बदला नहीं बदलाव

राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय महिलाओं के बढ़ते मजबूत कदम जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उनके तेजी से बढ़ते प्रभाव को दर्शाते हैं। कुछ कर गुजरने का यह जज्बा राष्ट्र और समाज की प्रगति के सार्थक मोड़ों का द्योतक है। यही सच्चा नारीवाद है जो अपने पिछड़ेपन के लिए किसी वर्ग पर आरोप लगाने की बजाय अपनी प्रगति के दम पर उस रेखा को छोटा करने का प्रयास करता है।

यह दशक भारत का है। जीवन और समाज के प्रत्येक पक्ष में हम अपनी वैश्विक उपस्थिति को और मजबूत करते जा रहे हैं। चाहे आर्थिक पक्ष हो या सामरिक, वैश्विक स्तर पर मजबूत स्थिति हो या भारत की संस्कृति के प्रति एक बार फिर बढ़ता वैश्विक झुकाव; भारत लगातार कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ता जा रहा है। ठीक इसी तरह हमारा देश खेलों के अंतरराष्ट्रीय क्षितिज पर भी एक चमकदार सितारे के समान उभर कर सामने आया है। बर्मिंघम में 72 देशों के बीच खेले गए 22वें राष्ट्रमंडल खेलों का हर दिन भारत के लिए खुशियों पर खुशियां लाया। इस वर्ष हमने 22 स्वर्ण समेत 61 पदक जीते। ये खेल इसलिए भी स्मरणीय बन गए हैं कि इन्होंने देश की खेल संस्कृति में न सिर्फ चार चांद लगाए हैं बल्कि उनमें कई खुशनुमा रंग भरे हैं और नई ऊंचाइयों को स्पर्श किया है। पहले हम अक्सर मन मसोसकर रह जाते थे कि एक अरब से अधिक जनसंख्या वाला हमारा देश गिने-चुने खेलों में भाग लेकर भी कोई खास कमाल नहीं दिखा पाता था। हमारी झोली में उंगलियों पर गिने जाने लायक कुछ ही स्वर्ण पदक पड़ते थे और हमें चंद रजत तथा कांस्य पदकों से संतोष करना पड़ता था। इसमें भी महिलाओं की भागीदारी अति अल्प होती थी।

लेकिन वक्त के करवट लेने के साथ-साथ हमारी नजर और नजरिये में बदलाव आया है। अब हम अतीत का रोना रोने के बजाय वर्तमान और भविष्य को सजाने संवारने और एक बड़ी खेल ताकत बनाने में विश्वास करते हैं। पिछले दो दशकों से हम लगातार राष्ट्रमंडल खेलों के साथ ही साथ अन्य खेलों में एक विश्वसनीय स्थान प्राप्त करते रहे हैं। 2002 से लेकर अब तक हमने किसी भी राष्ट्रमंडल खेल में पचास से कम पदक नहीं प्राप्त किए। 2010  दिल्ली में आयोजित राष्ट्रंमडल में तो भारत में 38 स्वर्ण के साथ पदकों का शतक भी पूरा किया था। उन सौ पदकों में से 37 पदक महिलाओं ने जीते थे। यह संख्या बहुत कुछ कहती है। कुछ ऐसा ही इस बार भी हुआ। कुछ दशक पहले तक एथलेटिक्स, ट्रैक और फील्ड के खेलों में पूरी तरह मात खाने पर हमारा सिर शर्म से झुक जाता था लेकिन इस बार दस किलोमीटर के रेस वॉक में प्रियंका गोस्वामी ने रजत और भाला फेंक में अन्नू रानी ने कांस्य पदक प्राप्त किया। बैडमिंटन में एक स्वर्ण, रजत और कांस्य जबकि बॉक्सिंग में दो स्वर्ण और एक कांस्य प्राप्त किया। कुश्ती में दो जबकि वेटलिफ्टिंग में एक स्वर्ण प्राप्त किए। भारत की महिलाओं ने कुल 26 पदक अपने नाम किए जिनमें 9 स्वर्ण, 7 रजत तथा 10 कांस्य पदकों पर उन्होंने अपने नाम सुनहरे अक्षरों में लिखे। इस जीत के बाद हम ताल ठोककर कह सकते हैं कि इन खेलों ने भारतीय नारी को नई और सशक्त परिभाषा दी है।

