मणिपुर हिंसा के पीछे किसका हाथ ?

भारत के उत्तर पूर्व में अवस्थित मणिपुर राज्य इन दिनों अशांत है। इसके कारण के तौर पर एक न्यायिक पहल की बात की जा रही है। इसके अनुसार मणिपुर उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को केंद्र के पास एक सिफारिश भेजने को कहा है।यह प्रस्ताव राज्य के मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति दर्जे देने का है।
ताजा घटनाक्रम मे इसे आदिवासी बनाम गैर आदिवासी टकराव के तौर  पर देखा जा रहा है।इसके कारण के रूप एक पक्ष द्वारा एसटी दर्जे की माँग वही दूसरे समूह द्वारा आदिवासी हितों पर चोट की आशंका बताई जा रही है।वास्तव में ये एक फौरी सोच है अगर यह वास्तविक कारण होता तो दूसरे जनजातियो द्वारा भी इसका विरोध होता।इस छोटे से राज्य में जनजाति के तौर पर नागा और कूकी ऐसे दो समूहों सूचीबद्ध है।बात इस रोष प्रदर्शनों की करे तो नागा जनजाति इससे पूरी तरह अलग है।वही कूकी समुदाय इसको लेकर बेहद आक्रामक है।ये हिंसा ऑल ट्राइबल स्टूडेंट्स यूनियन के प्रदर्शन से प्रारंभ हुई है जिसे कूकी आतंकवादी समूहों का समर्थन प्राप्त है।जबकि मैतेई एसटी दर्जे पर राज्य सरकार संवेदनशीलता भाँपते हुए बजाये केंद्र को प्रस्ताव भेजने की जगह पहले ही सर्वोच्च न्यायालय जा चुकी है।ऐसे में इस प्रकार के प्रदर्शन और हिंसा का क्या मतलब है?
दरसल इसके पीछे की सच्चाई कुछ अलग है।बात इसके कारणों की करे तो अनाधिकृत घुसपैठ और मादक पदार्थों का कारोबार इसका एक प्रमुख कारण है।जबकि अतीत की कुछेक गलतियाँ और ईसाई मिशनरियों के विस्तार की आकांक्षा भी इसके अन्यान्य कारण है।बात ड्रग्स की करे मणिपुर कुख्यात गोल्डन ट्रैंगिल का भारतीय दरवाजा रहा है।यह तिकोन दक्षिण पूर्व एशिया के तीन देश म्यांमार लाओस और थाईलैंड को जोड़ कर बनता है।यहाँ के मादक पदार्थ मणिपुर के रास्ते भारत के दूसरे हिस्सों तक जाते रहे है।वही इस कारोबार के फलने फूलने मे आतंकी समूहों का भी हित है।ऐसे में यह कारोबार लगातार बढ़ता रहा है।पहले व्यापार फिर प्रतिबंधित पौधों की खेती और मादक पदार्थों का उत्पादन भी शुरू हुआ।राज्य के सोलह मे से बारह जिले इस कारोबार के जद में है।पूर्व की सरकारें जहाँ इसे लेकर ढुलमुल रवैया रखती थी।
वही राज्य की भाजपा सरकार इसे लेकर आक्रमक है।पिछले छह वर्षो मे करीब उन्नीस हजार एकड़ के आसपास जमीन पर लगाये प्रतिबंधित पौधों को नष्ट किया गया है।वही कई जिले पूर्णरूपेण इससे मुक्त किये गए है।इसमें राजधानी से जुड़ता पूर्वी इंफाल जिला भी है।मुख्यमंत्री वीरेन सिंह सरकार की प्राथमिकताओं मे एक प्रमुख अभियान वॉर ऑन ड्रग्स भी है।इसी सिलसिले में मुख्यमंत्री का एक दौरा राज्य के दूसरे सबसे बड़े नगर चुराचांदपुर मे था।तभी इस पर्वतीय जिले से ये हिंसा शुरू हुई।बात इस हिंसा के पीछे के दूसरे महत्वपूर्ण कारण की करे तो वो घुसपैठ है।