भाजपा की राजनीतिक यात्रा

राष्ट्रीय विचारों को अपने कार्यों के माध्यम से अनुप्रेषित करने वाली भाजपा ने पूरे कार्यकाल में कभी भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। इसी का परिणाम है कि केंद्र में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार है तथा देश के लगभग आधे से भी अधिक राज्यों में आज भाजपा शासन कर रही है।

भारत को समृद्धि, एकता, शक्ति स्वावलम्बन और आदर सहित सम्मान दिला कर सम्पूर्ण विश्व में सर्वोच्च स्थान दिलाने का संकल्प लेकर एक राष्ट्रवादी राजनीतिक संगठन के रूप में इस दल का गठन किया गया था। इसकी स्थापना 8 अप्रैल 1980 को नई दिल्ली के कोटला मैदान में एक विशाल कार्यकर्ता सम्मेलन बुलाकर की गई जिसके प्रथम अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेई निर्वाचित हुए थे। भाजपा का भारत के राजनीतिक स्तर पर यह पुनर्जन्म था। इसका इतिहास भारतीय जन संघ के चुनाव चिह्न दीपक से जुड़ा हुआ है। 1947 में भारतीय स्वतंत्रता के बाद कई ऐतिहासिक घटनाएं घटित हुई। महात्मा गांधी की हत्या के बाद 1925 में नागपुर में गठित हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा सरदार वल्लभभाई पटेल ने कालांतर में प्रतिबंध को निराधार पाकर प्रतिबंध हटा लिया था। सरदार पटेल की मृत्यु के बाद कांग्रेस और जवाहरलाल नेहरू का भारत पर अधिनायकत्व स्थापित होने लगा था। भारतीय जनमानस को लगने लगा था कि पंडित नेहरू अल्पसंख्यक तुष्टीकरण, समाजवाद, परमिट कोटा राज, राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति लापरवाही, जम्मू एवं कश्मीर विषय पर शेख अब्दुल्ला के साथ खड़े होने की प्रवृत्ति तथा विस्थापितों के प्रति अनदेखी आदि कारणों से समाज में व्याकुलता बढ़ाने में सिद्धहस्त हो चुके हैं। बांग्लादेश और पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर भयंकर अत्याचार होने लगे। भारतीय जनमानस ने बंटवारे के समय की भीषण विभीषिका को जिया था। राष्ट्रभक्त जनता के मन में कई प्रश्न उठ रहे थे।

पूर्व में भी वह खिलाफत आंदोलन, मोपला कांड, जिन्ना और मुस्लिमों को विशेष महत्व देते कांग्रेस को देख चुकी थी। भारत के बहुसंख्यक समाज को लगा कि हमारा हित वर्तमान परिस्थितियों में कहां सुरक्षित है? बंगाल के भद्र राजनीतिज्ञ श्यामा प्रसाद मुखर्जी 1943 से 1946 तक हिंदू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके थे। संविधान निर्माण के समय से ही अनुच्छेद 370 के वे घोर विरोधी थे। उनका दृष्टिकोण राष्ट्रीय हित और भारत की अखंडता में था। उनका नारा था, “एक देश दो विधान दो प्रधान नहीं चलेंगे।” उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक माधवराव सदाशिव गोलवलकर से भी मिलकर विचार-विमर्श किया और सहयोग मांगा। उस समय डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी कांग्रेस में ही थे। परंतु वे डॉ राजेंद्र प्रसाद, सरदार पटेल, पंडित मदन मोहन मालवीय, डॉ सुभाष चंद्र बोस जैसे राष्ट्रवादी विचारों से ओतप्रोत थे। उन्होंने कांग्रेस से त्यागपत्र देकर 1951 में भारतीय जन संघ नामक नए राजनीतिक दल का गठन किया।

