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उदारवादी आर्थिक नीतियों ने स्वावलंबन, स्वदेशी और रोजगार सृजन के संगठित क्षेत्र में नए अवसरों पर विराम लगा दिया। समय के साथ स्वावलंबन और बेरोजगारी के संकट भी विस्तृत होते गए। इससे पार होने की मोदी सरकार कोशिश कर रही है।

15 अगस्त 1947 की आधी रात को खंडित स्वतंत्रता स्वीकारने के बाद बड़ा सवाल आर्थिक विकास और स्वाबलंबन का था। स्वावलंबन ही वह आधार है, जो नागरिक और उसके पारिवारिक सदस्यों की आजीविका और रोजगार के संसाधनों को उपलब्ध कराने का काम आसान करता है। यह इसलिए जरूरी था, क्योंकि ब्रिटिश हुक्मरानों ने देशी सामंतों की मदद से न केवल देश की स्वतंत्रता हथियाई, बल्कि जो भारतीय समाज स्वावलंबी रहते हुए खेती और कुटीर उद्योग से अपना और अपने परिवार के साथ देश का भरण-पोषण सम्मानजनक ढंग से कर रहा था, उस पर आघात किए और देश में यांत्रिकीकरण की बुनियाद रखी। इसका परिणाम यह निकला कि जिस देश को 1823 तक एक गज भी सूत विदेश से मंगाने की जरूरत नहीं पड़ती थी, उसे 1828 में करीब 80 लाख रुपय के कपड़े के अलावा 35,22,640 रुपए का सूत भी ब्रिटेन से आयात करना पड़ा।

इसके बाद भारतीय वस्त्र उद्योग को चौपट करने के नजरिए से फिरंगियों की क्रूरता हदें पार करती चली गईं। उन्होंने मलमल बुनने वाले करीब दो लाख जुलाहों के दाहिने हाथ के अंगूठे काट दिए, जिससे वे हथ-करघे नहीं चला सकें। ब्रिटेन के औद्योगिक विकास की बुनियाद भारत में किए कपड़े के व्यापार और सामंतों से लूटे धन पर ही रखी गई। आजादी के बाद देश स्वावलंबन की ओर  बढ़ रहा था, लेकिन 1991 में भूमंडलीय पैरोकारों के दबाव में आर्थिक उदारवाद के लिए सरंचनात्मक समायोजन के बहाने जिस ‘बेल आउट डील’ पर हस्ताक्षर किए, उससे देश को एक बार फिर आर्थिक गुलामी भेागने के लिए विवश कर दिया। नतीजतन देश फिर औपनिवेशिक ताकतों के शिकंजे में उलझकर पराबलंबन की ओर बढ़ रहा है।

हालांकि 70 साल की आजादी के इस सफर में हम बहुत आगे बढ़े हैं, विकसित भी हुए हैं। बावजूद जहां पहुंचे हैं, वहां अनुभव कर रहे हैं कि हमारी मुट्ठियां खाली नहीं हैं, किंतु एक मुट्ठी में बहुत अधिक धन है, जबकि दूसरी में रोज के गुजारे लायक भी पैसा नहीं है। गैर-बराबरी की यह चिंताजनक तस्वीर अंतरराष्ट्रीय संगठन ऑक्सफेम ने साल 2017 में पूंजीपतियों को हुई कमाई के आंकड़ों के आधार पर प्रस्तुत की है। इस सर्वे से जाहिर हुआ है कि 2017 में होने वाली आमदनी का 73 प्रतिशत धन देश के महज एक प्रतिशत ऐसे लोगों की तिजोरियों में केंद्रित होता चला गया है, जो पहले से ही पूंजीपति हैं। इस साल अमीरों की आय में बढ़ोत्तरी 20.9 लाख करोड़ रुपए दर्ज की गई, जो देश के वार्षिक बजट के लगभग बराबर है। इस असमानता के चलते 2016 में देश के अरबपतियों की संख्या 84 से बढ़कर 101 हो गई। इस असमानता से बड़ी संख्या में लोगों के लघु व मझोले उद्योग-धंधे चौपट हुए हैं। यदि हमारे वस्त्र उद्योग में कार्यरत एक ग्रामीण मजदूर को इसी उद्योग के शीर्ष अधिकारी के बराबर वेतन पाने का उद्यम करना है तो उसे 941 साल लगेंगे। इसीलिए ‘रिवार्ड वर्क नॉट वेल्थ‘ शीर्षक की इस रिपोर्ट में सुझाया गया है कि भारत के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों के वेतन में यदि 60 फीसदी की कमी लाई जाए तो यह खाई कुछ कम हो सकती है। लेकिन देश में जिस तरह से जन-प्रतिनिधियों, सरकारी अधिकारियों और न्यायाधीशों के वेतन बढ़ाए गए हैं, उससे नहीं लगता कि सरकार वेतन घटाने की पहल करेगी।

