विशेष का निजी निर्णय और उसकी स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार है। यह पुरुषों से क्यों चाहिए? दरअसल, इन फर्जी नारीवाद का उद्देश्य सिर्फ पुरुषों को नीचा दिखाना है। इन्हें अधिकारों की बात नहीं करनी, बल्कि इनका असल मकसद है पितृसत्ता के खिलाफ भड़काऊ बेहूदा पोस्ट डालकर उनके ख़िलाफ़ नफरत फैलाना। अगर सच में ही ऐसी महिलाएं ‘नारीवादी’ होतीं, तो ये ज़मीनी स्तर पर उनके अधिकारों और महिलाओं पर हो रहे शोषण के खिलाफ लड़ रही होतीं, फेसबुक और ट्विटर पर रात-दिन बयानबाजी नहीं कर रही होती। नतीजतन जिस पुरुष से उन्हें अपने लिए समान अधिकारों की मांग करनी थी, आज आधुनिकता के नाम पर वे उनके ही हाथों की कठपुतली बन कर रह गयी हैं। यह सब आधुनिक नारियों के छद्म नारीवाद का ही नतीजा है। जब तक ये फ़र्ज़ी नारीवाद की घिसे-पिटे मुद्दों पर अटकी रहेगी, तब तक महिला सशक्तिकरण के नाम पर सिर्फ खोखले वादे व बातों के सिवा समाज में महिलाओं को कुछ हासिल नहीं होगा। उनका सदियों तक ऐसे ही शोषण होता रहेगा। उनके लिए समान अधिकारों की बात तो भूल ही जाइए।

‘नारीवाद’ स्त्रियों और पुरुषों के बीच समान सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकार की बात करता है।

 नारीवाद का अर्थ महिलाओं के लिए अलग या विशेष अधिकार की मांग करना नहीं है।

 नारीवाद का अर्थ मर्दों के अधिकारों को कम आंकना और उन्हें नीचा दिखाना भी नहीं है।

 नारीवाद कोई धर्म भी नहीं है, जिसकी किसी खास किताब में लिखे गए नियमों का अनुसरण किया जाए। न ही इसका कोई निश्चित नियम या सिद्धांत है।

 नारीवाद बसों या पब्लिक ट्रांसपोर्ट में अपने लिए रिज़र्व सीट लेना नहीं है, बल्कि पुरुषों के साथ लाइन में लग कर अपने लिए अधिकारों का उपयोग करना है।

 नारीवाद पुरुषों को गालियां देना नहीं है, न ही उनको नीचा दिखा कर ऊपर उठने की सीढ़ी है। किसी के कंधे पर बैठकर कभी भी बराबरी का दर्ज़ा नहीं पाया जा सकता। न ही किसी को पीछे धकेल कर आगे आना प्रगतिशील होने का सही तरीका है ।

 नारीवाद का अर्थ है खुद के लिए इस समाज में अपनी पहचान सुनिश्चित करना, अपनी बात रखना, अपने हक़ के लिए आवाज उठाना और किसी की भी गलत बात को बर्दाश्त न करना है।

 नारीवाद अपने पुरुष मित्रों या संबंधियों को सही ठहराना और दूसरे पुरुषों का विरोध करना या उन्हें प्रताड़ित करना नहीं है, बल्कि सही बात को समझना और उसका समर्थन करना है।

सिर्फ महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ना नहीं है ‘नारीवाद’

विश्वविख्यात हॉलीवुड अभिनेत्री एमा वॉटसन ने वर्ष 2014 में यूनाइटेड नेशंस में दिए गए अपने भाषण में कहा था कि पिछले कुछ समय से ‘नारीवाद’ एक नकारात्मक शब्द बनता जा रहा है। ‘नारीवाद’  सिर्फ महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ना नहीं है। न ही इसका मतलब यह है कि हम पुरुषों के साथ वैसे ही भेदभाव करने लग जाएं, जैसे महिलाओं के साथ भेदभाव हो रहे हैं। आप ही सोचिए कि अगर पितृसत्ता गलत है, तो मातृसत्ता सही कैसे हो सकती है? सच तो यह है कि नारीवाद महिलाओं व पुरुषों के बीच के प्राकृतिक अंतरों को मिटाना नहीं चाहती हैं, बल्कि यह महिला-पुरुष के बीच समानता की बात करता है। नारीवाद का सही अर्थ है कि महिलाओं को भी पुरुषों के समान अधिकार मिलें। नारीवाद का अर्थ अपने लिए जगह छीनना नहीं, बल्कि अपने लिए जगह बनाना है। यह इस बात की पैरवी करता है कि समाज में सभी इंसानों को बराबर सामाजिक अधिकार मिले। नारीवाद महिलाओं तथा पुरुषों के लिए समान सामाजिक, आर्थिक, राजीनितिक और न्यायिक अधिकारों की मांग करता है।

1998 में नताशा वाल्टर ने अपनी किताब ‘द न्यू फेमिनिज्म’ में पश्चिमी नारीवादी आंदोलनों की सीमाओं को रेखांकित करते हुए इस बात पर बल दिया कि सभी स्त्रियों को साथ लेकर चलना हमारा लक्ष्य नहीं होना चाहिए, बल्कि सभी पुरुषों को साथ लेकर चलना हमारा लक्ष्य होना चाहिए तभी स्त्री-पुरुष में सामाजिक समानता स्थापित हो पाएगी। नताशा वाल्टर की किताब के प्रत्युत्तर में जरमेन ग्रीयर की ‘द होल वुमन’ (1999) आई। इसमें जरमेन ग्रीयर ने दिखाया कि किस प्रकार पहले के नारीवादियों के प्रयास से महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त हुए अत: उन नारीवादियों के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता।

समानता की पहली मांग उठे घर में

याद रखें, पुरुषों को अपना दुश्मन बना कर आप कभी भी बराबरी नहीं कर पाएंगी, क्योंकि समाज में, घर में, बाज़ार में, राजनीति में… हर जगह उनका ही वर्चस्व है। आप कहां तक लड़ेंगी, किस-किस से लड़ेंगी, कितना लड़ेंगी, कब तक लड़ेंगी और सबसे महत्वपूर्ण कब तक लडेंगी? यह एक अंतहीन लड़ाई हो जाएगी। बराबरी की पहली लड़ाई आपको अपने घर से शुरू करनी है। अपने पिता, भाई, पति की आंखों में आंखें डाल कर अपने लिए पढ़ने, अपनी मर्जी से अपना करियर चुनने, अपनी पसंद के इंसान से शादी करने, अगर आप वर्किंग हैं, तो अपनी मर्जी से अपने पैसे खर्च, जमा करने का अधिकार मांगें। पहले दिन ही क्रांतिकारी मत बनें। धीरे-धीरे अपनी बातों को सही तरीके से रखकर पहले अपने लिए स्थान बनाएं। फिर आपको देखकर बाक़ी महिलाएं खुद अपने लिए स्थान बना लेगीं। जो ऐसा नहीं कर पाएं, उन्हें इसके लिए सहयोग करें। गुटबाजी और सेलेक्टिव होने की बजाय ग़लत को ग़लत और सही को सही कहना सीखें। ’हर औरत अबला नहीं होती और न ही हर मर्द बलात्कारी होता है’- इस बात को स्वीकार करते हुए प्राप्त तथ्यों पर विवेचना करके सही निर्णय लेने का अभ्यास करें। जिस दिन औरतों को यह करना आ जाएगा, उस दिन समाज में नारीवाद आ जाएगा।

 

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