भारतीय जनसंघ ने 1953 में जम्मू कश्मीर पर आंदोलन चलाया था। पंडित दीनदयाल उपाध्याय मुखर्जी के संगठन मंत्री थे। वे पर्दे के पीछे से सम्पूर्ण कमान संभाले थे। पंडित श्यामा प्रसाद मुखर्जी की योजनाबद्ध हत्या कश्मीर की जेल में हुई थी। 1952 में हुए राष्ट्रीय चुनाव में भारतीय जनसंघ को मात्र 2 सीटें मिली थी। 1977 में इंदिरा गांधी द्वारा देश पर थोपे गए आपातकाल की समाप्ति के पश्चात भारतीय जनसंघ का अन्य दलों के साथ जनता पार्टी में विलय हो गया। फलतः कांग्रेस चुनाव हार गई। 3 वर्ष के ब्रेक के बाद 1980 में जनता पार्टी विघटित हो गई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दोहरी सदस्यता को आधार बनाकर मोरारजी देसाई की सरकार गिरा दी गई और भारतीय जनसंघ के पदचिह्ननों को पुनः संयोजित करते हुए महाराष्ट्र के मुंबई शहर में समुद्र के किनारे 6 अप्रैल 1980 को लाखों जनता के समक्ष नई राजनीतिक पार्टी भारतीय जनता पार्टी के नाम से बनी। इस दल की प्रमुख विचारधारा ‘हिंदू राष्ट्र, प्रखर राष्ट्रवाद, आर्थिक उदारीकरण, अखंड मानवतावाद’ रखा गया।

बीजेपी ने राष्ट्रवाद के साथ गांधीवादी समाजवाद को भी अपनाया। 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या हो गई। तत्पश्चात राजीव गांधी को सहानुभूति लहर में कांग्रेस को 404 लोकसभा सीटों पर विजय मिली और भारतीय जनता पार्टी को मात्र 2 सीटों पर विजय हासिल हुई, जिसमें पहली सीट मेहसाणा से एके पटेल और दूसरी सीट आंध्र प्रदेश की स्वामी कूड़ा सीट से चंदू भाई पाटिया जगा रेड्डी को प्राप्त हुई। तब से भारतीय जनता पार्टी निरंतर विस्तार करती हुई, 2014 और फिर 2019 के चुनाव में 303 और पूरे गठबंधन को 353 सीटें प्राप्त हुई हैं। इस प्रकार कांग्रेस के बाद बीजेपी पहली ऐसी पार्टी है जो पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई है। 2014 में 543 लोकसभा सीटों में से 282 सीटें बीजेपी को मिली जो 2019 में बढ़कर 303 हुई। बीजेपी का 2014 में 31% वोट प्रतिशत था, जो 2019 में बढ़कर 37.6 हो गया। एनडीए के साथ इसका संयुक्त वोट प्रतिशत 45% तथा वोटर संख्या 60.37 करोड़ तक पहुंच गई। 2019 में बीजेपी 437 स्थानों पर चुनाव लड़ी थी। 10 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में बीजेपी अकेले अपने दम पर सभी सीटें जीती। कुल 12 राज्यों में 50% से अधिक मत प्राप्त हुए। इस चुनाव में जातीय वंशवाद एवं परिवारवाद के नाश के संकेत मिले। आज बीजेपी भारतीय संसद और राज्य विधान परिषदों में प्रतिनिधित्व के मामले में भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है और प्राथमिक सदस्यता के मामले में यह पूरे विश्व का सबसे बड़ा राजनीतिक दल है। बीजेपी अब 42 वर्ष से भी अधिक पुरानी पार्टी के रूप में अपने संगठन, इतिहास, विचारों, रणनीति, नेताओं व सदस्यों के कारण एक महान राजनीतिक दल के रूप में विश्व विख्यात हो चुकी है। इसके समवैचारिक संगठनों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और भारतीय जनता युवा मोर्चा से नए युवकों का सदैव सहयोग, सदस्यता तथा नया उत्साह प्राप्त होता रहता है। इस दल की उपलब्धियां अनेकों हैं जो भारत के गौरव को बढ़ाने वाली हैं। आज दल की लोकप्रियता भारत में चरम पर है। इस दल का जनसमर्थन लगातार बढ़ रहा है।

