आजादी के अमृत महोत्सव में महिलाओं की हिस्सेदारी

आजादी का अमृत महोत्सव महिलाओं के बिना पूरा नहीं हो सकता। आज वैश्विक पटल पर भारत विकासशील देश से विकसित देशों की श्रेणी में आगे बढ़ रहा है जिसमें महिलाओं की भूमिका को दरकिनार नहीं किया जा सकता है। यूं तो पुरातन काल से ही भारत में महिलाओं को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता रहा हैं यहां तक कि देश की आजादी में भी महिलाओं का अतुलनीय योगदान रहा, लेकिन जब बात वैश्विक स्तर पर महिलाओं के सशक्तिकरण की होती है तो भारत में महिलाओं की स्थिति काफ़ी दयनीय नज़र आती है। आंकड़ो की ही माने तो महिला सशक्तिकरण में 146 देशों की श्रेणी में भारत 137वें स्थान पर है। ऐसे में सवाल यही उठता है कि 75 वर्षों के बाद भी महिलाओं की स्थिति में कुछ ख़ास अंतर क्यों नहीं आया? आजादी के आंदोलन से लेकर खेल के मैदान तक महिलाओं ने हर बार खुद को साबित किया है। बात अगर हमारे संविधान की ही करे तो संविधान में समता और समानता की पैरवी की गई है। फिर क्यों 21वीं सदी में भी महिलाओं को अपने हक के लिए लड़ाई लड़नी पड़ रही है।
अभी हाल ही में देश के भीतर एक सुखद तस्वीर जरूर देखने को मिली। जब एक आदिवासी महिला ने देश के सर्वोच्च पद की शपथ ली। द्रौपदी मुर्मू देश की 15वीं महिला राष्ट्रपति बनी। मुर्मू ने देश की दूसरी महिला और पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति पद की शपथ ली। जबकि, खुद को लोकतंत्र का बादशाह कहने वाले अमेरिका के 250 सालों के इतिहास में एक भी महिला राष्ट्रपति नहीं हुई। देश में भी सर्वोच्च पद तक पहुंचने के लिए भले ही महिलाओं को लंबा इंतजार और संघर्ष करना पड़ा। लेकिन जब एक पिछड़ी जाति की महिला देश के सबसे बड़े पद पर आसीन हो तो महिलाओ के लिए बेहतरी की उम्मीद की जा सकती है। लेकिन अब भी ऐसी कई चुनौतियां है। जिनका सामना देश की आधी आबादी को करना होगा।
वैसे तो आजाद भारत में महिलाओं की बेहतरी के लिए कई काम हुए है। जिसमें आर्थिक विकास के कार्यक्रम भी शामिल है। जिससे महिलाओं को रोजगार के अवसर उपलब्ध हुए है। माहिलाएं फाइनेंस और बैंकिंग सेक्टर से जुड़कर खुद को मजबूती दे रही है साथ ही अन्य महिलाओं के लिए रोजगार के साधन भी उपलब्ध करवा रही है। इससे न केवल महिलाओं का विकास हो रहा है बल्कि देश की तरक्की में भी यह सुनहरे सपनों को साकार कर रहा है। यहां तक कि देश मे महिलाओं को शिक्षित करने के लिए भी भरसक प्रयास किए गए। महिलाओं को समान शिक्षा का अधिकार उन्नत भारत के लिए सराहनीय पहल थी। आज माहिलाएं खुद को शिक्षित कर रही है। लेकिन आज भी देश में ऐसे अपवाद मौजूद है जहां महिलाओं को शिक्षा नहीं दी जाती। आंकड़ो की ही माने तो 21 प्रतिशत लड़कियां आज भी शिक्षा से वंचित है। जिसे लेकर प्रयास जारी है। वैसे तो खेल का मैदान हो या फिर कारपोरेट सेक्टर हर जगह महिलाओं ने अपने परचम का लोहा मनवाया है। अभी हाल ही में खेलो में महिलाओं के प्रदर्शन को भला कैसे नकारा जा सकता है। महिलाओं के बढ़ते कदम इस बात की गवाही है कि आजादी के अमृत काल में माहिलाएं निरंतर आगे बढ़ रही है। ऐसा नहीं है कि आज भी समाज में महिलाओं के लिए राह आसान हो गई है। पर महिलाओं ने हर चुनौती का बखूबी सामना किया है।
देश के विकास में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी भारत के आर्थिक विकास को संबल दे रही है। साथ ही मुद्रा योजना, दीनदयाल अंत्योदय योजना, राष्ट्रीय
ग्रामीण आजीविका मिशन जैसी योजनाएं ग्रामीण महिलाओं के लिए आर्थिक प्रगति की राह सुगम कर रही है। ये माहिलाएं पर्यावरण के प्रति भी काफी सजग प्रहरी की भूमिका अदा कर रही है। यहां तक कि कृषि कार्यो में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। माहिलाएं डेयरी उद्योग, पशुपालन, मुर्गी पालन जैसे कुटीर उद्योगों का संचालन भी कर रही है। लेकिन ये भी सच है कि अभी भी महिलाओं को पुरुषों की बराबरी करने के लिए लम्बा सफर तय करना होगा। आज भी समाज में पुरुषवादी मानसिकता का बोलबाला है। जिससे महिलाओं को बाहर निकलना होगा। न केवल राष्ट्रीय स्तर पर बल्कि अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी माहिलाओं के विकास के लिए विदेश नीति को भी सशक्त बनाना होगा।
-सोनम लववंशी

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