तुम बिन जिया जाए ना!

मोबाइल ने हमारे जीवन में उपयोगिता से लेकर लत तक की यात्रा तय कर ली है। मोबाइल से आधे घंटे दूर रहना अब किसी सजा से कम नहीं लगता। मोबाइल सूचनाओं के संवाहक की जगह अब विभिन्न शारीरिक और मानसिक बीमारियों का जनक भी बनता जा रहा है। समय रहते अगर हम सचेत नहीं हुए तो हम मोबाइल के नहीं, बल्कि मोबाइल हमारा मालिक बन जाएगा।

अठारहवीं सदी में स्कॉटलैंड के अभियांत्रिकी विशेषज्ञ जेम्स वाट के बनाये भाप के इंजन के बाद से लेकर वर्तमान तक के ढाई सौ सालों के समय काल में हुए तमाम प्रौद्योगिकी अविष्कार किसी चमत्कार से कम नहीं माने जा सकते। बिजली का आविष्कार दुनिया की प्रौद्योगिक क्रांति का मूलाधार बना। बीती सदी में कंप्यूटर क्रांति का रास्ता खुला और इक्कीसवीं सदी के बीते दो दशकों में हुई डिजिटल क्रांति ने तो पूरी दुनिया का नक्शा ही बदल दिया। इक्कीसवीं सदी के मानव समाज में सर्वाधिक तेजी से लोकप्रिय होने वाले तकनीकी उपकरण मोबाइल फोन की तो बात ही निराली है। बीते एक दशक में मोबाइल फोन, फीचर फोन से टच स्क्रीन तक पहुंच चुका है। वायरलैस चार्जर्स, सेल्फी कैमरा, सेल्फी स्टिक्स, बड़ी रैम साइज, अल्ट्रा स्पीड प्रोसेसर्स, बड़ी इंटरनेट स्टोरेज, मेगा पिक्सल कैमरा, वायरलैस ब्लूटुथ हैडफोन्स, ब्लूटुथ स्पीकर्स और पावर बैंक जैसी तकनीकी सुविधाओं से लैस आज के स्मार्टफोन लोगों के जीवन का अभिन्न अंग बन गये हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो पूरे समाज पर ‘बिन मोबाइल सब सून’ की कहावत चरितार्थ हो रही है।

आज कोई भी व्यक्ति इस तथ्य को अनदेखा नहीं कर सकता कि सोशल मीडिया ने हमारे जीवन और विचारों में बदलाव की बड़ी इबारत लिखी है। इसने संचार माध्यमों की दुनिया को बुनियादी ढंग से बदल दिया है और यह प्रक्रिया जारी है। अखबार, पुस्तकों, पत्रिकाओं, रेडियो और टीवी से अलग इस माध्यम की संवाद क्षमता इसे सबसे ज्यादा आकर्षक और शक्तिशाली बनाती है। जानना दिलचस्प होगा कि यह सोशल मीडिया जब से डेस्कटॉप कंप्यूटर व लैपटॉप से आगे निकल कर मोबाइल फोन पर सक्रिय हुआ है तब से इसकी द्विपक्षीय संवाद क्षमता ने इसे लोकप्रियता के चरम पर पहुंचा दिया है।

जेब और पर्स में सहजता से समा जाने वाले इस छोटे से तकनीकी उपकरण में अलाहदीन के चिराग की भांति आज के अत्याधुनिक इंसान की हर छोटी-बड़ी महत्वपूर्ण जानकारी तथा सुख-सुविधा का त्वरित समाधान निहित है। पढ़ाई व मनोरंजन एवं बैंकिंग व शॉपिंग तक सभी कुछ इसमें समाहित है। ‘गूगल असिस्टेंट’ और ‘एलेक्सा’ फीचर्स लोगों के पर्सनल सेक्रेटरी बनते जा रहे हैं। प्रो. संजय द्विवेदी के मुताबिक आज के अत्याधुनिक मोबाइल ने एक पूरी पीढ़ी की आदतों और उसके जिंदगी के तरीकों को बेहद गहराई से प्रभावित किया है। सूचनाओं और संवेदनाओं दोनों को कानों-कान कर दिया है। हमारे कान, मुंह, उंगलियां और दिल सब इसके निशाने पर हैं। नयी पीढ़ी अपना सारा संवाद इसी पर कर रही है, उसके होने-जीने और अपनी कहने-सुनने का सर्वसुलभ माध्यम है यह। अनेकानेक अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस आधुनिक युग के नये मोबाइल फोन एक अलग तरह से काम कर रहे हैं। नई पीढी को आकर्षित करने में इस तकनीकी उपकरण ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। आज का स्मार्ट मोबाइल फोन जानकारी, सूचना और संवाद की नयी दुनिया रचने के साथ संवाद का सबसे सुलभ, सस्ता और उपयोगी साधन साबित हो रहा है। यह करामाती फोन जहां एक ओर खुद में रेडियो, टीवी, तमाम बहुउपयोगी एप्स और सोशल साइट्स के साथ सक्रिय है वहीं ऑनलाइन गेम्स, गीत-संगीत, टीवी सीरियल्स तथा फिल्मों के माध्यम से लोगों का भरपूर मनोरंजन भी कर रहा है। इस पर प्यार से लेकर व्यापार सब पल रहा है। डिजीटल डायरी, कंप्यूटर, लैपटाप, कलकुलेटर, घड़ी और अलार्म जैसे उपयोगी फीचर्स से सुसज्जित आज के युग के इस बहुपयोगी संचार उपकरण ने मैसजिंग के टेक्ट्स्ट को एक नए पाठ में बदल दिया है। यह हमें फेसबुक से जोड़ता और ट्विटर से भी। यहां व्यक्त किया गया एक पंक्ति का विचार पूरे सोशल मीडिया पर हाहाकार मचा सकता है। इसने विचारों को कुछ शब्दों और पंक्तियों में बांधने का अभ्यास दिया है और विचारों को नए तरीके से देखने का अभ्यास दिया है। एक पूरी की पूरी जीवन शैली और भाषा विकसित की गई है। उत्तर आधुनिक संवाद का यह अनूठा यंत्र आज के मनुष्य के एकांत को भरने वाला ऐसा हमसफर बन रहा है जो अपनी तमाम अच्छाई व बुराई के साथ हमें पूरी शिद्दत से बांधता है।