भारत का विकास सिंधु घाटी की सभ्यता से माना जाता है। हड़प्पा और मोहन-जोदड़ों में जिस तरह के विकसित नगरों की श्रृंखला देखने में आई है वह आश्चर्यचकित करती है। वहां सिले वस्त्रों में लगाए जाने वाले बटनों से लेकर वर्तमान किस्म के शौचालय भी हैं। ऐसा तभी संभव था, जब भारत आधुनिक सोच वाला बड़ी अर्थव्यवस्था का देश रहा हो। प्राचीन काल से 17हवीं सदी तक भारत वास्तव में बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश रहा है। इस कारण प्रचुर मात्रा में रोजगार उपलब्ध थे। कृषि, वस्त्र, आभूषण, धातु, मिट्टी के बर्तन, चीनी, तेल और इत्र जैसे उद्योगों में उत्पादन चरम पर था। ढाका की मलमल और बनारस, चंदेरी तथा महेश्वर की सिल्क तो पूरी दुनिया में मशहूर थीं। लोहा, जहाजरानी और कागज के निर्माण व उत्पादन में करोड़ों लोग लगे थे। नतीजतन 18हवीं शताब्दी तक भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था में अव्वल बना रहा। इस समय तक वैश्विक अर्थव्यवस्था में हमारी 25 फीसदी तक भागीदारी रही।

इसी दौरान फिरंगियों ने भारत में पैर जमाने तक लघु और कुटीर उद्योगों में आबादी के बड़े हिस्से को रोजगार मिला हुआ था। अंग्रेजों ने भेदभावपूर्ण नीति अपनाकर जब भारतीय उद्योग-धंधों को चौपट कर दिया तो बड़ी संख्या में लोग रोजगारविहीन हो गए। फलस्वरूप भारत औद्योगिक राष्ट्र से गरीब राष्ट्र बन गया और बेरोजगारी व परावलंबन बड़ी समस्या बन गए।

आजादी के बाद हम तेजी से स्वावलंबन की दिशा में बढ़ रहे थे। 1990 तक जो जहां था, लगभग संतुष्ट था। लघु व कुटीर उद्योग उत्पादन की प्रक्रिया से जुड़े रहकर अनेक जरूरतों की पूर्ति अपने स्थानीय संसाधनों से कर रहे थे। सरकारी अमले के वेतन भी एक मध्यवर्गीय किसान और व्यापारी की मासिक आय के समतुल्य थे। लेकिन वैश्विक ताकतों को यह स्थिति रास नहीं आ रही थी, लिहाजा उन्होंने विश्व-बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और संयुक्त राष्ट्र संघ के माध्यम से भारत पर दबाव डालना शुरू कर दिया। नतीजतन भारत संकटों से घिरने लगा। यही वह समय था, जब खाड़ी युद्ध के चलते भारत के पास विदेशी मुद्रा का संकट गहरा गया। इस कारण एक ओर तो पेट्रोल की कीमतों में उछाल आया, वहीं दूसरी तरफ खाड़ी में फंसे भारतीयों को निकालने में बहुत धन खर्च हुआ। भारत के पास कर्जों के भुगतान के लिए भी धन की कमी आ गई। इस समय दुर्योग से 40 सांसदों के बूते चंद्रशेखर प्रधानमंत्री थे। उन्होंने जैसे-तैसे सोना गिरवी रखके अपना कार्यकाल तो निपटा लिया, लेकिन पी वी नरसिंहाराव की नई सरकार के लिए भारी वित्तीय संकट खड़ा कर दिया। इसी सरकार में बेहद चौंकाने वाले ढंग से भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर मनमोहन सिंह को वित्तमंत्री के पद पर तैनात कर दिया गया।

