बिहार के गांवों में बिना जुताई के होगी खेती

किसानों के लिए कम लागत में अधिक मुनाफे के बनेंगे मॉडल 1) जलवायु अनुकूल खेती के लिए सभी जिलों में पांच-पांच गांव सहित कुल 190 गांव चयनित 2) कृषि वैज्ञानिक व कर्मचारी पांच साल तक 190 गांवों में रहेंगे उपलब्ध 3) केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के बाद आठ जिलों के 40 गांवों में यह प्रयोग रहा सफल

डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय विश्वविद्यालय ने करीब चार साल पहले खेत की जुताई किये बिना (जीरो टिलेज) फसल उगाने का जो सफल प्रयोग किया था, वह बिहार के 190 गांव तक मुनाफे की खेती में तब्दील हो गया है। कृषि विभाग सभी 38 जिलों के पांच-पांच गांवों की 3800 एकड़ जमीन पर जलवायु अनुकूल कृषि तकनीक अपनाकर उनको किसानों के लिए रोल मॉडल के रूप में विकसित करने जा रहा है। चयनित गांवों के सभी किसान जीरो टिलेज से खेती कर सकें, इसके लिए पांच वर्षों में 25 हजार एकड़ खेतों को समतल किया जायेगा। 25 अप्रैल से 31 मई तक पांच हजार एकड़ खेत समतल करने के लिए कृषि मंत्री अमरेंद्र प्रताप सिंह ने भोजपूर के कोइलवर प्रखंड के जलपुरा खेरसेहियां गांव से इसका अभियान शुरू किया।

जीरो टिलेज से खेती के लिए पांच हजार कृषि कर्मचारियों और 50 हजार किसानों को प्रशिक्षित किया जायेगा। 190 गांवों के मौसम को देखते हुए 14 फसल चक्र को लागू किया गया है। अधिकतर जिलों में धान-गेहूं-मूंग की फसल चक्र अपनाया जा रहा है। मई से 15 जून तक धान की बुआई जीरो टिलेज से की जायेगी। नवंबर के प्रथम सप्ताह में धान कट जायेगा। फिर नवंबर तक गेहूं लग जायेगा। हर हाल से 15 मार्च तक गेहूं की कटनी की जायेगी। 15 मार्च से मई तक मूंग की फसल ली जायेगी।

किसानों में परंपरागत खेती की जगह जलवायु अनुकूल व्यवहार पैदा होगा :

कृषि विशेषज्ञ सह उप निदेशक, कृषि मुख्यालय अनिल कुमार झा ने बताया कि जीरो टिलेज से खेती का प्रयोग केंद्रीय कृषि विवि, पूसा में सफल होने के बाद मधुबनी, खगड़िया, भागलपुर, बांका, मुंगेर, नवादा, गया, नालंदा के 40 गांवों में प्रयोग हुआ। इसकी सफलता के द 190 गांवों का चयन किया गया है।

प्रति हेक्टेयर 40 हजार रुपये अधिक मुनाफा :

जीरो टिलेज से धान, गेहूं और मूंग की कुल पैदावार 113.7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। शुद्ध मुनाफे की बात करें, तो 97 हजार से 1.91 रुपये प्रति हेक्टेयर का लाभ है। वहीं परंपरागत खेती में औसतन 25 क्विंटल धान व 30 क्विंटल गेहूं पैदा होता है। फसल चक्र में मूंग नहीं रहता है। यदि कोई करता है, तो पांच से छह क्विंटल प्रति हेक्टेयर मूंग उत्पादन है। इस तरह करीब प्रति हेक्टेयर जीरो टिलेज से उत्पादन 113.7 क्विंटल के मुकाबले परंपरागत तरीके में 60 क्विंटल ही पैदावर है। परंपरागत तरीके से मुनाफा प्रति हेक्टेयर 40 हजार रुपये से कम है।

सरकार दे रही दवा और मशीन :

राज्य सरकार किसानों को बिना जुताई किये बुआई के लिए जीरो टिलेज मशीन उपलब्ध करा रही है। साथ ही खरपतवार के लिए दवा और इसके छिड़काव का खर्च भी उठा रही है। बाकी खर्च किसान को वहन करना है।

जुताई-मजदूरी का खर्च बचेगा, उत्पादन बढ़ेगा 20 प्रतिशत :

जीरो टिलेज विधि में खेत की जुताई किये बिना आलू की फसल को लगाया जाता है। बहुत ही कम मजदूर की जरूरत होती है। जुताई व मजदूरी के खर्च में बचत होती है, जबकि ऊपज में 15-20 फीसदी में वृद्धि होती है।

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