कोरोनामिक्स भारत बन सकता है चीन का विकल्प

कोरोना महामारी के बाद वैश्विक कम्पनियां बहुत तेजी से चीन छोड़ रही हैं। भारत के लिए यह एक सुनहरा अवसर है। वर्तमान सरकार की नीतियां और टैक्स में छूट की अवधारणा इस मामले में सोने पर सुहागा साबित होगी। अब आवश्यकता है तो सरकार द्वारा की जा रही सार्थक पहल को और तेज करने की, ताकि इस मौके का लाभ भारत को बड़े स्तर पर मिल सके।

अभी हाल ही में यूरोपियन यूनियन चैम्बर ऑफ कॉमर्स इन चीन ने कहा है कि चार में से लगभग एक यूरोपीय फर्म चीन से बाहर जाने पर विचार कर रही है। उसके द्वारा किये एक सर्वे में लगभग 23 प्रतिशत लोग अपने वर्तमान या नियोजित निवेश को चीन से दूर ले जाने के बारे में सोच रहे हैं। चैंबर ने कहा कि चीन में अपने विकल्पों का पुनर्मूल्यांकन करने वाली यूरोपीय फर्मों की संख्या एक दशक में सबसे अधिक फरवरी में 11 प्रतिशत दर्ज की गई जो दोगुने से भी अधिक है। चैंबर ने कहा, 372 व्यवसायों ने अप्रैल के चुनाव में ऐसा कहा, जबकि  फरवरी में 620 ने।

चीन की वर्तमान नीति कोरोना संक्रमण से निपटने के लिए उसकी जीरो टॉलरेंस और जीरो एग्जिट पालिसी इसके मुख्य कारण हैं। चीन छोड़ने का विचार करने वाली फर्मों में से 16 प्रतिशत ने कहा कि वे दक्षिण पूर्व एशिया में स्थानांतरित होने पर विचार कर रहे थे, जबकि 18 प्रतिशत ने कहा कि वे एशिया-प्रशांत क्षेत्र में कहीं और देख रहे थे, 19 प्रतिशत ने यूरोप, 12 प्रतिशत ने उत्तरी अमेरिका और 11 प्रतिशत ने कहा दक्षिण एशिया। यही विचार भारत के लिए मौका है जो अपनी नीतियों और करों के कारण इन्हें भारत की तरफ खींच सकता है।

भारतीय अर्थव्यवस्था और समाज के लिए, यह कोरोना काल संकट काल के साथ-साथ एक कदम पीछे कर उछाल लेकर वापसी करने का समय था, विशेषकर उनके लिए जो विकास की दौड़ से वंचित थे और पिछड़ गए थे। इस संकट ने वाणिज्य में नए नेतृत्व विकास को भी उभरने के लिए एक जगह बनाई। अर्थव्यवस्था रीसेट मोड में थी तो बड़े-बड़े बदलाव देखने को मिले। फिजूलखर्ची बंद हुई और ऐसा करने वाले सत्ता से बेदखल हो रहें हैं। पाकिस्तान-श्रीलंका इसके उदाहरण हैं। भारत में कौशल के विकेंद्रीकरण से कस्बे के स्तर पर आर्थिक गतिविधियां तेज होंगी और पूरे भारत में समान गति और स्तर से विकास सम्भव होगा और आर्थिक तानाबाना मजबूत होगा। बहुत से लोगों ने नौकरियों में भरोसा खोने के बाद  स्वरोजगार शुरू कर दिया है और कुटीर उद्योगों के साथ सेवा क्षेत्र में भी स्वरोजगार बढ़ा है। सरकार एमएसएमई और प्रभावित क्षेत्रों को कई पैकेज भी दे रही है। सरकारी खरीद और व्यय में भी वृद्धि के प्रयास हो रहे हैं। प्रक्रियागत लागतें कम हो रही हैं। कौन सा काम हाइब्रिड सिस्टम में हो सकता है इस पर मंथन चालू हो गया है, यह बदलाव ऑपरेटिंग लागत को कम करेगा और लाभ बढ़ाएगा।

