चाणक्य और चन्द्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य

आज से 2300 साल पूर्व, भारत में मौर्य साम्राज्य की स्थापना हुई। मौर्य साम्राज्य के निर्माण से पहले भारत कई छोटे राज्यों में विभाजित था। पश्चिम की ओर से सम्राट सिकंदर पर्शिया पर विजय प्राप्त कर भारत के ओर अग्रसर था। और यहाँ दूसरी तरफ आचार्य चाणक्य, भारत को विदेशी आक्रमणकारियों से बचाने के लिए एक अखंड भारत की कल्पना यथार्थ में लाना चाहते थे।

उस समय मगध, भारत का सबसे शक्तिशाली और सशक्त साम्राज्य था, जहां नंदवंशियों का राज था। अखंड भारत की कल्पना जो आचार्य चाणक्य ने की थी, वो मगध जैसे शक्तिशाली साम्राज्य के समर्थन से ही संभव था। इसी उद्देश्य से आचार्य चाणक्य, मगध नरेश धनानंद से भेंट करने गए। धननंद एक नीति भ्रष्ट और निरंकुश राजा थे, जो अपने प्रजा पर निरंतर अत्याचार करते थे। उन्होंने आचार्य चाणक्य की भरी सभा में अपमान की और उन्हें सभा से निष्कासित किया गया।

आचार्य चाणक्य ने उसी समय, नंदवंश के सर्वनाश की प्रतिज्ञा ली, और अखंड भारत के भावी सम्राट के खोज में लग गए। यह वही समय था जब उनका भेंट युवक चंद्रगुप्त से हुआ। चंद्रगुप्त एक प्रभावशाली युवक थे जो साहसी और कुशल नायक थे। आचार्य चाणक्य ने इन्हें अपना शिष्य बनाया और इन्हें राज्यशास्त्र, अर्थशास्त्र तथा युद्ध में प्रशिक्षित किया। दूसरी तरफ सिकंदर का सामना महाराज पुरुषोत्तम जैसे पराक्रमी राजा से हुआ, जिन्होंने सिकंदर के सैन्य को ध्वस्त किया और भारत को छोडने के लिए उन्हें विवश किया।

सिकंदर के जाने के बाद, भारत के उत्तर पश्चिमी सीमांत पर विद्रोह का वातावरण था। आचार्य चाणक्य ने चंद्रगुप्त को इस अवसर का सदुपयोग करने के लिए प्रेरित किया। चंद्रगुप्त ने तुरंत अपना लक्ष्य इस अभियान को सफल करने के लिए तक्षशिला, गांधार और पट्टल पर कूंच किया। वहाँ उन्होंने यवनों को पराजित कर उन्हें भारत से खदेड़ दिया। भारत के उत्तर पश्चिमी राज्यों पर विजय प्राप्त करने के पश्चात, चाणक्य और चन्द्रगुप्त का लक्ष्य अब पाटलिपुत्र पर था। पहले युद्ध में उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा।

फिर चाणक्य और चन्द्रगुप्त ने मगध के सीमांत प्रदेशों पर विजय प्राप्त किया और अंततः पाटलिपुत्र पर कब्जा कर लिया। धनानंद को मृत्युदंड दिया गया और चन्द्रगुप्त मौर्य का राज्याभिषेक किया गया। आचार्य चाणक्य ने अपने प्रतिज्ञा को पूर्ण किया। सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने साम्राज्य का विस्तार कलिंग को छोड़ पूरे भारत में किया। वे भारत के पहले ऐतिहासिक चक्रवर्ती सम्राट थे जिन्होंने आचार्य चाणक्य के नीतियों के साथ अखंड भारत का निर्माण किया। यवन सम्राट सेल्यूकस को पराजित करके चन्द्रगुप्त मौर्य ने भारत के अखंडता को सिद्ध किया।

सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य, अपने शासन के अंतिम दिनों में जैन धर्म के अनुयायी बने, और राज-पाट अपने पुत्र बिंदुसार को सौंप कर, अपने गुरु भद्रबाहु के साथ दक्षिण भारत की ओर अग्रसर हुए। उन्होंने अपने अंतिम दिन कर्नाटक के श्रवण बेळगोळ में बिताए और वही पर, सम्राट चन्द्रगुप्त ने अपना शरीर त्याग दिया।

आचार्य चाणक्य, सम्राट बिंदुसार के प्रधानमंत्री रहे और साम्राज्य को सुव्यवस्थित करने के लिए उन्हें मार्गदर्शन दिया।

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