भारत की शस्त्र सिद्धता

भारतीय प्रक्षेपास्त्रों की धमक अब दूसरे देशों तक पहुंच चुकी है। फिलीपीन्स से ब्रह्मोस, सुपर सोनिक, क्रूज मिसाइल के एण्टी-शिप वैरियंट खरीद का सौदा हो चुका है। इसके साथ ही कई देशों ने भारत की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों को खरीदने पर गहरी रुचि दिखाई है। देश में निर्यात क्षमता वाले अधिक सिस्टम विकसित किए जा रहे हैं।

अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता व सरकार, चीन की चुनौती व चक्रव्यूह, पाकिस्तान की नापाक हरकतें व आन्तरिक हालात, आई.एस.आई. की घातक गतिविधियां एवं इस्लामिक आतंकवाद के कारण भारतीय सशस्त्र सेनाओं की भूमिका बढ़ती जा रही है। इस बात को कदापि नकारा नहीं जा सकता है कि जिस देश की सेनाएं सशक्त व सुदृढ़ होती हैं, उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा उतनी ही अधिक मजबूत मानी जाती है। व्यापक सुरक्षा परिवेश का नवीन विश्व व्यवस्था के आधार पर भारतीय सुरक्षा की आन्तरिक एवं बाह्य चुनौतियों के सन्दर्भ में व्यापक चिन्तन, मनन, सजग व सतर्क रहने की सतत जरूरत है। प्रत्येक राष्ट्र अपनी सुरक्षा के मामले को सदैव सर्वोपरि मानता है। किसी भी आक्रमण का प्रतिकार करने के लिए तथा अपने क्षेत्र में शान्ति व स्थिरता के विकास हेतु रचनात्मक सहयोग प्रदान करने के लिए आपेक्षित स्तर की सैन्य क्षमता, सैन्य तैयारी एवं शस्त्र सिद्धता जरूरी है।

भारत में सैन्य अनुसंधान और विकास के साथ ही शस्त्र सिद्धता उतनी तेजी से आगे नहीं बढ़ी, जितनी आशा, अपेक्षा एवं उम्मीद की गयी। 1950 के दशक के अन्त तक भारत ने परमाणु ऊर्जा पर कार्य आरम्भ कर दिया था। जिससे 1970 के दशक तक स्वदेशी परमाणु ऊर्जा संयंत्र बने। समान्तर में भारत ने परमाणु हथियारों और विखण्डनीय सामग्री के उत्पादन पर काम शुरू किया, जिससे 1974 में पोखरण में तथाकथित शान्तिपूर्ण परमाणु परीक्षण हुआ।

उल्लेखनीय है कि 1950 के दौरान भारत में केवल 19 आयुध कारखाने थे। 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में क्षेत्र में सराहनीय प्रगति शुरू हुई। 1980 के दशक में भारत में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डी.आर.डी.ओ.) ने बड़े पैमाने पर निवेश करके ‘पृथ्वी’, ‘आकाश’ और ‘नाग’ जैसे प्रक्षेपास्त्र (मिसाइल) विकसित किये। इस अवधि के दौरान हल्के लड़ाकू विमान का विकास भी शुरू किया। वर्ष 2015 तक भारत को सातवें सबसे बड़े सैन्य खर्च करने वाले देशों के रूप में मान्यता मिली, किन्तु वर्ष 2016 में यह दुनिया के चौथे सबसे बड़े सैन्य व्यय वाले देशों की सूची में आ गया। एल.सी.ए. ‘तेजस’ इण्डिया के पहले स्क्वाड्रन को शामिल करके फास्ट ट्रैक परियोजनायें शुरू की। इसके बाद स्टील्थ लड़ाकू विमान विकसित करने की प्रक्रिया प्रारम्भ की। भारत ने निजी क्षेत्र को रक्षा उत्पादन में प्रवेश करने की अनुमति दी, जिससे भारत अब सैन्य उत्पादन आयात करने की बजाय निर्यात करने वाले विश्व के प्रमुख देशों में आ गया है।

