महाराष्ट्र की महानगरपालिकाओं के चुनाव परिणाम सबके सामने हैं। गठबंधन ने 29 में से 25 महानगरपालिकाओं में सत्ता प्राप्त की है। इस जीत का श्रेय सभी ने महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री देवेंद्र फडणवीस को दिया है। सभी उन्हें सम्मान से ‘देवाभाऊ’ कहकर संबोधित करते हैं।
चुनाव घोषित होने के बाद देवेंद्र फडणवीस ने चुनाव परिणामों को लेकर जो-जो अनुमान लगाए थे, वे बिल्कुल सही सिद्ध हुए। उन्होंने कहा था कि 25 जगहों पर हमारी सत्ता आएगी। ठाकरे बंधुओं के एक साथ आने से मुंबई में बहुत अधिक फर्क नहीं पड़ेगा, यह भी उन्होंने कहा था और लगभग सभी स्थानों पर वैसा ही हुआ है।
राजनीतिक दलों के संदर्भ में देखें तो यह जीत भारतीय जनता पार्टी और शिंदे शिवसेना के गठबंधन की जीत है और राजनीतिक दलों के संदर्भ में उद्धव ठाकरे की शिवसेना, राज ठाकरे की मनसे और शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पराजित हुई है। चुनावों में राजनीतिक दलों की जीत-हार स्वाभाविक होती है। कोई एक दल जीतता है, दूसरे दल को अपेक्षित सफलता नहीं मिलती। चुनावी राजनीति का यह एक सरल और सामान्य विषय है।
लेकिन यह चुनाव केवल राजनीतिक दलों के बीच आपसी प्रतिस्पर्धा की लड़ाई नहीं थी। महानगरपालिकाओं के चुनाव भले ही बिजली, पानी, सड़कें, स्कूल और अन्य नागरिक सुविधाओं जैसे मुद्दों पर लड़े जाते हों, लेकिन इस बार इस लड़ाई का एक वैचारिक पक्ष भी था। यह वैचारिक पक्ष हिंदुत्व का था।
हिंदुत्व बनाम जातिवाद, भाषावाद, अल्पसंख्यक तुष्टीकरणवाद और भ्रष्टाचार— ऐसी यह लड़ाई थी और इस लड़ाई में हिंदुत्व विजयी हुआ है। इस हिंदुत्व की जीत का श्रेय बालासाहेब ठाकरे को दिया जाना चाहिए। इसलिए इस चुनाव में कहा जाना चाहिए कि ठाकरे जीते और ठाकरे हारे।
जो मतदाता हाल ही में मतदाता बने हैं, उन्हें कदाचित यह पता न हो कि महाराष्ट्र की राजनीति में ‘हिंदुत्व’ विषय को सबसे पहले बालासाहेब ठाकरे ने लाया। रमेश प्रभु का मामला 1995 में खड़ा हुआ और वह बहुत चर्चित हुआ। हिंदुत्व का प्रचार करने के कारण उनका चुनाव रद्द कर दिया गया। मामला सुप्रीम कोर्ट गया और सुप्रीम कोर्ट ने भारत की राजनीति पर दूरगामी प्रभाव डालने वाला निर्णय दिया। वह संक्षेप में यह था कि हिंदुत्व केवल धार्मिक विचार नहीं है, बल्कि यह एक जीवन पद्धति है। इसमें अनेक उपासनाओं का समावेश है। हिंदुत्व का प्रचार धार्मिक प्रचार नहीं माना जाएगा।
उस समय तक भारत में कोई भी राजनीतिक दल चुनावी सभाओं में हिंदुत्व शब्द का उच्चारण करने का साहस नहीं करता था। स्व. बालासाहेब ठाकरे ने वह रास्ता खोल दिया। लेकिन वही रास्ता उनके पुत्र और भतीजे— दोनों ने बंद कर दिया और वे धर्मनिरपेक्षतावादी बन गए।
भारतीय जनता पार्टी ने उस रास्ते को महामार्ग बना दिया और वह कश्मीर से कन्याकुमारी तक दिन-ब-दिन और अधिक प्रशस्त होता जा रहा है।
राजनीति में हिंदुत्व का अर्थ क्या है? राजनीति में हिंदुत्व का अर्थ है— विकास। राजनीति में उपासना पंथ का कोई स्थान नहीं है, यानी मुसलमानों को गालियाँ देना हिंदुत्व नहीं है।