वैश्विक स्तर पर, खरीदार पहले से ही भारत से चीनी मिट्टी के बरतन, घर, फैशन और जीवन शैली के सामानों की खरीददारी कर रहे हैं। अब कम लागत के कौशल और बढ़ती हुई मांग और उत्पादन के कारण यह गति बढ़ेगी। उपरोक्त कारणों से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन के विकल्प के रूप में भारत कच्चे माल और निर्मित वस्तुओं के आपूर्तिकर्ता के रूप में कई व्यापार चैनलों में प्रवेश कर सकता है और रिजर्व बैंक ने इधर रुपये को अंतरराष्ट्रीय सौदे के रिकॉर्डिंग और सेटेलमेंट के माध्यम की आज्ञा देकर एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वित्तीय समावेशीकरण की नींव भी रख दी है। बदलती विश्व अर्थगति और नई अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला मॉडल में, भारत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। रूस-यूक्रेन के कारण अनाज के बढ़ते हुए वैश्विक संकट में भारत सुरक्षित है क्योंकि वह इस मामले में आत्मनिर्भर है। यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है। इसलिये चीन की तुलना में हमारे पास सांस लेने की क्षमता अधिक है।

भारत चीन से निकल रहे और कई विदेशी निर्माताओं को भारत में उत्पादन संयत्र स्थानांतरित करने के लिए आमंत्रित करने में लगा हुआ है। वे लोग भारत को चीन के विकल्प के रूप में देख भी रहे हैं। कोरोना काल में 300 कम्पनियां पहले से ही इलेक्ट्रॉनिक्स, चिकित्सा और कपड़ा सहित कई क्षेत्रों में उत्पादन के लिए भारत सरकार के साथ बात कर रही थी।

चीन हमसे इसलिए आगे हैं क्योंकि उसने अपनी बढ़ी हुई आबादी को विनिर्माण में झोंक दिया। आबादी को बोझ बनाने की जगह उन्हें लाभ केंद्र में बदला और ब्रांडेड की जगह दुनिया भर में अनब्रांडेड सामानों की बाढ़ ला दी। इसके जबाब में मौजूदा सरकार के लगातार प्रयासों से आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया लाया गया ताकि आबादी और संसाधनों को लाभ केंद्र में बदल विनिर्माण पर फोकस बढ़ाया जाय। आज नई विनिर्माण यूनिट पर दुनिया में सबसे कम आयकर है। विनिर्माण सुविधाओं में वृद्धि होने पर आसपास ढांचागत विकास, स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार को बढ़ावा मिलेगा। सरकार आयातित उत्पादों पर आयात शुल्क बढ़ाने की सोच रही है और बढ़ा भी रही है। साथ ही, ऐसे देशों को चिन्हित कर रही है जो करीब 1000 वस्तुओं की आपूर्ति के लिए चीन से इतर सोच रहे हैं। आर्थिक गतिविधियों के विकेंद्रीकरण से माइक्रो सेक्टर बढ़ेगा और नए और पहले से अधिक मजबूत आर्थिक ताने-बाने का निर्माण होगा। हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर और ई-कॉमर्स, लॉजिस्टिक सेक्टर में वृद्धि होगी।

महामारी ने उपभोक्ता मनोविज्ञान में भी बदलाव किया है, और यह बाजार के प्रति, विशेष रूप से चीन और उसके उत्पादों के प्रति एक परिवर्तित व्यवहार भी सामने लाया है। इससे कोई इनकार नहीं कर रहा है कि महामारी को देखते हुए आपूर्ति श्रृंखला पर सबसे बड़ी मार पड़ी है और भारत को इस वैश्विक शून्य को भरने के लिए छलांग लगाने से पहले अपनी निर्भरता को भी चीन पर से काफी कम करना होगा क्योंकि लम्बे समय से चीन विभिन्न वस्तुओं के लिए भारत की आयात सूची में सबसे ऊपर है। यह भी स्पष्ट है कि विश्व स्तर पर बदल रही गतिशीलता में चीन पर निर्भरता शायद खत्म हो रही है। हालांकि ये सब अतिवाद संभावनाएं हैं फिर भी दुनिया की शीर्ष 10 अर्थव्यवस्था की लिस्ट बदलेगी। कुछ नए देश आएंगे और पुराने जाएंगे।

