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***महेश अटाले***
तमसूर्य जगतकर्तारं महादेव: प्रदीपनम् ‘‘ हमारे प्राचीन ग्रथों में सूर्य का महत्व इस प्रकार कहा गया है। सूर्य देव ही विश्व का कर्ता है, सृष्टि के लिए ऊर्जा का मूल स्रोत भी यही है। सूर्य से ही पृथ्वी तथा अन्य ग्रह उत्पन्न हुए हैं। पृथ्वी पर चराचर को सूर्य से ही शक्ति प्राप्त होती है।
वनस्पति के द्वारा प्राप्त हमारा अनाज भी सूर्य ऊर्जा से ही निर्मित होता है। वनस्पति के हरित कण सूर्य की ऊर्जा का शोषण करते हैं, तथा इससे ही वनस्पति द्वारा शोषित पानी के अणुओं का विभाजन होता है, और अन्न तैयार होता है। इसी अन्न पर सम्पूर्ण जीव सिृष्ट का निर्वाह होता है।
अपने श्वास के लिए आवश्यक ऊर्जा भी सूर्य प्रकाश से ही प्राप्त होती है। सूर्य ही शक्ति का मूल स्रोत है तथा लाखों वर्षों से यह ऊर्जा का अनवरत प्रवाह बना हुआ है। १५ करोड़ किलोमीटर दूर स्थित सूर्य की ऊर्जा ही सृष्टि के निर्माण का कारण है तथा अब तक एक एक श्वास के लिए भी यही शक्ति जिम्मेदार है।
इस प्रकार निरंतरता के साथ उत्पन्न होने वाली यह ऊर्जा किस प्रकार बनती होगी? इस सवाल ने अनेक विशेषज्ञों को गहन विचार में डाल दिया था। आज भी इसका सटीक जवाब हमें नहीं मिल रहा है। फिर भी आज तक इस विषय में जो जानकारी प्राप्त हुई है इससे यह निश्चित है कि इस ऊर्जा का स्रोत आण्विक ऊर्जा ही है।
विशेषज्ञों के अनुसार सूर्य हीलियम तथा हायड्रोजन वायु से बना है। सूर्य पर हायड्रोजन कणों (अणु) का संयोजन होता रहता है, जिससे हीलियम वायु उत्पन्न होती है, इस रूपांतरण के कारण प्रचण्ड ऊर्जा बाहर निकलती है, यही सूर्य की ऊर्जा है।
इस प्रक्रिया को ठीक तरह से समझने के लिए संक्षेप में ‘अणु’ का अर्थ समझना पड़ेगा।
किसी भी मूल तत्व (बेसिक एलीमेंट) के सबसे छोटे कण को अणु कहा जाता है। इसकी खोज यद्यपि २०वें शतक में की गई, परंतु अणु (एटम) यह नाम २५०० वर्ष पूर्व ग्रीक देश की डेमो क्रीटस द्वारा दिया गया है, यह पाश्चात्य देशों की अवधारणा है। एटम का अर्थ आटोमास याने जिसे काटा न जा सके या विभाजित न किया जा सके।
इससे एक हजार वर्ष पूर्व भारतीय शास्त्रज्ञ महर्षि कणाद ने केवल अणु की अवधारणा ही सामने नहीं रखी; अपितु अणुओं के आपस के आकर्षण विकर्षण का सिद्धांत भी प्रस्तुत किया। (संदर्भ- प्रो.एन.जी डोंगरे लिखित ‘‘फिजिक्स इन एन्सीएंट इंडिया)
१९११ में प्रसिध्द अंग्रेज वैज्ञानिक अर्नेस्ट रदर फोर्ट ने पहली बार अणु की संरचना के विषय में विवरण प्रस्तुत किया। १९१३ में डच वैज्ञानिक नील्स बोर ने इसे संशोधित कर आज का मान्यता प्राप्त ‘एटॉमिक मॉडल’ प्रस्तुत किया। इसके अनुसार विश्व के प्रत्येक अणु के केंद्र में एक केंद्रक होता है, जिसमें धनात्मक प्रभाव वाले प्रोटान्स होते हैं, तथा इसके साथ भार रहित न्यूट्रान्स होते हैं। केंद्र के आसपास लगातार अपने कक्ष में भ्रमण करणे वाले ऋृणात्मक प्रभाव वाले इलेक्ट्रान्स होते हैं। विश्व में किसी भी अणु की संरचना इसी प्रकार की होती हैं। प्रोटान्स, न्यूट्रान्स तथा इलेक्ट्रान्स की संख्या के अनुसार वह पदार्थ परिवर्तित होता है। न्युुट्रान्स, प्रोटान्स तथा इलेक्ट्रान्स में प्रचण्ड ऊर्जा होने के कारण ही वे लगातार क्रियाशील रहते हैं।
