ऋषि सुनक-कमला हैरिस पर व्यर्थ का भारतीय उत्साह

प्रबंधन में सुधार का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव है “एरर डिटेक्शन” यानि कमियों को पहचानना क्यों की सुधार का जन्म ही दोषों के उन्मूलन के लिए होता है। एक समाज के रूप में हिन्दुओं/ बहुसंख्य भारतीयों में सुधार की गति इसलिए ही प्रभावी नहीं है क्यों की हम इतिहास से केवल अपनी महानता की गाथाएं ढूंढने के सिंड्रोम से पीड़ित हैं कमियां नहीं। जब “एरर डिटेक्शन” ही नहीं हो रहा तो सुधार कैसे होगा ? जब यह पता ही नहीं की एलर्जी किसकी है तो इलाज़ कैसे होगा ??

कुछ उत्साहित अल्पज्ञानी भारतीय फ़िल्मी अंदाज़ में ऋषि सुनाक के ब्रिटिश प्रधानमंत्री बनने की खुशियां भारत में मना रहे हैं। यह वास्तविक जीवन है, रजनीगंधा का प्रचार नहीं है। याद रखियेगा, यह व्यक्ति पूरा जीवन स्वयं को ब्रिटेन के प्रति सच्चा और समर्पित दिखाने के पूर्वाग्रह में भारत के प्रति सहिष्णु नहीं रहेगा।

जिस दिन कमला हैरिस अमेरिका की राष्ट्रपति होंगी उस दिन वह भारत के प्रति और कट्टर रवैया अख्तियार करेंगी। आप कमला हैरिस के चुनाव एवं उसके पहले के स्पीच सुनेंगे तो आप को आश्चर्य होगा। वह भारत पर प्रतिबंधों की समर्थक है और कश्मीर में जनमत संग्रह कराने की पक्षधर। हिन्दुओं/ बहुसंख्य भारतीयों में यह एक बड़ा दोष है की वह अपनी व्यक्तिगत स्वीकार्यता बढाने के लिए समुदाय आदि को दरकिनार कर देते हैं।

यह दोष मुसलमानों/ ईसाईयों में नहीं है क्यों की उनकी परवरिश ही संगरोध की संस्कृति में और समुदाय को फोकस करते हुए होती है। जैसे अमेरिकी सीनेट की एक मुस्लिम महिला नेता पाकिस्तान के पक्ष में भारत के विरुद्ध प्रस्ताव लाती रहती है। भारत में हामिद अंसारी का केस देखिये जिसने राष्ट्रपति पद की गरिमा को इस्लाम के समर्थन में धूमिल किया।

यह आज से हुआ ऐसा नहीं है, पहले से ही हो रहा है। 1351 में गद्दी पर बैठते ही फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ ने पहली बार ब्राह्मणों पर भी जज़िया लगा दिया। उनके शासन में कायम होने के बाद बहुत बड़े धार्मिक वर्ग और ब्राम्हणों पर अत्याचार शुरु हुए इसका कारण यह था की फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ एक हिन्दू माता (गुर्जर शासक रणमल की बेटी) की संतान था और उसने मुस्लिम समाज में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए स्वयं को एक समर्पित मुसलमान के रूप में स्थापित करने के लिए हिन्दुओं पर कई कई गुना अधिक अत्याचार किया। 1360 ई॰ में सुल्तान फ़िरोज़ ने आक्रमण करके पुरी के जगन्नाथपुरी मंदिर को ध्वस्त किया।

मुसलमानों/ ब्रिटिश के मातहत काम करने वाले भारतीयों/ हिन्दुओं का रवैया अपने समाज के प्रति और अधिक क्रूर रहा है।  इसके हज़ारों फैक्ट्स इतिहास में भरे पड़े हैं।  हमारे संस्कृति का दोष यही है की हम अपने निजी छद्म उन्नति के लालच में अपनी संस्कृति/ समाज को गौड़ बना देते हैं। यही कारण है की एक धर्मान्तरित हिन्दू एक जन्मना ईसाई या मुस्लिम से कई गुना अधिक नुकसान अपने हिन्दू धर्म और भारतीय समाज को पहुँचाता है और आज भी उसी हीनभावना से पहुंचा रहा है।

सोचिये देश के भीतर भी क्रिप्टो हिन्दुओं की इतनी बड़ी फ़ौज कैसे खड़ी हुई है ? और भोला हिन्दू/ बहुसंख्य भारतीय समाज जो आज तक युसुफ़ों को दिलीप कुमार समझकर प्यार लुटा रहा है।

                                                                                                                                                                                  – शिवेश प्रताप सिंह

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