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि खेलों में तेजी से बढ़ते भारतीय खिलाड़ियों के कद के प्रति हर भारतीय महिला अथवा पुरुष खिलाड़ी का योगदान अमूल्य कहा जाएगा लेकिन यह मानने में कोई संकोच नहीं करना चाहिए कि भारत की असली ताकत से रूबरू होने के लिए छोटे शहर, कस्बों और गांवों में बिखरे अनमोल हीरों का मोल जानने और उन्हें गढ़ने-तराशने का समय आ गया है। राष्ट्रमंडल खेलों में कई गुदड़ी के लाल अपने चमत्कारी खेल से आम आदमी से खास आदमी बन गए हैं। देश की महिलाओं ने लान बॉल नाम के एक लगभग अनजान खेल में स्वर्ण पदक जीता। इस खेल की चारों खिलाड़ी देश के सुदूर क्षेत्रों से आती हैं और स्पांसर के बिना उनकी वहां तक पहुंचने की मेहनत और लगन किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। भारतीय नारी की यह मेहनत और वैश्विक स्तर पर अपना परचम लहराने की प्रबल उत्कंठा ही वास्तविक नारीवाद या यूं कहे, ‘फेमिनिज्म’ है। यह फेमिनिज्म वह नहीं है जिसकी अश्लील तख्तियां, समूची पुरुष जाति से बदला लेने और अपनी संस्कृति को रौंदकर वेस्टर्नाइजेशन की नंगी दुनिया में धकेलने को उद्यत, आए दिन मेट्रोपोलिटन सिटीज के चौराहों पर दिख जाती हैं। यह बदला लेने को उद्यत रहने की बजाय बदलाव के प्रति समर्पित समानता की कहानी है, जिसकी आवश्यकता प्रत्येक समाज, संस्कृति तथा राष्ट्र को है। भारतीय संस्कृति में ‘वाद’ जैसे शब्द प्रयुक्त ही नहीं किये जा सकते क्योंकि यह संस्कृति सम्पूर्ण जीवों में समानता की बात करती है। इसलिए यह पिछले बारह सौ वर्षों के सांस्कृतिक संक्रमण काल में हाशिए पर चली गई नारी के उत्थान का द्योतक है।

इस मनोवृत्ति की आवश्यकता केवल महिलाओं को नहीं बल्कि समूचे समाज को है क्योंकि यदि समाज का कोई भी धड़ा पीछे रह जाता है तो प्रगति का पहिया अवरुद्ध हो जाएगा, साथ ही यदि वह तथाकथित फेमिनिज्म और पैट्रियार्की की भांति अपनी राह से बिदक जाए तो भी। प्रख्यात् नारीवादी लेखिका सिमोन द बुआ के अनुसार, “नारीवाद के सम्बंध में प्रचलित कई अफवाहें भी हैं। जैसे, कुछ लोगों का मानना है कि नारीवादी होने का मतलब पुरुषों का विरोध है। नारीवाद पुरुषों की अनदेखी बिल्कुल नहीं करता है बल्कि यह समानता के बारे में बात करता है। कई लोगों का यह भी मानना है कि नारीवाद धर्म के खिलाफ है। नारीवाद धर्म और संस्कृति के खिलाफ नहीं है, बशर्ते वह समानता की बात करता हो। एक नारीवादी के तौर पर यदि मेरा धर्म और संस्कृति मुझे कमतर मानते हैं तो मैं उसके खिलाफ हूं। वहीं, कई लोगों का यह भी मानना है कि नारीवाद परिवारों को तोड़ता है। जबकि यह परिवारों को तोड़ना नहीं चाहता बल्कि परिवारों के बीच बराबरी का दर्जा चाहता है।”

यह पश्चिम से आई कोई विचारधारा नहीं है, बल्कि यह वह विचारधारा है जिसे समय-समय पर अलग-अलग वर्ग और समुदायों ने अपनाया है। नारीवाद सबके लिए है और हम सभी को नारीवादी होना चाहिए और कमला भसीन की यह बात याद रखनी चाहिए कि, “ऐसी औरतें भी होती हैं जो दूसरी औरतों के साथ गलत करती हैं और ऐसे मर्द भी होते हैं जो दूसरी औरतों के साथ अच्छा करते हैं। समस्या मर्द होने में नहीं है, सोच में है।” यह जीत भी उसी नारीवाद की अलख है जो बहुत ही शांत और संयत तरीके से सुमधुर तूती की भांति अपनी विजयगाथा लिख रही है। कुछ दशक पहले तक विशुद्ध रूप से पुरुषों के वर्चस्व वाले खेलों में अपने पांव रखती ये खिलाड़ी गांव-देहातों में उपले बीनती उन लड़कियों के लिए प्रेरणाश्रोत बनें जो समूचे आसमान को अपनी मुट्ठी में बांधने के लिए कटिबद्ध हैं!

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