हमने पहले ही देखा की सूर्य पर हायड्रोजन वायु लगातार हीलियम वायु में परिवर्तित होती रहती है, इस रूपांतरण की प्रक्रिया में यह ऊर्जा निकलती है। इसमें हायड्रोजन वायु के केन्द्र में १ प्रोटान, १ न्यूट्रान तथा परिधि में १ इलेक्ट्रान घूमता रहता है। इस प्रकार जब दो अणुओं का संयोजन होता है तो केन्द्र में २ प्रोटान्स, २ न्युट्रान्स तथा परिधि में घुमने वाले २ इलेक्ट्रान्स होने के कारण हीलियम के अणु का निर्माण होता है। यह केवल जोड़ मात्र नहीं होता। इस क्रिया में प्रचण्ड ऊर्जा निकलती है। हमने देखा कि लाखों किलोमीटर दूर होने वाली प्रक्रिया से उत्पन्न ऊर्जा से पृथ्वी पर जीव जगत का निर्माण हो सकता है।
इसका सरल अर्थ है कि इस अणु में बड़ी मात्रा में ऊर्जा होती है। इस ऊर्जा के स्रोत का उपयोग हम ऊर्जा की लगातार आवश्यकता को पूरा करने के लिए कर सकते हैं। हालांकि अणु ऊर्जा की मूल अवधारणा महान वैज्ञानिक रादर फोर्ड ने रखी, परंतु कालांतर में इस पर बहुत खोज हुई तथा अणु ऊर्जा निर्माण की शुरुआत हुई।
इस अणु से ऊर्जा निकालना तथा उसे उपयोग में लाने योग्य बनाना बहुत कठिन काम था। १९०० से १९४५ के बीच इंग्लैण्ड, रूस, अमेरिका, जर्मनी जैसे कुछ राष्ट्रों में अणुऊर्जा पर काम हो रहा था। कुछ पदार्थों के संयोजन से तो कुछ के विघटन से अलग-अलग प्रकार की ऊर्जा बाहर आती थी। बीटा गामा तथा ‘क्ष’ किरणों की खोज भी इसी प्रक्रिया में हुई। यूरेनियम की खोज भी इसी कालावधि में हुई। दुनिया को ज्ञात हुआ कि इलेक्ट्रान, न्युट्रान, प्रोटान की संख्या में परिवर्तन हुआ तो नया पदार्थ बन सकता है। यद्यपि इस नए पदार्थ के गुणधर्म बड़ी मात्रा में मूल पदार्थ से मिलते जुलते हैं, फिर भी प्रोटान्स, न्युट्रान, इलेक्ट्रान की संख्या परिवर्तन से बनने वाला पदार्थ नया होता है जिसे आयसोटॉप्स कहा जाता है। इसी काल में इस आयसोटॉप्स की उपयोगिता भी बढ़ी। अणु के विभाजन तथा उनके इलेक्ट्रान न्युट्रान प्रोटांस की संख्या बदलने की नई-नई तकनीक खोजी गई।
इसी कालावधि में दुनिया पहले महायुध्द से दूसरे महायुद्ध की ओर तेजी से आगे बढ़ रही थी। राष्ट्रों के बीच युध्द की आहट के कारण वैज्ञानिक आदान-प्रदान तेजी से बढ़ रहा था। इसी समय राष्ट्रों के शासकों का ध्यान इस नई ऊर्जा के जमा करने की ओर गया। इस ऊर्जा का शत्रु राष्ट्रों के विरुध्द शस्त्र के रूप में उपयोग किया जा सकता है, इसका ज्ञान होने के कारण अमेरिका ने इस ऊर्जा से १९४४ में बम बनाने की शुरुआत की। मेनहटेन प्रोजेक्ट के द्वारा अणुबम बनाने की शुरुआत हो गई तथा अमेरिका ने २६ जुलाई १९४५ को मेक्सिको के मरुस्थल में पहला अणुविस्फोट परीक्षण किया। इस समय परीक्षण के लिए परीक्षण स्थल से १० कि.मी. दूर रहकर विशेषज्ञ इस काम का निरीक्षण कर रहे थे। इस अणुविस्फोट के कारण उत्पन्न क्लाउड (धुंध) आकाश में चार किलोमीटर तक दिखाई दी। इस विस्फोट से १५ से २० हजार टन टी.ए.टी ऊर्जा उत्सर्जित हुई। इस परीक्षण स्थल से १० कि.मी दूर भवन के सुरक्षा गार्ड हवा में उड़ गए। विस्फोट से ३ कि.मी. दूर स्थित स्टील की रक्षा दीवार क्षण भर में भाप बन गई।