मनमोहन सिंह के बैठते ही आर्थिक नीतियों में बदलाव की आंधी चल पड़ी। विश्व बैंक खुली अर्थनीति और खुले बाजार का पैरोकार रहा है, सो मनमोहन ने इन्हीं नीतियों की साधना के लिए मंत्र फूंक दिया। चूंकि सिंह विश्व-बैंक के दबाव के चलते वित्तमंत्री बने थे, इसलिए उनकी निष्ठाएं भारतीय गरीब से कहीं ज्यादा विश्व बैंक के प्रति थीं। नरसिंह राव की सरकार बनते ही 24 जुलाई 1991 को आर्थिक उदारवादी नीतियों के अनुबंध पर हस्ताक्षर कर दिए गए। यह एक तरह से देश को बेच देने का सौदा था। नई गुलामी का समझौता था।

इस समझौते ने स्वावलंबन, स्वदेशी और रोजगार सृजन के संगठित क्षेत्र में नए अवसरों पर विराम लगा दिया। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के नए खतरे को भांपते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी विरोध के स्वर मुखर करने पड़े। इस नई आर्थिक गुलामी से निजात के लिए संघ को नए आनुषंगिक संगठन स्वदेशी जगरण मंच की भी स्थापना करनी पड़ी। वहीं दूसरी तरफ पूंजी के एकाधिकार के परंपरागत विरोधी रहे समाजवादी और गांधीवादी भी ‘आजादी बचाओ अंदोलन‘ के मार्फत इस आंदोलन के हिस्सा बने। लेकिन यह समझौता अंगद का ऐसा पांव साबित हुआ, जिसे अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी की सरकारें भी नहीं डिगा पाईं। गोया स्वावलंबन और बेरोजगार के संकट भी विस्तृत होते गए।

इन समस्याओं से छुटकारे के लिए नरेंद्र मोदी ने इन्हीं उदारवादी नीतियों के परिप्रेक्ष्य में ही डिजिटल माध्यमों से रोजगार के उपाय खोजे। स्टार्टअप और स्टेंडअप जैसी डिजिटल योजनाएं जमीन पर उतारीं। जिससे युवा उद्यमिता प्रोत्साहित हो और कुछ नवोन्मेष भी दिखे। इन्हें शुरू करते हुए यह अपेक्षा की गई थी कि युवा रोजगार पाने की बजाय रोजगार देने की मानसिकता विकसित करेंगे। इन योजनाओं के चलते यदि महज एक फीसदी आबादी को ही सक्षम उद्यमी बना दिया जाता तो देश की समूची अर्थव्यवस्था के कायापलट हो जाने की उम्मीद थी, लेकिन इनके कारगर परिणाम सामने नहीं आए। इसके उलट इंडिया एक्सक्लूजन-2017 की जो रिपोर्ट आई, उसमें पहली मर्तबा ऐसे लोगों का जिक्र किया गया, जो डिजिटल माध्यम से दी जा रही सुविधाओं के कारण वंचित होते चले गए। जबकि मोदी सरकार ने इस माध्यम को इसलिए अपनाया था, जिससे सभी नागरिकों तक सुविधाएं बिना किसी भेदभाव के पहुंचाई जा सकें। लेकिन इन्हें लागू करने की कमियों ने देश में डिजिटल विषमता का भी इतिहास रच दिया। इस ऑनलाइन विषमता का दंश करोड़ों दिहाड़ी मजदूर, दलित, आदिवासी महिलाएं वरिष्ठ नागरिक अल्पसंख्यक और उन किन्नरों को भुगतना पड़ रहा है, जो कंप्यूटर, इंटरनेट और एनरॉइड मोबाइल खरीदने और उन्हें चलाने से अनभिज्ञ हैं।

फिर भी देश ने इन 70 सालों में बहुत प्रगति की है। धरती से लेकर अंतरिक्ष तक भारत की छाप बनी है। संरचनात्मक विकास का जाल फैला है। इसके वृहदाकार प्रमाण धरती पर खड़े हुए हैं। बीते चार सालों में मिसाइलों के परीक्षण में हमने सात हजार किमी तक की मारक क्षमता हासिल कर ली है। एक साथ 104 उपग्रह अंतरिक्ष में स्थापित करके वैश्विक धाक जमाई है। नतीजतन इसरो अब विदेशी मुद्रा कमाने का भी जारिया बन गया है। अगले कुछ समय में हम मंगल पर मानव उतारने की तैयारी में हैं। अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में ये ऐसी उपलब्धियां हैं, जो हमें अमेरिका, रूस और चीन के समतुल्य खड़ा करती हैं। इन उपलब्धियों की पृष्ठभूमि में खास बात यह भी रही है कि ये सभी उपलब्धियां हमने स्वदेशी तकनीक से प्राप्त की हैं। फिर भी आबादी का एक बड़ा हिस्सा अभी तक समृद्धि से अछूता है।

 

 

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