समूल नाश ही है अलगाववाद का स्थायी इलाज

पीएफआई की ही भांति देश की सीमा के भीतर बहुत सारे अलगाववादी संगठन अपने गलत कार्यों को अंजाम देने के लिए तत्पर हैं। सरकार उन पर अंकुश लगाने अथवा समूल सफाए के लिए दीर्घकालिक अभियान चला रही है, लेकिन ऐसे संगठनों के सदस्य अन्य नामों से नया संगठन खड़ा कर लेते हैं। साथ ही, इन्हें बाहरी देशों और अलगाववादी संगठनोें से भी लगातार सहायता मिलती रहती है।

अलगाववाद फिर एक बार पांव पसार रहा है। बदलते दौर में चुनौतियां भी बढ़ चली हैं। जहां पहले ये सार्वजनिक हिंसक घटनाओं के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराते थे, उसकी जगह अब लक्षित हिंसा वाले आक्रमणों ने ले ली है। बदलावों वाला यह आतंक कहीं अधिक खतरनाक है। पहले यह सोशल मीडिया के माध्यम से अपने लोगों के साथ भेदभाव की झूठी खबरें फैलाते हैं। फिर इसके लिए किसी समुदाय विशेष को दोषी करार दे उसके प्रति जहर भरते हैं।  ये अलगाववादी नियमित होने वाले अपने सामुदायिक-धार्मिक जुटानों का भी उपयोग खूनी मंसूबों के लिए करते हैं। यहां आगंतुकों को धार्मिक मान्यताओं पर चोट और अत्याचार की काल्पनिक कहानियां सुनाई जाती हैं। फिर गल्पों वाला इतिहास सुनाकर अपने पृथक पहचान की बात समझाते हुए स्वतंत्र देश की वकालत की जाती है।

इसके बाद धमकी, लक्षित हिंसा और उत्तेजक प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू होता है। पूर्वोत्तर के अलगाववादी संगठन जातीय, तो खालिस्तानी मजहबी मुल्क के लिए अभियान चलाते रहे हैं। इस्लामिक अलगाववादी मुस्लिम देश और खलीफाई शासन के लिये लगातार अलगाववादी वारदात करते रहे हैं। कश्मीरी अलगाव एवं आतंकवाद का भी यही कारण है। ऐसी गतिविधियों को आप ‘बेअदबी के दावे’ और ‘खतरे में दीन’ जैसे आरोपों से भांप सकते हैं। वैसे हाल के दिनों में एक नया चलन भी देखने को आया है। अगर आप इनसे असहमति रखते हैं तो आपको धमकी भरे फोन कॉल भी आ सकते हैं। हाल ही में मुस्लिम समूहों के उत्तेजक प्रदर्शनों से चिढ़ कर जिन लोगों ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट से विरोध दर्ज किया वो सभी निशाने पर हैं।  ठीक ऐसा ही तरीका खालिस्तानी अलगाववादी समूहों का भी है। आप अगर इनके असहमति प्रगट करें या फिर सार्वजनिक तौर पर इन विचारों का खंडन करें तो इसके बाद आपको धमकियां मिलनी शुरू हो जाएंगी। सिख समुदाय के जो लोग पृथक खालिस्तान से असहमति रखते हैं उन्हें तो सार्वजनिक रूप से जलील भी किया जा रहा है। ऐसा एक वीडियो कनाडा के किसी गुरुद्वारे का सोशल मीडिया पर खूब चला था। इसमें खालिस्तानी आतंकियों का एक समूह कीर्तन पाठ को रोक खालिस्तान के पक्ष में आह्वान कर रहा है। वहीं असहमति वाले बुजुर्गों को धमकाया भी जा रहा है। वैसे भारत में प्रगतिशील मुसलमान और उदार हृदय सिखों को ये अलगाववादी समूह अपने लिये खतरा मानते हैं, जिसकी कीमत इन्हें कौम के गद्दार और तनखैया घोषित हो चुकानी पड़ रही है। तस्लीमा नसरीन और मंजीत सिंह बिट्टा जैसों के ऊपर सदैव निर्मम हत्याओं का खतरा बना रहता है। सिख अलगाववादी संगठनों को जहां पाकिस्तान और कनाडा से खाद पानी मिल रहा है वहीं इस्लामिक आतंकियों के लिए उपमहाद्वीप के देश पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश किसी जन्नत से कम नहीं हैं। बाकी अरब का पेट्रो डॉलर और मजहब के नाम पर दुनिया भर का समर्थन तो है ही। ऐसे में इस प्रकार की बढ़ती घटनाओं को उन्माद का प्रगटीकरण मानने की जगह अलगाववादी वारदात मानकर विचार करने की जरूरत है। गृह मंत्रालय के द्वारा प्रतिबंधित अलगाववादी संगठनों की सूची से भी इस बात को समझा जा सकता है। इसमें करीब चौदह मुस्लिम संगठन हैं जिसमें भारत के बाहर चलाये जाने वाले आईएसआईएस, इस्लामिक स्टेट्स और बांग्लादेश से चलाया जाने वाला जमात उल मुजाहिद्दीन है। वहीं पाकिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर के भी कई संगठन सक्रिय हैं। इनमें जैश ए मोहम्मद, हरकत उल मुजाहिद्दीन, हिजबुल मुजाहिद्दीन और अफगानिस्तान में खड़ा किया गया लश्करे तैयबा है।