उपरोक्त सभी सकारात्मक आशाओं का लाभ प्राप्त करने के लिए सरकार और जनभागीदारी की मजबूत इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। एमएसएमई से सरकारी खरीद को बढ़ाकर 50 प्रतिशत किया जाना चाहिए और इसमें से भी 50 प्रतिशत माइक्रो सेक्टर से खरीदना चाहिए। एमएसएमई को तीन-भाग सूक्ष्म, लघु और मध्यम में अलग-अलग तीन प्रकोष्ठ के नेतृत्व में विभाजित करना चाहिए ताकि माइक्रो के साथ न्याय हो सके। सरकार को अंतिम स्तर पर बिक्री सम्भव बनाने और खपत बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। बैंक के लाभ की समीक्षा की आवश्यकता है और बैंक ब्याज और बैंक शुल्क में कमी, इस समय की मांग है। कम ब्याज दर के साथ अधिस्थगन की अवधि और सभी इन्फ्रास्ट्रक्चर खर्च बढ़ाए जाने चाहिए। जिस तरह वेज पदार्थों के लिए हरा और मांसाहारी पदार्थों के लिए लाल रंग का प्रयोग होता है, उसी तरह विदेशी और स्वदेशी सामानों के लिए भी कलर कोड लाना चाहिए। इससे राष्ट्रवादी व्यापार मजबूत होगा।

दुनिया के निवेशकों को आकर्षित करने, विनिर्माण क्षेत्र में अग्रणी बनने और चीन से मुकाबले के लिए भारत ने टैक्स सिस्टम के माध्यम से भी क्षमता निर्माण का काम किया है। चुनिंदा टैक्स आक्रामकता को लेकर जो भारत की छवि दुनिया में बनी हुई थी वो अब बीते कुछ सालों से खत्म हो रही  है। अब भारत टैक्स टेररिज्म वाला देश नहीं रहा। पूरे देश में जीएसटी लगाने से भी टैक्स की परिभाषाओं को समझने की जो सहूलियतें मिली उसने भी विदेशी निवेशकों को आकर्षित किया है।

आज घरेलू कम्पनियों के लिए कार्पोरेट टैक्स की प्रभावी दर 25.17 फीसदी हो गई और इसमें सभी प्रकार के सेस और सरचार्ज भी शामिल हैं। यदि कोई घरेलू कम्पनी किसी प्रकार का प्रोत्साहन या छूट नहीं ले रही है, तो उनके लिए कार्पोरेट टैक्स दर 22 फीसदी होगी और यदि ले रही है तो 25.17 होगा। एक अक्टूबर के बाद स्थापित हुई नई घरेलू मैन्युफैक्चरिंग कम्पनी यदि कोई प्रोत्साहन या छूट नहीं ले रही है तो वह 15 फीसदी कार्पोरेट टैक्स रेट के हिसाब से टैक्स दे सकती है। ऐसी नई कम्पनियों के लिए सभी सरचार्ज और सेस लगाने के बाद नई मैन्यूफैक्चरिंग कम्पनी के लिए टैक्स की प्रभावी दर 17.01 फीसदी हो जाएगी।

भारत के इस कदम से विश्व में भारत की टैक्स साख खूब बढ़ी है और वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग ट्रेंड भारत की तरफ मुड़ने की सम्भावना है जो मेक इन इंडिया के लिए अच्छा होगा। चीन में कार्पोरेट टैक्स की मानक दर 25 फीसदी है। यदि कोई कॉर्पोरेट चीन की सरकार द्वारा प्रोत्साहन के लिए चिन्हित क्षेत्रों में कारोबार करता है तो उसके लिए कार्पोरेट टैक्स की दर घटाकर 15 फीसदी की जा सकती है। भारत में जहां सभी नई यूनिटों को 15 फीसदी की दर दी गई है, चीन की 15 फीसदी की दर काफी प्रतिबंधित है। साथ ही, चीन में इसमें प्रोत्साहन वाले क्षेत्रों में नई व अत्याधुनिक तकनीक और कुछ खास एकीकृत सर्किट का उत्पादन ही शामिल है।