यह ड्रग्स कारोबार से सीधे तौर पर जुड़ा मसला है।यहाँ म्यांमार से जुड़ती सीमा के उस पार कुकी जनजाति की एक बड़ी आबादी बसती है।ये मादक पदार्थ व्यापार और जातिये आतंकी समूहों के समर्थक के तौर पर जाने जाते रहे है। इस नाते एक लंबे समय से इनका भारतीय सीमा में गलत तरीके से आना लगा रहा है।इस बीच म्यांमार के नये शासन में ऐसे तत्वों पर लगाम लगाया गया है। ऐसे में ये भारतीय सीमा में प्रवेश कर बसने की जुगत में रहते है।इन सब कारणों से राज्य के हर जनगणना में कूकी समुदाय की आबादी अनुपातिक तौर पर कही अधिक बढ़ी है।
वही राज्य के संरक्षित वन क्षेत्र मे ऐसे ढ़ेरों अनाधिकृत कूकी गाँवों भी मिले है।ये गाँव ड्रग्स और आतंकी गतिविधियों के अड्डे  है।पूर्व के शासकीय उदासीनता नाते ऐसे गाँवों की संख्या लगातार बढ़ती गई है।जहाँ पूरे राज्य में ऐसे 819 नये गाँवों का पता चला है वही इस हिंसा के केंद्र चुराचांदपुर जिले में 262 नए गाँव संज्ञान में आये है।वास्तव में ऐसे गाँवों का बसना और आबादी का इस कदर बढ़ना कही से भी स्वाभाविक नही है।ऐसे हर अनाधिकृत घुसपैठ के पीछे आतंकी समूह और मादक पदार्थ कारोबारी है।किन्तु इसका सबसे दुखद पहलू है की स्वजातीय ग्राम प्रधान और स्थानीय चर्च भी ऐसे कृत्यों का सदैव समर्थन सहयोग करते है।इस नाते बड़ी संख्या में आकर बस रहे लोग जहाँ राज्य व्यवस्था के एक चुनौती है।वही इनकी बढ़ती आबादी दूसरे जातिये समूहों के लिए भय का कारण भी है।जबकि इनका बढ़ता प्रभाव सामाजिक तनाव का एक मुद्दा है।
घुसपैठिये जनजातिये सुविधाओं का लाभ लेते हुए सरकारी सेवाओं में आये है।जनजातिये दर्जे की सुविधा और ड्रग्स के अकूत धन के नाते इनके द्वारा इंफाल घाटी में भी बड़े पैमाने पर जमीन खरीद हो रही है।वही इनके द्वारा यहाँ ढ़ेरों चर्च भी खोले जा रहे है।ये गिरजाघर आये दिन मैतेई आस्था पर चोट करते है।मैतेई पीढ़ियों से हिंदू वैष्णवता मे विश्वास करने वाला एक समुदाय है।जिसे आप भारत के सर्वाधिक सुसंस्कृत एवं थाती विरासतों से संपन्न समुदाय के रूप में जान सकते है।इसके उलट जंगलों में रहने वाले घुमंतू कूकी जनजाति के रहन सहन में तो बदलाव आया है।किंतु आक्रामकता बर्बरता अब भी बनी है।जिसका उपयोग चर्च अपने निहित स्वार्थों के लिए करता आया है।आज इन सब कारणों से मणिपुर के सबसे पुराने जातिये समूह मैतेई को अपने धरती पर ही अस्तित्व खो देने का भय है।इसके अपने कारण भी है।वे आबादी का 50 प्रतिशत होकर भी राज्य के केवल 10 प्रतिशत भूभाग पर बसने के अधिकारी है।