इस परीक्षण के केवल दस दिन के अंदर अमेरिका ने जपान के हिरोशिमा शहर पर ‘लिटिल बम’ नामक अणुबम फेंका। कुछ ही क्षणों में बम के एक किलोमीटर की परिधि की हर एक चीज जल कर नष्ट हो गई। ३.५ कि.मी परिधि में स्थित हर प्राणी बम की खतरनाक ऊर्जा से कुछ क्षण में ही जल गया। कुछ क्षणों में ही १.५ लाख लोगों के प्राण निकल गए। इससे उत्पन्न रेडियो एक्टिव तरंगों के कारण दशकों तक यह क्षेत्र वीरान रखा गया। अणु की शक्ति का पूरी दुनिया को अब अंदाजा हो चुका था और अब इस भीषण हत्याकांड को रोकने के लिए दुनिया को इस भीषण ऊर्जा का दूसरा पहलू दिखाने की शुरुआत हुई।
इसके पूर्व २ दिसम्बर १९४२ को अमेरिकी विशेषज्ञ ‘पुन्रीको फर्मी’ के नेतृत्व में शिकागो यूनिवसिटी में ‘‘शिकागो पाइल्स’’ नाम से बने पहले अणु ऊर्जा उत्पादन केन्द्र में ऊर्जा निर्माण का प्रयोग शुरू हुआ। प्रारम्भ में इस प्रयोग के द्वारा आधे वाट बिजली के निरंतर उत्पादन का काम हुआ। बाद में यह २०० वाट तक बढ़ गई।
रूस के आवनिस्क विद्युत उत्पादन केंद्र को दुनिया का पहला उत्पादन केन्द्र माना जाता है। १९५४ में निर्मित इस ए.पी.एस.-१ केन्द्र में ५ वर्ष तक लगातार ६ मेगावाट बिजली का उत्पादन होता रहा।
अमेरिका का शिपिंग पोर्ट अटामिड स्टेशन १९५६ में प्रारम्भ हुआ, जहां २५ वर्ष तक लगातार बिजली का निर्माण हुआ।
जिस जापान ने अणु ऊर्जा की त्रासदी का गहरा अनुभव किया, उसी जापान के वाकी तथा कोरिवां गांवों को मिलाकर दुनिया का सबसे बड़ा अणु ऊर्जा उत्पादन केन्द्र बनाया गया। लगभग ४.५ वर्ग कि.मी. क्षेत्रफल में स्थित इस केन्द्र में ६ उत्पादन यूनिट हैं। जहां ६ हजार मेगावाट क्षमता की बिजली २०१० तक कार्यरत थी। आज भारत में सात अणु ऊर्जा केन्द्र की २१ इकाइयों से ५७८७ मेगावाट बिजली बनती है, पर यह भारत की आवश्यकता का केवल २% ही है। आज भी भारत में पारम्परिक प्रकार के कोयले से ही अधिकतम बिजली उत्पादन होता है, जो पूरी उत्पादन क्षमता का ६०% है।
१२ दिसम्बर २०१५ को पेरिस में सम्पन्न राष्ट्रसंघ विश्व पर्यावरण परिषद के कार्बन उत्सर्जन पर नियंत्रन रखने के प्रस्ताव पर १९६ देशों ने हस्ताक्षर किए। अब इन सब देशों को अपने कार्बन उत्सर्जन को कम करना जरूरी है। कोयले से बिजली बनाने की प्रक्रिया में कार्बन का बहुत उत्सर्जन होता है। अणु ऊर्जा के उत्पादन की प्रक्रिया में यह उत्सर्जन १०० गुना कम होता है। इसलिए विकासशील देशों के पास अणु ऊर्जा का कोई विकल्प नहीं है।
परंतु क्या अणुऊर्जा सम्पूर्ण सुरक्षित है? यह बड़ा सवाल है। दुनिया में अणु भट्टियों की ३३ दुर्घटनाएं हो चुकी हैं। अधिकतर दुर्घनाओं का कारण भूकम्प था। परंतु कुछ दुर्घटनाएं परिचालन की गलतियों के कारण भी हुई हैं। इसके बावजूद अणु ऊर्जा अक्षय ऊर्जा होने के कारण, आधुनिक से सुरक्षित होने के कारण तथा कार्बन डायऑक्साइड का उत्सर्जन रोकने में सक्षम होने के कारण भारत जैसे विकासशील देश के लिए और कोई विकल्प नहीं है। पानी की पनडुब्बियां हों, चाहे युद्ध नौका हो या अंतरिक्ष यान हो सबको मूल रूप से अणु ऊर्जा की आवश्यकता होती है, इसीलिए अणु ऊर्जा आधुनिक काल की आवश्यकता है।

मो. ः ९८६७९०००५५

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