कार्पोरेट टैक्स की दर को घटाकर 25.17 फीसदी किए जाने का  भारत में संयंत्र लगाये हुये विदेशी कारोबारियों ने भी स्वागत किया है। उनका कहना है कि इससे देश और विश्व की  आर्थिक सुस्ती दूर होगी और विदेशी  कम्पनियों को भारत में मैन्युफैक्चरिंग गतिविधि बढ़ाने का एक नया अवसर मिलेगा।

वैश्विक स्तर पर जो शीर्ष के 10 मैन्युफैक्चरिंग देश हैं उनके यहां भी निर्माण कारखानों पर कर की प्रभावी दर हमसे ज्यादा हो गई है। मतलब चीन, यूनाइटेड किंगडम, कोरिया, इटली, जापान, फ्रांस आदि देशों के कॉर्पोरेट इनकम टैक्स अब भारत के नए प्रभावी कॉर्पोरेट इनकम टैक्स 17फीसदी से ज्यादा हो गए हैं जबकि भारत की दर पहले से किफायती हो गई है। टैक्स की दर के हिसाब से सिंगापुर को सबसे टैक्स फ्रेंडली देश माना जाता है। अब भारत की नई निर्माण यूनिट पर लगने वाली 17 फीसदी की दर और सिंगापूर की दर समान हो गई है। ऐसी दशा में जो वैश्विक निवेशक हैं उनके लिए भारत अब नए ट्रेंड के रूप में सामने आ रहा है। विदेशी निवेशक भी अब महसूस कर रहे हैं कि भारत की सोच अब बदल रही है। भारत सरकार को विदेशों में जाकर अपनी नीतियों का रोड शो करना चाहिए ताकि इस मौके का जल्द से फायदा उठा सके।

इन सब सुखद संयोगों के बीच एक सुखद संयोग यह भी है कि योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश, जो पहले मैन्युफैक्चरिंग में पिछड़ा राज्य था, भारत ही नहीं विश्व का मैन्युफैक्चरिंग हब बन सकता है क्योंकि नई यूनिट लगाने पर निर्माणकर्ता को सिर्फ इसी टैक्स का फायदा नहीं मिलेगा बल्कि कई सारे छूट मिल रहे हैं जो उसके पूंजीगत लागत से लेकर उत्पाद लागत को कम करने में सहायक सिद्ध होंगे। डिफेंस कारीडोर भी यूपी में मील का पत्थर साबित होगा।

पूरे देश में सड़कों का जाल बिछ गया है। सरकार लॉजिस्टिक नीति पर विशेष ध्यान दे रही है। सभी पुरानी अप्रासंगिक हो चुकी औद्योगिक नीतियों को बदला जा रहा है ताकि निवेश सुगम हो सके। राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति के तहत सरकार की मंशा देशभर में बिना किसी अवरोध के वस्तुओं के परिवहन को बढ़ावा देना और कारोबारियों के लिए माल परिवहन पर होने वाले खर्च को कम करना है। प्रस्तावित नीति के तहत गोदामों की संख्या और क्षमता बढ़ाई जाएगी। खामियां दूर की जाएगी, ताकि लॉजिस्टक्स खर्च में कमी आए। जेवर और बैंगलोर एयरपोर्ट पर विश्वस्तरीय कार्गो हब बन रहा है। चारों तरफ एयर कनेक्टिविटी बढ़ रही है। भारत में जितना खर्च लॉजिस्टक्स पर होता है, वह जीडीपी के 14 फीसदी के बराबर है। सरकार इस खर्च को घटाकर जीडीपी के नौ फीसदी के बराबर लाने की योजना बना रही है। भारत सरकार के बदलाव और राज्यों के साथ सुसंगतता सिर्फ यूपी ही नहीं, महाराष्ट्र, गुजरात और अन्य प्रदेशों में भी औद्योगिक क्रांति लाएगी और चीन को टक्कर देगी।

पंकज गाँधी 

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