हिन्दुत्व जागरण के प्रखर तेजपुंज आचार्य धर्मेन्द्र

हिन्दुत्व जागरण के प्रखर तेजपुंज आचार्य धर्मेन्द्र परमात्म तत्व में विलीन हो गये।
आचार्य धर्मेन्द्र के विशिष्ट शैली के ओजस्वी आडियो कैसेट सुन सुन कर ही हमारी पीढ़ी भाव से भर श्रीरामजन्म भूमि आन्दोलन में कूद पड़ी थी और मेरा तो परम सौभाग्य है कि छः दिसंबर 1992 को अयोध्या रामजन्म भूमि मुक्ति की पावन घड़ी में मंच से उन का चरमोत्कर्ष भी देखने सुनने को मिला।
आचार्य महाराज का पूरा जीवन हिंदी, हिंदुत्व और हिन्दुस्थान के उत्कर्ष के लिए समर्पित रहा।
अपने पिता महात्मा रामचन्द्र वीर महाराज के समान उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन भारतमाता और उसकी संतानों की सेवा में, अनशनों, सत्याग्रहों, जेल यात्राओं, आंदोलनों एवं प्रवासों में संघर्षरत रहकर समर्पित किया।
आचार्य श्री के जीवन का प्रत्येक क्षण राष्ट्र और मानवता के अभ्युत्थान के लिए सतत तपस्या में व्यतीत हुआ। उनकी वाणी अमोघ, लेखनी अत्यंत प्रखर और कर्म अद्भुत हैं।
13 वर्ष की आयु में वज्रांग नाम से एक समाचारपत्र निकाला। 16 वर्ष की अवस्था में “भारत के दो महात्मा” नामक लेख लिखा। 1959 में हरिवंश राय बच्चन की “मधुशाला” के जवाब में “गोशाला (काव्य)” लिखी।
मुग़ल बादशाह औरंगजेब द्वारा हिन्दुओं पर लगाये गए जजिया और शमशान कर के विरोध में बलिदान देने वाले महात्मा गोपाल दास जी इनके पूर्वज थे।
1966 में गोरक्षा आन्दोलन में आप के पिता महात्मा रामचन्द्र वीर ने अनशनों के सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए थे। आचार्य श्री धर्मेन्द्र ने 52 दिन अनशन किया और आन्दोलन के पहले महिला सत्याग्रह का नेतृत्व करते हुए श्रीमती प्रतिभा धर्मेन्द्र अपने तीन शिशुओ के साथ जेल गयीं।
पुण्यात्मा आचार्य धर्मेन्द्र जी को विनम्र श्रद्धांजलि।
– चाणक्य बक्षी (साभार )

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  1. मनोजकान्त. चलभाष : 9415850478

    !!ॐ!!
    पूज्य आचार्यजी को शत-शत नमन. वे हिन्दू धर्म के प्रखर और प्रख्यात् प्रवक्ता थे. वे आजीवन हिन्दुत्व के लिये ही कार्यरत रहे, हिन्दुत्व का जागरण करने में संलग्न रहे.उनकी तर्कपूर्ण ओजस्वी वाणी सहज ही सबको आकर्षित करती थी.परमात्मा उन्हें सद्गति देंगे ही.
    ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:

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