मानवीय सरोकार समर्पित सिख समाज

देश के अन्य राज्यों की भांति पंजाब की भी अपनी एक समृद्ध विरासत है, जिसे उन्होंने अभी तक संजो कर रखा है। उनकी वीरता, मनमौजी स्वभाव और सेवा प्रवृत्ति का सम्पूर्ण विश्व कायल है।

पंजाबियत प्राचीन समृद्ध संस्कृतियों में से एक है। पंजाबी अध्यात्मिकता शिक्षा, दर्शन परम्परा एवं विशिष्ट युद्धकला, वास्तुकला, सामाजिक सरोकार, परम्पराओं, मूल्यों और इतिहास में इसकी विविधता और विशिष्ठता अपने आप में अनूठी रही है। पंजाबियों की जीवन शैली में प्रदर्शित दया, करुणा, सहयोग, समर्थन व सहानुभूति के साथ उच्च ऊर्जा, उत्साह, उमंग एवं उल्लास को एक सीमित दायरे में बांधना न केवल मुश्किल है, बल्कि नामुमकिन भी कहा जा सकता है। आज भी पंजाबी सभ्यता से सम्पन्न पंजाब में अतिथि को ईश्वर का भेजा हुआ एक प्रतिनिधि या देवदूत मानकर अतिथ्य सत्कार के साथ-साथ उसके भली-भांति स्वागत एवं सुव्यवस्था की परम्परा अभी तक कायम है। यह समुदाय दिल खोलकर एक दृढ़ निश्चय के साथ अपनी प्राचीन संस्कृति एवं सभ्यताओं की रंग-बिरंगी विरासत को संजोये हुए है। परम्परा समाज की सामूहिक विरासत है, जो कि सामाजिक संगठन के सभी स्तरों पर व्याप्त है। वे सभी अभी भी खुले दिल से सबका स्वागत करते हैं।

पंजाब के खान-पान की बात निराली ही नहीं अपितु, अपनी एक विशेष पहचान रखती है। पंजाबी लोग आज भी दूध, दही, मलाई, मक्खन एवं लस्सी के साथ खाना पसंद करते हैं। पंजाब के खाने में सरसों का साग एवं मक्के की रोटी का प्रचलन बहुत प्रसिद्ध है। सुबह के समय के नाश्ते में आलू, गोभी व प्याज के पराठे के साथ रखा बिलोया हुआ सफेद मक्खन व लस्सी का बड़ा गिलास बहुत मशहूर है। इसके साथ खाने के शौकीन लोगों के लिए बटर चिकन और पनीर टिक्का बड़ा ही पापुलर खाना होता है। इसके अलावा छोले-भटूरे, पराठे, दाल मखनी, अमृतसरी नॉन, सतलुज व अमृतसरी मछली, मटन टिक्का, पंजाबी कढ़ी पकौड़ा, राजमा-चावल तथा छोले कुलचे आदि पंजाब के मुख्य खान-पान का एक हिस्सा है।

पंजाब राज्य अपने पंजाबी गीतों/गानों के लिए जग-जाहिर बन चुका है। आज के इस दौर में पंजाबी के अनेक गायक चर्चित हैं और अनेक गायक विदेशों तक विख्यात है। पंजाब की स्थानीय नृत्य शैली गिद्दा, महिलाओं की विनोदपूर्ण एवं जोशपूर्ण गीत नृत्य शैली है। पंजाबी समुदाय विशेष रूप से अपनी खुशी व्यक्त करने के लिए सगाई पर भंगड़ा, गिद्दा नाचकर तथा बोलियां गाकर अपना मनोरंजन करते हैं। पंजाबियत की पहचान के रूप में भंगड़ा सबसे आम प्रचलित नृत्य शैली है, जबकि सम्मी, लुद्धी और धमाल भी राज्य के कई क्षेत्रों में लोकप्रिय है।

पंजाब के लोग बड़े ही उत्साही, ऊर्जा, उमंग व उल्लास के साथ-साथ जज्बा, जोश व जुनून से भरे होेते हैं, क्योंकि यहां की मिट्टी में हरे-हरे खेतों की महक बसी होती है। पंजाबी समुदाय के अधिकांश लोग गांव में रहते हैं और पशुपालन करते हैं तथा आधुनिक तकनीकी से सम्पन्न मकान व कृषि कार्य को प्राथमिकता देते हैं। पंजाब कृषि प्रधान राज्य है, जिसमें अधिकांश जनसंख्या प्रत्यक्ष व परोक्ष रुप से कृषि कार्यों से जुड़ी हुई है। पंजाब के लोगों की बोली अतरंगी तथा पहनावा सतरंगी होता है। पंजाबी सूट, पटियाला सूट, पटियाला जूती के साथ ही पुरुष कमीजनुमा कुर्ता पजामा व लुंगी पहनते हैं।

