विद्या ही सफलता का मूल आधार है

जिस प्रकार नेत्रहीन के लिए सारा संसार अंधकारपूर्ण रहता है, सुंदर दृश्यों तथा रंगों के आनंद से वह वंचित रह जाता है, उसी प्रकार ज्ञानान्ध के लिए भी “संसार का मधुर रहस्य,” “ज्ञान-विज्ञान के चमत्कार,” “साहित्य तथा कलाओं का आनंद,” “युग-युग संग्रहीत ज्ञान का रसास्वादन” आदि सारे सुख निरर्थक ही रहते हैं ।” वह इन स्वर्गीय सम्पदाओं के बीच भी एक पशु की तरह केवल उदरपालन की क्रिया में ही बहुमूल्य मानव जीवन को नष्ट कर देता है । संसार से लेकर आत्मा तक के जितने सुख माने गए हैं, “विद्या के अभाव में अज्ञानी पुरुष उन सबसे सर्वथा वंचित ही रह जाता है ।”

यदि आपको जीवन में सुख-सम्मान पाना है, अपनी आत्मा को उन्नत बनाकर परमात्मा तक पहुँचने की जिज्ञासा है, “तो आज से ही विद्या रूपी धन-संचय करने में लग जाइए।” यदि आपकी सांसारिक व्यस्तता आपके लिए अधिक समय नहीं छोड़ती, “तो भी थोड़ा-थोड़ा “ज्ञान-संचय” ही करते जाइए ।” बूंद-बूंद करके घट भर जाता है । “जीवन के जिस क्षेत्र में आपको उन्नति करने की अभिलाषा है, आप जिस प्रकार की सफलता प्राप्त करना चाहते हैं, उसी विषय एवं क्षेत्र के अध्ययन में निरत हो जाइए । यदि आपका लक्ष्य सत्यम्, शिवम्, सुंदरम् है तो आप उसी से उन्नति करते हुए अंततः अपने परम लक्ष्य आत्मसाक्षात्कार तक पहुँच जाएँगे ।”

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