‘एक क्लास में टीचर ने बच्चों से पूछा- जीवन क्या है? एक बच्चे ने छोटा सा लेकिन बहुत चौंकाने वाला जवाब दिया। बच्चे ने कहा- मोबाइल फोन के बिना बिताया गया समय ही असली जीवन है।’ सोशल मीडिया पर वायरल यह मैसेज मोबाइल के हमारे जीवन में गहराती पकड़ का बेहद सटीक उदाहरण माना जा सकता है। बेशक यह जवाब आपको भी भीतर तक छू गया होगा। वाकई 6 इंच की मोबाइल स्क्रीन आज देश की 70 फीसद आबादी की जिन्दगी बन गयी है। देश में स्मार्ट मोबाइल फोन की बढ़ते उपयोग पर एक ताजा सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक बीते दो साल में लोगों के मोबाइल इस्तेमाल करने का समय डेढ़ गुना बढ़ गया है। आज देश के लोग औसतन दिन के सात घंटे स्मार्टफोन पर बिता रहे हैं। मार्च 2019 में किए गए एक सर्वे में पता लगा था कि लोग रोजाना 4.9 घंटे फोन पर बिता रहे थे। मार्च 2020 तक ये समय 11 प्रतिशत बढ़ा और लोग 5.5 घंटे फोन स्मार्टफोन पर बिताने लगे और लॉकडाउन के दौरान ये वक्त बढ़कर रोजाना 6.9 घंटे हो गया था।

हमारे यहां एक पुरानी कहावत बहुत प्रचलित है- ‘अति सर्वत्र वर्जयेत्’। अर्थात  किसी भी चीज की अति घातक होती है। यह अति आज हम मोबाइल फोन के साथ कर रहे हैं। जरा गहराई से सोचिए! दिन के 24 घंटे में से लोगों के 10-12 घंटे अमूमन सोने व दैनिक कार्यों में बीतते हैं। बाकी काम के 12 घंटों में से यदि हम सात घंटे इस मोबाइल नामक जादू के पिटारे से चिपके रहेंगे तो भला इसका हमारे शरीर और मस्तिष्क का क्या असर होता होगा?

निःसंदेह हमारे आधुनिक जीवन में स्मार्ट फोन की उपयोगिता पर कोई दो राय नहीं है, लेकिन हर समय स्मार्टफोन से चिपके रहने की लत सही नहीं है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों की मानें तो हर वक्त स्मार्टफोन से चिपके रहने की वजह लोगों में तनाव, बेचैनी व अवसाद की समस्याएं तेजी से बढ़ रहीं हैं। इससे न केवल आंखों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, बल्कि कई अन्य बीमारियां भी जन्म लेती हैं। जरूरत से ज्यादा स्मार्ट फोन का इस्तेमाल करने से मानसिक-शारीरिक तौर पर नुकसान तो होता ही है, साथ ही समय की भी बर्बादी होती है। बावजूद इसके, अधिकांश लोग दिनभर मोबाइल को स्क्रॉल करते रहते हैं। कुछ लोग काम के चलते मोबाइल पर घंटों लगे रहते हैं तो कुछ लोग महज सोशल मीडिया पर एक्टिव रहने के लिए मोबाइल से चिपके रहते हैं। अगर आप भी हर वक्त स्मार्टफोन से चिपके रहते हैं और 30 मिनट के लिए भी मोबाइल से दूर नहीं रह पाते हैं तो यह आपकी सेहत के लिए खतरे की घंटी की है। जानना दिलचस्प हो कि लोगों का एक वर्ग हर समय फोन में खोए रहने की अपनी आदत से परेशान तो है लेकिन चाह कर भी इस आदत को छोड़ नहीं पा रहा। यानी जरूरत के लिए बनाया गया मोबाइल फोन आज उनके जीवन की एक एक लत बन चुका है। लेकिन; कहते हैं न कि जहां चाह वहां राह। मैक्स हॉस्पिटल दिल्ली के मनोचिकित्सक डॉ. सुमित कुमार कहते हैं कि अपनी जीवनशैली में कुछ बदलाव लाकर लोग अपने जीवन से जुड़ी मोबाइल की लत को छुड़ा सकते हैं।  इसके लिए वे कुछ बेहद सरल पर कारगर उपाय बताते हैं –

  1. ध्यान लगाएं। इसे करने से मन और मस्तिष्क स्थिर रहता है और आप वास्तविक दुनिया में रहते हैं।

  2. प्राणायाम करें। इससे दिमाग शांत रहता है। आप इसे रोजाना कर सकते हैं। अगर आप बेचैन और चिंतित रहते हैं तो रोजाना प्राणायाम जरूर करें।

  3. खुद को अपनी रुचि के कामों में व्यस्त रखें।मसलन आप अपनी पसंद की किताब पढ़ सकते हैं, खाना बना सकते हैं और बाग़-बगीचे की देखभाल भी कर सकते हैं। अपनी पसंद के खेल खेलें। इन गतिविधियों से दिमाग शांत और मन प्रसन्न रहता है।

 

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