बीजेपी की विशेषता यह है कि यह सुदृढ़, सशक्त, समृद्ध, समर्थ एवं स्वावलम्बी भारत के निर्माण हेतु सक्रिय रहती है। इसके पास कर्मठ, ईमानदार तथा चरित्रवान कार्यकर्ताओं व नेताओं की भरमार है। पार्टी की कल्पना एक ऐसे राष्ट्र की है जो आधुनिक दृष्टिकोण से युक्त एक प्रगतिशील व प्रबुद्ध समाज का प्रतिनिधित्व करता है तथा प्राचीन भारतीय सभ्यता एवं सांस्कृतिक मूल्यों से प्रेरणा लेते हुए महान विश्व शक्ति एवं विश्व गुरु के रूप में विश्व पटल पर स्थापित है। इसके साथ ही विश्व शांति तथा न्याययुक्त अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को स्थापित करने के लिए विश्व के राष्ट्रों को प्रभावित करने की क्षमता रखे। भारतीय संविधान में निहित मूल्यों और सिद्धांतों के प्रति निष्ठापूर्वक कार्य करते हुए लोकतांत्रिक व्यवस्था पर आधारित राज्य को यह दल अपना आधार मानता है। पोखरण परमाणु विस्फोट, राम मंदिर निर्माण में व्यापक सहयोग तथा आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी सहित भूमि पूजन, अनुच्छेद 370 की समाप्ति तथा सफलतापूर्वक कश्मीर को उग्रवादियों से मुक्त कराने के प्रयास, उरी सर्जिकल स्ट्राइक, सेना को विस्तारित कर उसे स्वावलम्बी बनाने का सफल प्रयास, कोरोना में देश को बचाने हेतु टीकाकरण कीर्तिमान, समाज व्यवस्था के साथ बड़ी संख्या में गरीबों को मुफ्त राशन, विश्वस्तरीय सड़कों का संजाल, सीएए विधान को पास कराकर उससे उपजे आंदोलनों पर काबू पाना, तलाक व्यवस्था की समाप्ति आदि ऐसे कार्य हैं जो भारतीय जनमानस पर अपनी अमिट छाप छोड़ चुके हैं। इसके अतिरिक्त भी भारतीय जनमानस को ऐसी कई कार्य योजनाएं, दंगा रहित प्रदेश, अपराधियों पर अंकुश, स्वास्थ्य, रोजगार आदि कार्य हैं जो जनमानस में इस दल के लिए विश्वास उत्पन्न करते हैं।

आज कुछ बातें यदि इस दल के समर्थन में, साथ में हैं तो कुछ बाधाएं होती हैं जो पार्टी के विस्तार में बाधा भी मानी जाती हैं। जैसे पार्टी मुख्य रूप से हिंदी प्रदेशों यानी उत्तर भारत में अधिक लोकप्रिय है परंतु केरल, तमिलनाडु, प. बंगाल, पंजाब, कश्मीर, ओडिसा, झारखंड, छत्तीसगढ़ जैसे स्थानों पर यह अपना प्रभाव नहीं बढ़ा पा रही है। यद्यपि इन स्थानों पर विचारधारा और सिद्धांत भी भाजपा के लिए अनुकूल नहीं हैं। कहीं परिवारवाद, वंशवाद प्रभुत्व में हैं तो कहीं जनसंख्या अनुपात उचित नहीं है। कहीं-कहीं वामपंथ बाधक है तो कहीं क्षेत्रवाद और भाषा बाधक बन रही है। क्षेत्रीय दल अपने निहित स्वार्थों के कारण पहले से प्रदेशों में सत्तारुढ़ हैं। ऐसी परिस्थति में भाजपा अपने विस्तार को नया पंख देकर विस्तार की नई योजना बना रही है। वर्तमान में ऐसे प्रदेश जहां ठीक से भाजपा अपना संगठन नहीं खड़ा कर सकी थी, वहां युद्ध स्तर पर संगठन खड़ा कर रही है। संसदीय दल में बड़ा परिवर्तन कर सभी को प्रतिनिधित्व दिया जा रहा है। विस्तार में भी सभी को साथ लिया जा रहा है।

 

आपकी प्रतिक्रिया...