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***त्रिलोक कुमार जैन***
ऊर्जा ही किसी भी देश के विकास का आधार है। उद्योग, कृषि और अन्य सेवाएं ऊर्जा पर ही निर्भर है। जो देश ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हैं वे तरक्की कर रहे हैं और जो ऊर्जा के क्षेत्र में पिछड़े हैं वे हर क्षेत्र में पिछड़ रहे हैं। ऊर्जा के परम्परागत संसाधन सीमित हैं और सबको पता है कि अगर हमें विकास करना है तो गैर-परम्परागत संसाधन विकसित करने ही पड़ेंगे। ऊर्जा की चुनौतियों से निपटने के लिए दो जरूरतें हैं- १. वैकल्पिक ऊर्जा का विकास और २. ऊर्जा संरक्षण।

वैकल्पिक ऊर्जा का विकास
सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा आदि नए ऊर्जा विकल्प उभर कर आ रहे हैं। अभी इन सभी नए क्षेत्रों में लागत बहुत अधिक होती है लेकिन उम्मीद है कि आने वाले समय में लागत कम हो जाएगी। बड़े पैमाने पर उत्पादन होने से लागत कम हो जाएगी और इससे हमें इस क्षेत्र में मदद मिलेगी। इन सभी क्षेत्रों में शोध, उत्पादन, और नवाचार की अपूर्व संभावनाएं हैं।

ऊर्जा संरक्षण
ऊर्जा संरक्षण आज पूरे देश की जरूरत है। आज भी अनेक ऐसे गांव हैं जहां पर बिजली नहीं है। आज भी ऐसे कारखाने हैं जहां पर बिजली बंद रहने के कारण कर्मचारियों को काम नहीं मिलता और मालिकों को मुनाफा नहीं मिलता। आज भी अनेक ऐसे अस्पताल हैं जहां पर बिजली की कटौती की कारण मरीजों का इलाज नहीं हो पाता है। हम एक ऊर्जा संकट का सामना कर रहे हैं और इसके जिम्मेदार हम स्वयं हैं।
गहराता ऊर्जा संकट
ऊर्जा के क्षेत्र में मांग और आपूर्ति में बड़ा फर्क है। मांग ज्यादा है और आपूर्ति कम है। इस कारण बिजली की कटौती रहती है। इसी कारण से हमारे देश में उद्योग, कृषि और अन्य सेवाओं में यथोचित विकास नहीं हो पाता है। आने वाले समय में ऊर्जा के क्षेत्र में संकट की स्थिति हो जाएगी – अगर हम नहीं चेतते हैं तो। परम्परागत ऊर्जा के साधन सीमित हैं और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर हम यथोचित ध्यान नहीं दे रहे हैं। नतीजा बड़ा भयानक हो सकता है।

ऊर्जा संकट से बेखौफ क्यों हैं?
शायद हमें लगता है कि भविष्य ऐसे ही चलता रहेगा। यह हमारी गलतफहमी है। अब जल्द ही एक दिन आएगा जब न पेट्रोल बचेगा, न कोयला बचेगा और न अन्य परम्परागत ऊर्जा स्रोत बचेंगे। आज और अभी से प्रयास शुरू करने पड़ेंगे। आज जरूरत है हम सब ऊर्जा संरक्षण को एक राष्ट्रीय धर्म के रूप में स्वीकार कर लें और हर गांव-शहर, हर संस्था और हर मोहल्ले में इस हेतु प्रयास शुरू हो। सरकार को भी पेट्रोल, डीजल और अन्य परम्परागत ऊर्जा साधनों पर टैक्स बढ़ा देना चाहिए (सरकार ने ऐसा किया भी है); उससे जो आय हो उससे वैकल्पिक ऊर्जा साधनों को सस्ता करना चाहिए। ऐसे उपकरणों को बढ़ावा देना चाहिए जो या तो ऊर्जा पर आधारित न हो या वैकल्पिक ऊर्जा पर आधारित हो। ऐसे वैज्ञानिकों को प्रोत्साहन देना चाहिए जो हमें इस दिशा में ले जा सकें। जैसे आदिलाबाद के विक्रम राठोड (जो ज्यादा पढ़े लिखे नहीं हैं लेकिन मैं उनको एक वैज्ञानिक मानता हूँ) ने एक ऐसा पम्प बनाया है जो बिना बिजली के चलता है और इस पम्प के साथ एक सायकिल आती है जिस पर बैठ कर चलते ही पानी आ जाता है। ऐसे आविष्कारकों को प्रोत्साहन देना चाहिए।

क्या कारण है ऊर्जा संकट का?
हम ने हर जगह पर ऊर्जा के संरक्षण की जगह पर उसकी बर्बादी की है। जहां पर सिर्फ पंखे से काम चल सकता है वहां पर हमने एयर कंडीशनर लगा दिए हैं, जहां पर सिर्फ दुपहिया गाडी से काम चल सकता है वहां हमने बड़ी चौपहिया गाड़ियों की लाइन लगा दी। हमने हर जगह मानव श्रम की जगह बिजली से चलने वाली मशीनें लगा दीं। बिजली की बचत करने वाले उपकरण लगाने में हम कोई फुर्ती नहीं दिखाते लेकिन शान का दिखावा करने के लिए बड़े से बड़े मशीन, उपकरण, वाहन और सिस्टम लगाते जा रहे हैं।