इनके अलावा भी कई मुस्लिम अलगाववादी संगठन भारत में कार्यरत हैं जिनमें से कई कश्मीर घाटी से सम्बंधित हैं। बदलते वक्त के साथ मोदी राज में जहां सीमाओं पर अलगाववादी वारदातों में कमी आई है वहीं कश्मीर में भी अब आतंकवाद की कमर तोड़ी जा चुकी है। देश में आए दिन सार्वजनिक जगहों पर होने वाले विस्फोट भी सन् 2014 के बाद देखने को नहीं मिल रहे हैं। ऐसे में मुस्लिम अलगाववादी संगठन सरकार की नीतियों के विरोध, किसी वक्तव्य की आड़ में हिंसा, अलगाववादी गतिविधि और लक्षित हत्याओं का सहारा ले रहा है। वहीं सामाजिक गतिविधियों की आड़ में ये आतंकियों को पालने-पोसने  में लगे हैं। इनमें से सिमी और दीनदार अंजुमन अब प्रतिबंधित संगठनों की श्रेणी में हैं किंतु पीएफआई जैसे संगठन झारखंड से केरल तक अपने पांव जमा चुके हैं। अब तो ये देश को डरा भी रहे हैं। हाल ही में पैगम्बर मोहम्मद निंदा विवाद में इन्होंने हजारों लोगों को लेकर केरल में प्रदर्शन निकाला था। जिसमें हिन्दू एवं ईसाइयों को सार्वजनिक धमकियां दी गई। ऐसे में इस प्रकार के संगठनों पर भी अविलम्ब प्रतिबंध और इसके कर्ताधर्ता को गिरफ्तार करने की जरूरत है। इसी प्रकार का हाल कुछ खालसा आतंकियों का भी है। इनके करीब आधा दर्जन संगठन किसी न किसी रूप में सक्रिय रहे हैं। भारत की कमजोर न्यायिक व्यवस्था और लचीले लोकतंत्र के नाते इनके कई अलगाववादी बाहर घूम रहे हैं। अब जब खालिस्तान रेफरेंडम की मांग जोरों पर है। हिमाचल से हरियाणा तक पोस्टर चिपकाये जा रहे हैं। पंजाब के गांव-कस्बों में आये दिन खालिस्तान समर्थक प्रदर्शन हो रहे हैं जबकि दुनिया भर में भारत की छवि खराब की जा रही है। आवश्यकता हो तो अंग्रेजों द्वारा बनवाये शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के ऊपर भी अनुशासनात्मक कार्यवाही हो। वैसे इस्लामिक और खालसाई आतंकियों में एक और भी समानता है। ये अपनी सुविधा और प्रतिबंधों से बचने के लिए अकसर नाम भी बदलते रहते हैं। पाकिस्तान प्रायोजित कई प्रमुख अलगाववादी संगठनों के दो या तीन नाम तक होते हैं। मसलन हरकत उल मुजाहिद्दीन तीन नामों के साथ तो लश्करे तैयबा दो नामों के साथ गतिविधियों को चलाता है, जबकि कई बार पुराने संगठन के कुछ लोग मिल जुल कर नये नाम के साथ संगठन चलाते हैं। ऐसा खालिस्तानी आतंकियों के मामले में देखने को आता है। वहीं उत्तरपूर्व के अलगाववादी संगठनों का तरीका इनसे उलट रहा है। वहां अलग-अलग जातीय समूह के अपने अलगाववादी संगठन रहे हैं। इनमें जहां कुछ की मांग स्वायत्तता तो कुछ की पृथकतावादी भी रही है।  ईसाई मिशनरियों की शिक्षा और विदेशी शक्तियों के प्रभाव के नाते यहां एक समय अलगाववाद बहुत फला-फूला।  ऐसा ही कुछ मसला भारत नेपाल सम्बधों को लेकर भी है। ब्रिटिश हुक्मरानों के शातिर चाल और स्वतंत्रता बाद प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू की नासमझी के नाते नेपाल भारत के निकट हो कर भी दूर है। नेपाल की फिजाओं में केवल भारत विरोध ही नहीं वृहत्तर नेपाल का भी विचार दौड़ता है। अतीत में पृथक गोरखालैंड की मांग के पीछे भी ऐसी ही शक्तियां थी। ऐसा ही एक संगठन अखिल भारतीय नेपाली एकता समाज है। यह अतिवादी संगठन यूं तो तमिल ईलम संगठनों की तरह जातीय अस्मिता की बात करता है किंतु इसका उद्देश्य भारत मे रहने वाले नेपाली मूल के लोगों को वृहत्तर नेपाल के लिए उकसाने-भड़काने का है। भारत के आतंक की चर्चा वामपंथी सशस्त्र धड़ोें के बिना पूर्ण नहीं होगी। विभिन्न माओवादी और पीपुल्स धड़े सामाजिक न्याय की आड़ में देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त रहे हैं। सर्वहारा की बात करने वाले इन समूहों का हिंसक अतीत और चाइनीज सम्बंध सबके सामने है।  किंतु ये अब भी नागरिक अधिकार के नाम पर समर्थक, राजनीतिक दल, नागरिक संगठन और तथाकथित मानवतावादी समाजसेवियों के नाते बचे खुचे हैं। ऐसे में आवश्यकता है कि देश हित में हर ऐसे समूह एवं संगठनों का पूर्णरूपेण सफाया किया जाए तथा आने वाले खतरों को भापकर पहले ही गतिविधियां प्रारम्भ की जाएं।

 

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