राजनीति में हिंदुत्व का अर्थ है विकास। राजनीति में उपासना पंथ का कोई काम नहीं। हिंदुत्व के आधार पर विकास का अर्थ है— आर्थिक विषमता को दूर करना, विकास में सभी को सहभागी बनाना, भ्रष्टाचारमुक्त विकास योजनाएँ लागू करना और सभी को विकास का समान लाभ उपलब्ध कराना। यह कार्य केंद्र में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने करके दिखाया है और महाराष्ट्र में देवाभाऊ ने करके दिखाया है। यही राजनीति में हिंदुत्व है।
महानगरपालिकाओं में भाजपा और शिवसेना (शिंदे) के महागठबंधन की जीत हिंदू जनता की जीत है। हिंदू जनता को नींद से जगाना अत्यंत कठिन कार्य है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 100 वर्षों से इस दिशा में प्रयास कर रहा है। “जाग जाग बांधवा, प्राण संकटे तरी” जैसे गीत गाकर कार्यकर्ताओं ने जागरण यज्ञ को प्रज्वलित रखा। अब कहीं जाकर सामान्य हिंदू व्यक्ति को यह समझ आने लगा है कि जाति, भाषा, प्रांत और क्षेत्रीय विवादों में उलझना, अपने ही हाथों से अपने पेट में छुरा घोंपने जैसा है।
“बटेंगे तो कटेंगे” यह संदेश सामान्य व्यक्ति को समझ में आने लगा है। यह नहीं कहा जा सकता कि 100 प्रतिशत लोगों को यह समझ में आया है, लेकिन जिन्हें समझ में आया, उन्होंने महाराष्ट्र में चमत्कार कर दिखाया है।
यही हिंदुत्व छत्रपति शिवाजी महाराज ने साढ़े तीन सौ वर्ष पहले जीवन पद्धति के रूप में स्वराज्य स्थापित करते समय अपनाया था और ईश्वर को भी साक्षी बनाया था। उन्होंने ब्राह्मणों से लेकर तथाकथित महार–मांग तक सभी को एकत्र किया। उसे नैतिकता का आधार दिया और जनता के राजा बनने की उनकी भूमिका को समझा। इसलिए वे महाराष्ट्र में एक महान राज्य स्थापित कर सके। छत्रपति शिवाजी महाराज का यही ध्येयवाद स्वर्गीय बालासाहेब ठाकरे के सत्ता केंद्र में भी था।
उनकी विरासत का दावा करने वाले नामधारी ठाकरों को यह विरासत पच नहीं पाई। इसलिए वे पराजित हुए और हिंदुत्व विजयी हुआ। छत्रपति शिवाजी महाराज से चली आ रही और बालासाहेब ठाकरे द्वारा पोषित हिंदुत्व की विजय हुई है। महाराष्ट्र की राजनीति में यह एक मूलगामी परिवर्तन है। अब आगे शरद पवार का जातिवाद, ठाकरे बंधुओं का भाषावाद, प्रांतवाद और वसूलीवाद— इन सबका अवसान शुरू हो गया है। उनका पूरी तरह अंत होने में अभी कुछ समय लगेगा।
यह वैचारिक आंदोलन महाराष्ट्र में ही शुरू हुआ था। लोकमान्य तिलक इसके जनक थे। महाराष्ट्र वैचारिक आंदोलनों की भूमि है।
हिंदुत्व के विचारक स्वातंत्र्यवीर सावरकर इसके सेनापति हैं और डॉ. हेडगेवार इसके संगठनकर्ता हैं। बालासाहेब ठाकरे इसके संसदीय राजनीति के प्रवर्तक थे। यह हिंदुत्व जातिवाद को नकारता है, सर्वसमावेशिता इसका प्राण है। सामाजिक समरसता इसकी सामाजिक पहचान है। सभी उपासना पंथों का सम्मान इसकी धार्मिक पहचान है। इसी हिंदुत्व को लेकर आगे की राजनीति सभी को करनी पड़ेगी।
यदि राजनीति में अपना दल टिकाए रखना है और अपना अस्तित्व बनाए रखना है, तो इसके अलावा कोई दूसरा मार्ग नहीं है। राजनीतिक चातुर्य और समझदारी दिखाकर राजनीति में आने वाले नए नेतृत्व को यह सब समझना होगा। महाराष्ट्र की महानगरपालिकाओं के चुनाव परिणामों का यही संदेश है, ऐसा मुझे लगता है।
– रमेश पतंगे