भारत की शस्त्र सिद्धता के फलस्वरूप आज हमारा देश दुनिया का 23वां सबसे बड़ा हथियार निर्यातक देश बन गया है। भारत को इस सदी की एक उभरती हुई शक्ति के रूप में अनुमानित किया जा रहा है। इसको विशेष रूप से दृष्टि में रखते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विजया दशमी (दशहरा) के दिन देश में रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में नये आयाम स्थापित करने और भारत की सिद्धता को सिद्ध करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए आर्डिनेंस फैक्टी बोर्ड (ओ.एफ.सी.) के स्थान पर बनाई गयी 7 अलग-अलग रक्षा कम्पनियां देश को समर्पित की। वास्तव में 41 ऑर्डिनेन्स फैक्ट्रियों को एक नवीन स्वरूप में लाने के लिए सात नई कम्पनियों की शुरूआत इसी संकल्प का एक हिस्सा है। चूंकि अभी तक आयुध निर्माण बोर्ड की वर्तमान व्यवस्था में अनेक प्रकार की कमियों का अनुभव किया जा रहा था।

अब भारत जिन देशों से सैन्य साजो-सामान खरीदेगा, उनको अपना सामान भारत में ही बनाना होगा अर्थात् सैन्य हार्डवेयर का उत्पादन देश में ही करना होगा। अब हमारा देश रक्षा व सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए भारत सैन्य उपकरण, हथियार और अन्य आवश्यक सैन्य सामग्री का उत्पादन स्वयं करेगा। विदेश की सैन्य उपकरण बनाने वाली कम्पनियों को स्पष्ट रूप से कह दिया है कि – ‘कम मेक इन इण्डिया’, ‘कम मेक फार इण्डिया’ और ‘कम मेक फार द वर्ल्ड’। इसके साथ ही घरेलू रक्षा उद्योग को सिद्धहस्त बनाने के लिए 209 सैन्य उपकरणों का आयात नहीं करने के सरकार के निर्णय का भी उल्लेख रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा किया गया।

वर्तमान में भारत का रक्षा व एयरोस्पेस विनिर्माण बाजार 85,000 करोड़ रुपये का है। रक्षा मंत्री के अनुमान के अनुसार अब यह बढ़कर एक लाख करोड़ तक हो जायेगा। उल्लेखनीय है कि एक प्रमुख फ्रांसीसी कम्पनी सामरिक साझेदारी मॉडल के तहत भारतीय कम्पनी के साथ मिलकर भारत में ‘एक इंजन’ का उत्पादन करेगी। भारत ने परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम नई पीढ़ी की बैलिस्टिक मिसाइल ‘अग्नि-पी’ और ‘प्रलय’ प्रक्षेपास्त्र का सफल परीक्षण किया। अब भारत प्रक्षेपास्त्रों की भांति, लड़ाकू विमान, पनडुब्बियां, टैंक, रॉकेट आदि बनाने में समर्थ हो सकेगा। वैसे भारत अब दुनिया के लगभग 84 देशों को रक्षा सामग्री और रक्षा उपकरण निर्यात करने में सक्षम हो चुका है। जब भारत अपनी आवश्यकता रक्षा सामग्री के मामले में आयात की बजाय निर्यात पर आधारित होगी, तभी आत्मनिर्भरता का एक मजबूत कदम होगा। देश अनवरत अपनी रक्षा तैयारियों को बेहतर बनाने की ओर अग्रसर हो रहा है। रक्षा उपकरणों के मामले में आयात व निर्भर देश से निर्यातक बनने में सराहनीय प्रगति की है। सैन्य शक्ति या शस्त्र सिद्धता के सन्दर्भ में आज हम विश्व में चौथे स्थान पर हैं।

निःसन्देह 75वें स्वतंत्रता दिवस पर भारत की शस्त्र सिद्धता यह प्रमाणित करती है कि भारत अब स्वावलम्बन, स्वाभिमान व स्वदेशी अभियान के साथ आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से बढ़ रहा है। आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष के उपलक्ष्य में निश्चित ही यह एक सुखद, स्वस्थ, सामयिक, सामरिक, सशक्त व सक्षम संकेत है। वास्तव में यह भारतीय रक्षा व सुरक्षा की गौरवशाली परम्पराओं को स्थापित करने के साथ ही इन्हें संजोने, संवारने एवं सुदृढ़ बनाने के साथ ही शस्त्र सिद्धता का सही पर्व है।

                                                                                                        डॉ. सुरेन्द्र कुमार मिश्र 

आपकी प्रतिक्रिया...