कमजोर सरकारी पहल
हर साल सरकार ऊर्जा संरक्षण के लक्ष्य रखती है और भूल जाती है। २ दशक पहले गिने-चुने सरकारी दफ्तरों में एयरकंडीशनर होता था, आज हर दफ्तर में होता है। २ दशक पहले गिने-चुने सरकारी अधिकारी हवाई जहाज या विदेशी कार में घुमा करते थे- आज हर कोई घुमा करता है। २ दशक पहले हमने ऊर्जा संरक्षण के जो लक्ष्य रखे थे- उसका उल्टा करते रहे हैं। आज वक्त आ गया है कि हम निम्न लक्ष्य प्राप्त करने के लिए एक समय सीमा तय कर लें:-
१. हर गांव में बिजली पहुंचाने का लक्ष्य
२. हर गांव हर शहर और हर उद्योग को २४ घंटे बिजली (बिना बढ़ा के) पहुंचाने का लक्ष्य।
३.हर शहर में वैकल्पिक ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए प्रयास और अगले २ दशकों में कम से कम ५०% तक वैकल्पिक ऊर्जा का उपयोग शुरू करने का (अभी यह अधिकतम ५ से ७ प्रतिशत है)
४. हर व्यक्ति और हर संस्था को ऊर्जा संरक्षण हेतु प्रयास करने के लिए प्रेरित करने की जरुरत है। जब हर व्यक्ति अपने घर में ऊर्जा संरक्षण हेतु समर्पित होगा तभी शुरुआत होगी। जब हर संस्था एयर-कंडीशनर की जगह ग्रीन बिल्डिंग के लिए निवेश करेगी तभी शुरुआत हो पाएगी।
५. हर सरकारी विभाग बिजली का उपभोग कम करने और अपने भवनों को ग्रीन बिल्डिंग बनाने के लिए एक समयबद्ध कार्यक्रम तय करें। नए सिरे से कोई भी एयरकंडीशनर की खरीद न हो जब तक इसका कोई विकल्प ही न हो (अस्पताल, रिसर्च सेंटर और ऐसे अन्य जरुरी विभागों को छोड़ कर)।

जरुरत है- कार रेस नहीं ऊर्जा संरक्षण में रेस
आज भारत में विदेशी देखादेखी होड़ मची है कि हम भी बड़ी से बड़ी कार खरीदें, एयर कंडीशनर लगाएं, फार्मूला-वन कार रेस प्रतियोगिता करें आदि आदि। ये सभी हमें विकास की जगह पर विनाश की तरफ ले जाने के साधन हैं। आज जरुरत है कि हम अगर विदेशों से रेस या प्रतियोगिता ही करनी चाहते हैं तो सिएटल (अमेरिका का एक शहर) से ऊर्जा संरक्षण में प्रतियोगिता करें, रेकजाविक (आइसलैंड का एक शहर) से प्रतियोगिता करें हाइड्रोजन एनर्जी को इस्तेमाल करने में, लॉस एंजेल्स (अमेरिका का एक शहर) व बार्सेलोना (स्पेन का एक शहर) से प्रतियोगिता करें सोलर एनर्जी पैनल स्थापित करने में। आज हर शहर कि महापालिका को वेंकूवर (कनाडा का एक शहर) से प्रेरणा लेनी चाहिए जिसने हर बिल्डिंग को ग्रीन बिल्डिंग बनाने का संकल्प ले रखा है और वहां पर कोई भी व्यावसायिक इमारत तभी बनायीं जा सकती है जब वह ऊर्जा संरक्षण के मानकों पर खरी उतरे।

सस्ती करें सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, और अन्य वैकल्पिक ऊर्जा
जनरल मोटर्स ने सौर ऊर्जा की कार शुरू की तब उसको काफी घाटा लगा। टेस्ला नामक कम्पनी ने सोलर कारें बनायीं लेकिन वे इतनी महंगी हैं कि लोकप्रिय नहीं हो पा रही हैं। भारत में प्रमोद चौरसिया जैसे अनेक वैज्ञानिक हैं जिन्होंने सोलर कार बनाई है लेकिन इस हेतु शुरू में सरकारी सहयोग की जरुरत है। जब तक सरकार इस प्रकार के प्रयासों को खुल कर मदद नहीं करेगी, ये प्रयास सफल नहीं हो पाएंगे। इस हेतु सरकार को परम्परागत तकनीक की कारों पर टैक्स लगाना पड़ेगा और सौर ऊर्जा पर आधारित करों को सब्सिडी देना शुरू करना पड़ेगा ताकि ये कारें भी लोकप्रिय को सकें।
लिविंग ग्रीन जैसे अनोखे प्रयास
श्री प्रतीक तिवारी, श्री नरेन बक्शी आदि ने मिल कर जयपुर में लिविंग ग्रीन नामक कम्पनी बनाई है जो हर छत पर सब्जियों की बग़िया लगा सकती है, वे हर दीवार को ग्रीन दीवार में बदलते हैं। इस प्रकार के प्रयास से जहां भवन का तापमान ५-७ डिग्री कम हो जाता है वहीं रोजमर्रा की जरूरत की सब्जियां (वे भी शुद्ध ऑर्गेनिक खेती द्वारा तैयार) भी मिलती रहती हैं। आज जरूरत है कि एयरकंडीशनर आदि ऊर्जा पर आधारित उपकरणों को रोक कर लिविंग ग्रीन के प्रयासों को सहायता और प्रोत्साहन दिया जाय। पहल तो सरकार और बड़े उद्योगों को करनी चाहिए। सरकार को इस प्रकार की तकनीक पर सब्सिडी शुरू करनी चाहिए, साथ ही हर सरकारी उपक्रम को ग्रीन बिल्डिंग बनाने की लिए शुरुआत करनी चाहिए।

मो ९४१४४३०७६३

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