पंजाबी साहित्य एवं दर्शन में अधिकांश सिख गुरुओं के लेखन और कविताएं शामिल हैं। गुरुनानक के लेखन को ‘जन्म साखी’ के नाम से जाना जाता है, जो सबसे पुरानी साहित्य की पुस्तकों में से एक है। आधुनिक पंजाबी लेखकों में भाई वीर सिंह, पूर्ण सिंह, अमृता प्रीतम, बाबा बलवंता, धनीराम यात्रिक, खुशवंत सिंह, मोहन सिंह तथा शिवकुमार बटालवी प्रमुख रूप से गिने जाते हैं। पंजाबी अधिकांशतः उच्च व उदार प्रवृत्ति के लोग होते हैं।

पंजाबित का आज दुनिया के अनेक देशों में बोलबाला है, विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका एवं कनाडा में। पंजाबी समुदाय के बारे में इतना कहना पर्याप्त होगा कि उनकी जमीन तो भले बदल गयी, किंतु अपनी संस्कृति को उन्होंने आज भी संजोकर रखा है। पंजाबी समुदाय संसार भर में जहां रहते हैं, अपने त्यौहार बड़ी धूम-धाम से मनाते हैं और अपनी संस्कृति को संजोये रखने के लिए दूसरों का स्वागत भी खुले दिल से करते हैं। विशेष रूप उल्लेखनीय है कि विश्व भर में पंजाबी समुदाय की लोकसंस्कृति और राष्ट्रीयता से सराबोर उनके उत्साह व उल्लास को पसंद किया जाता है। पंजाबी समुदाय प्रमुख रूप से जाटों और खत्रियों में विभाजित है जो अधिकांश किसान और उद्यमी हैं।

पंजाबी लोग अपनी वीरता, बहादुरी, त्याग, बलिदान, सहयोग-समर्पण, उच्च- उत्साह और दृढ़ निश्चय के लिए भी विशेष रूप से जाने जाते हैं। देश की एकता और अखंडता की रक्षा हेतु सर्वोच्च बलिदान देने वाले महान शहीदों, वीर स्वतंत्रता सेनानियों और बहादुर सैनिकों का सम्पूर्ण देश सदैव ही ऋणी रहेगा। भारत के अन्य राज्यों की तरह पंजाब में उपनिवेश विरोधी विरोध और आंदोलन भी ऐतिहासिक रहा। लाला हरदयलाल, बाबा सोहन सिंह भकना, भाई हरनाम सिंह टुंडीलत, बाबा ज्वाला सिंह, अकाली मोर्चा, बब्बर अकाली, भगत सिंह तथा सुभाषचंद बोस की भारतीय राष्ट्रीय सेना (आई.एन.ए.) का निर्माण कैप्टन मोहन सिंह के दिमाग की उपज थी। इसके साथ ही कर्नल गुरुबक्स सिंह ढिल्लो व मेजर प्रेम कुमार सहगल भी पंजाब से भारतीय राष्ट्रीय सेना का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। सेना के रैंक एवं प्रोफाइल में योगदान देने वाले सभी राज्यों में पंजाब देश में दूसरे स्थान पर है। सेना की जनशक्ति का 7.8 प्रतिशत भाग है, हालाकि राष्ट्रीय जनसंख्या में 2.3 प्रतिशत ही है। पैदल सेना में सेना का सबसे बड़ा घटक पंजाब रेजीमेंट, डोगरा रेजीमेंट, सिख रेजीमेेंट, सिख लाइट इफैंट्री तथा जम्मू व कश्मीर रेजीमेंट आदि का है। प्रथम विश्व युद्ध में सेवा करने वाले 3.2 लाख पंजाबी सैनिकों के रिकार्ड का उल्लेख है।

सिख सेना ने हमेशा भारत द्धारा लड़े गये सभी युद्धों के साथ-साथ इसका सैन्य अभियानों में न केवल सक्रिय सहयोग दिया है, बल्कि अग्रणीय भूमिका निभाई है। प्रथम विक्टोरिया क्रास विजेता कैप्टन ईश्वर सिंह, एयर चीफ मार्शल विरेंदर सिंह धनोआ, सूबेदार जोगेंदर सिंह (1962 युद्ध), मेजर जनरल राजेंदर सिंह सौरो (1948 कश्मीर अभियान), नायब सूबेदार नंद सिंह (1948 कश्मीर अभियान), प्रथम वायुसेना मार्शल अर्जन सिंह, द्वितीय सिख आर्मी प्रमुख जनरल विक्रम सिंह, प्रथम नौ सेना प्रमुख एडमिरल करमवीर सिंह निज्जर, लेफ्टी.-जनरल जगजीत सिंह अरोरा (1971 के युद्ध), परमवीर चक्र वितेजा आनरेरी कैप्टन करम सिंह (1948), एयर चीफ मार्शल दिलबाग सिंह, महावीर चक्र विजेता ब्रिगेडियर संत सिंह  (1971), प्रथम सिख सेना प्रमुख जनरल जोगिंदर जसवंत सिंह, परमवीर चक्र विजेता फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह सेखो, परम चक्र विजेता सूबेदार मेजर (ऑनरेरी कैप्टन) बाना सिंह (1987 सियाचिन), महावीर चक्र विजेता ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह (1971 लौंगेवाला), पद्म विभूषण लेफ्टी. जनरल हरबक्श सिंह, पदम भूषण, वीरचक्र, एयर कमोडोर मेहर सिंह आका, मेहर बाबा, महावीर चक्र, लेफ्टीनेण्ट जनरल विक्रम सिंह (1962)। इसके साथ ही आंग्ल-पंजाब युद्ध के साथ अनेक युद्धों में महत्वपूर्ण भूमिका पंजाबी लोगों द्वारा अद्भुत वीरता दिखायी गयी। इनके मार्शल चरित्र और अच्छी काया के साथ वीरता और वफादारी ने ब्रिटिश भारतीय सेना की भर्ती में नये रुझान दिखाये थे। सारागढ़ी का युद्ध विश्व सैन्य इतिहास में आज भी स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है।