वही म्यांमार से आ रहे घुसपैठिया जनजातिये सुविधा का लाभ उठा कर पूरे राज्य में कही भी संपत्ति खरीद और बस सकता है।इन सब के लिये अतीत की गलतियों भी कम जिम्मेदार नही है।समुदायों के बीच कटुता,जनजातिये समुदायों का धर्मांतरण और उनके बीच राष्ट्रविरोध के बीजों का रोपण ब्रिटिश साम्राज्यवादी शासन की देन है।वही स्वतंत्रता उपरांत अंतराष्ट्रीय सीमाओं के निर्धारण में हुई चूक और शासकीय स्तर पर असमानता वाले कानून ये सब नेहरूवादी अपराध है।जिसकी परिणति समुदायों के बीच पनपा विषबेल है।वैसे इसमें खाद पानी देने का काम ईसाई मिशनरियाँ बखूबी करती आई है।इस हिंसा के भड़कने मे उनका भी हाथ है।जहाँ उन्हें कूकी ईसाई समुदाय मे शांति अपील करनी चाहिए थी। वहाँ वे विपक्षी कांग्रेस संग सरकार को कटघरे में खड़ा करने की कोशिशों में लगे  है।वास्तव में इस सुनियोजित हिंसा को उकसाने के लिए  चर्च द्वारा धार्मिक जातिये रंग देने का भी प्रयास हो रहा है।
मणिपुर के इस हालात को लेकर इनके द्वारा ईसाई समुदाय के घर संस्था और चर्चो को निशाना बनाये जाने के झूठे वक्तव्य जारी किये जा रहे है।जबकि सभी मृतक गैर ईसाई है।जिनके घर उजाड़े और बस्तियाँ जलाई गई वे सब मैतेई है।इस हिंसा मे अब तक ऐसे 35 हजार अधिक लोगों के विस्थापन और 65 करीब लोगों को मारे जाने की सूचना सरकार द्वारा जारी हुई है।यहाँ के वर्तमान हालात को देखते हुए ये लगता है ज्यों एक समुदाय विशेष का नरसंहार है।जबकि मणिपुर के काँडिनल से लेकर बैंगलोर अवस्थित रोमन कैथोलिक अभिलेखागार तक बयान जारी कर कुछेक चर्चो को तोड़े जाने को मुद्दा भी बना रहे है।जबकि ये चर्च सरकारी भवन परिसरों मे बनाकर संचालित किये जा रहे थे।राजधानी इम्फाल से लगते ऐसे तीन चर्चो को हाल ही में शासन द्वारा ध्वस्त किया गया।जिसके बाद चर्च समर्थकों द्वारा प्रदेश में कई सारे मंदिर तोड़ दिये गए। वही चर्चो के मुद्दे को चल रही हिंसा भड़काने मे भी उपयोग किया जा रहा है।
सरकार द्वारा मणिपुर में सैन्य बलों की तैनाती एक फौरी राहत हो सकती ये निदान नही है।ऐसे में यहाँ चर्चो की भूमिका को सीमित करने की जरूरत है।वही आवश्यकता हिंसा में लिप्त तत्त्वों पर कठोर कार्यवाही की भी है।म्यांमार से आये चीन कूकी घुसपैठियों को पहचान कर निकालना नितांत आवश्यक है।इस सब के बीच आतंकी संगठनों पर लगाम भी लगाना होगा।इसके साथ ही मणिपुर के लिए लाये इनर लाईन परमिट के प्रावधानों पर पुनर्विचार भी होना चाहिए।क्योंकि इस प्रावधान के उपरांत जहाँ शेष भारत के लोगों को प्रक्रिया पूरी कर मणिपुर यात्रा अनुमति मिलती है वही म्यानमार से आये घुसपैठिये ईसाई मुस्लिमो के लिए इसका कोई मतलब नहीं है।मैतेई समुदाय के जनजातिये दर्जे का विचार माननीय आधार  पर किया जाना चाहिए।आखिर जब उत्तर पूर्व के विशेष परिस्थिति का हवाला देकर त्रिपुरा के शासक समुदाय को यह दर्जा मिल सकता है तो पीड़ित प्रताड़ित मैतेई समुदाय को क्यों नही?
अगर केंद्र एवं राज्य सरकार ने इन मुद्दों का निराकरण समय रहते नही किया तो फिर तेज गति आधारभूत ढाँचा निर्माण और पर्यटकीय विकास प्रयास रुक जाएंगे।वही लुक ईस्ट से लेकर ऐक्ट ईस्ट तक के प्रयास असफल सिद्ध होंगे।
– अमिय भूषण

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