भारत के राष्ट्र निर्माण में पंजाबी व विशेष रूप से सिखों के योगदान को कदापि भी भुलाया नहीं जा सकता है। उन्होंने इस देश के लिए क्या नहीं किया? हम उन्हें जो सम्मान देंगे तुलनात्मक रूप से वह बहुत कम होगा। उद्योगों के क्षेत्र में खाद्य प्रसंस्करण, ट्रैक्टर, आटो घटक, कपड़ा उत्पादन, साइकिल व मोटर साईकल के कल पुर्जे, खेल का सामान, परिवहन, हल्के इन्जीनियरिंग, धातु व मिश्र धातु एवं रसायन, सूचना व तकनीकी (आई. टी.) तथा फार्मास्यूटिकल्स आदि का उत्पादन पंजाबियों द्वारा किया जा रहा है। पंजाब की आबादी का लगभग दो-पांचवां हिस्सा कृषि क्षेत्र में लगा हुआ है। गेहूं व चावल के अलावा मक्का व बाजरा पंजाब के महत्वपूर्ण अनाज उत्पाद हैं। फलों के उत्पादन में भी व्यवसायिक वृद्धि हुई है। अन्य फसलों में कपास, गन्ना, तिलहन, व मूंगफली भी शामिल हैं।

सम्पूर्ण सिख परम्परा सभी धर्मों का आदर करती है और आचरण की शुद्धता पर बल देती है। गुरुवाणी में शासक, शासन तन्त्र, न्याय पद्धति, राजनीतिक भ्रष्टाचार, आर्थिक घोटालों जैसे समाजिक सरोकारों पर तीखी टिप्पणियां है और इनसे उबरने के लिए सूत्रों की गहरी चर्चा है, किंतु कहीं भी धर्म एवं राजनीति का घालमेल नहीं है। राजनीति से नैतिकता और आम जनता की सेवा के पक्ष पर बार-बार आग्रह किया गया है। पंजाबी समुदाय की सेवा भावना के फलस्वरूप लंगर में किसी भी दिशा से आने वाले किसी भी व्यक्ति का धर्म, जात-पात, नस्ल, कौम, रंग गरीबी अमीरी या उसकी सामाजिक हैसियत को नहीं देखा जाता और न ही पूछा जाता है। सभी को बेहद श्रद्धा से बिलकुल मुफ्त शुद्ध शाकाहारी भोजन परोसा जाता है। सभी लोग संगत व पंगत के सिद्धांत पर चलते हुए एक ही कतार में बैठकर बिना किसी ऊंच-नीच के भोजन कर सकते हैं। करोना काल में लोग जहां घरों में छिपे थे, वहां पंजाबी समुदाय के लोगों ने विशेष रूप से सिखों ने घर से बेफिक्र होकर भोजन बांटने का सराहनीय कार्य किया। आपदा और आपात स्थिति में लोगों को भोजन (लंगर) पहुंचाना अपना पुनीत दायित्व मानकर मानवता की सेवा देश व विदेश में सदैव करते रहे हैं। दिल्ली में बना एक विशालकाय फ्री डायलिसिस हॉस्पिटल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

निःसंदेह मानवीय मूल्यों की सुरक्षा, सहयोग, समर्पण, सहानुभूति, सतर्कता, सहभागिता, समर्थन एवं सक्रियता के साथ उत्तरदायित्व निभाने में सिख समुदाय का कोई सानी नहीं हो सकता। इस समुदाय ने अपने ही देश में ही नहीं अपितु विदेशों में भी सक्रिय भूमिका निभाते हुए पंजाब एवं पंजाबियत का ही नहीं बल्कि प्रत्येक भारतीय के लिए गर्व, गौरव एवं गरिमा का अनुभव कराया है। अपनी खाद्य संस्कृति से लेकर राष्ट्रीयता से सराबोर पंजाबी लोगों ने कृषि, उद्योग, रक्षा, सुरक्षा, साहित्य, अध्याय, महिला सशक्तीकरण, सहकार राजनीति व विदेश सहित अनेक क्षेत्रों में अपनी एक विशेष पहचान बनाई है।

                                                                                                                                                                                  डॉ. सुरेन्द्र कुमार मिश्र 

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