| नितिन नबीन का राजनीतिक और संगठनात्मक सफर इस चयन की पृष्ठभूमि को मजबूती देता है। 2023 में छत्तीसगढ़ में सह-प्रभारी के रूप में उनकी भूमिका और कठिन माने गए विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में प्रभारी के रूप में पार्टी की उल्लेखनीय सफलता ने उनकी संगठनात्मक क्षमता पर मुहर लगा दी। |
भारतीय जनता पार्टी ने संगठनात्मक राजनीति में एक महत्वपूर्ण और दूरगामी संदेश देते हुए नितिन नबीन को 20 जनवरी, 2026 में अपना नया राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्वरोध चुन लिए हैं। यह निर्णय महज नेतृत्व परिवर्तन नहीं है, बल्कि पार्टी की दीर्घकालिक रणनीति, पीढ़ीगत संतुलन और संगठनात्मक अनुशासन को भी रेखांकित करता है। मात्र 45 वर्ष की अपेक्षाकृत कम उम्र में देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी की संगठनात्मक कमान संभालना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है।
नितिन नबीन के अध्यक्ष बनने से बिहार के साथ-साथ झारखंड, खासकर रांची से जुड़े भाजपा कार्यकर्ताओं में स्वाभाविक उत्साह है। हालांकि, पार्टी नेतृत्व ने इस चयन को क्षेत्रीय पहचान से ऊपर उठाकर राष्ट्रीय संगठनात्मक आवश्यकता के रूप में प्रस्तुत किया है। यही भाजपा की राजनीति की खासियत रही है कि वह व्यक्तियों की पृष्ठभूमि से अधिक उनकी संगठनात्मक उपयोगिता और कार्यक्षमता को प्राथमिकता देती है।

आलोचकों की अपनी व्याख्या है। उनका मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने संगठन पर पकड़ बनाए रखने के लिए अपेक्षाकृत युवा और महत्वाकांक्षाओं के चरम से दूर नेता को शीर्ष पद सौंपा है। उनका तर्क है कि इससे केंद्रीय नेतृत्व की निर्णायक भूमिका बनी रहेगी और संगठन में शक्ति-स्पर्धा की गुंजाइश कम होगी। लेकिन राजनीति में हर रणनीति को केवल संदेह से नहीं देखा जाना चाहिए। किसी भी मजबूत संगठन के लिए आवश्यक है कि वह समय, परिस्थितियों और भविष्य की चुनौतियों को ध्यान में रखकर नेतृत्व तैयार करे।
यह फैसला विपक्षी दलों के लिए भी आत्ममंथन का विषय है। सवाल है कि भाजपा जैसे विशाल, विचारधारात्मक रूप से विविध और कई गुटों में बंटे संगठन में नेतृत्व परिवर्तन इतनी सहजता से कैसे स्वीकार कर लिया जाता है? वह कौन-सा सूत्र है जो असहमति और महत्वाकांक्षाओं के बावजूद पार्टी को एकजुट रखता है? यदि इसका उत्तर विचारधारा की स्पष्टता, संगठनात्मक अनुशासन और शीर्ष नेतृत्व पर भरोसे में है, तो विपक्षी दलों को भी अपनी राजनीतिक संस्कृति पर गंभीरता से विचार करना होगा। केवल चुनावी गठजोड़ और व्यक्तिवादी राजनीति के सहारे दीर्घकालिक मजबूती संभव नहीं।

नितिन नबीन का राजनीतिक और संगठनात्मक सफर इस चयन की पृष्ठभूमि को मजबूती देता है। 2023 में छत्तीसगढ़ में सह-प्रभारी के रूप में उनकी भूमिका और कठिन माने गए विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में प्रभारी के रूप में पार्टी की उल्लेखनीय सफलता ने उनकी संगठनात्मक क्षमता पर मुहर लगा दी। इस दौरान आंतरिक असंतोष की चर्चाएँ हुईं, लेकिन चुनावी नतीजों ने उन सभी अटकलों को पीछे छोड़ दिया।
राजनीतिक विरासत से आने के बावजूद नितिन नबीन को मात्र वंशवादी राजनीति का प्रतिनिधि कहना उनके सफर को सीमित करना होगा। 2006 में पिता के निधन के बाद पहली बार विधायक बने और उसके बाद 2010, 2015, 2020 तथा 2025 के विधानसभा चुनावों में लगातार जीत हासिल की। यह दर्शाता है कि वे केवल संगठन के सहारे नहीं, बल्कि जमीनी राजनीति की समझ और स्थानीय स्वीकार्यता के बल पर आगे बढ़े हैं। 2021 में बिहार सरकार में मंत्री बनने के बाद उन्हें प्रशासनिक अनुभव भी मिला, जिसने उनके राजनीतिक प्रोफाइल को और व्यापक बनाया।
उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि (कायस्थ समाज) को लेकर भी चर्चा है। धारणा है कि वे टकराव की राजनीति के बजाय संवाद, समन्वय और संगठनात्मक संतुलन पर विश्वास करते हैं। भाजपा के भीतर यह चयन सामाजिक समीकरणों की दृष्टि से संतुलित माना जा रहा है, जिससे विभिन्न सामाजिक समूहों में असंतोष की संभावना कम है— यह भाजपा की रणनीतिक राजनीति का अहम हिस्सा है।

नितिन नबीन के लिए आने वाले समय में सबसे बड़ी चुनौती संगठन को मजबूत रखते हुए लगातार चुनावी सफलताओं को सुनिश्चित करना होगा। अगले तीन वर्षों (2026 से 2028 तक) में भारत में कम से कम 10-12 प्रमुख विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, जिनमें 2026 में ही असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी जैसे महत्वपूर्ण राज्य शामिल हैं। ये राज्य कुल मिलाकर सैकड़ों विधानसभा सीटों और बड़ी आबादी वाले हैं, जहां भाजपा को दक्षिण भारत में अपनी उपस्थिति मजबूत करने, पूर्वोत्तर में सत्ता बरकरार रखने और बंगाल जैसे चुनौतीपूर्ण राज्य में ब्रेकथ्रू हासिल करने की जरूरत है। विशेष रूप से पश्चिम बंगाल का चुनाव मार्च-अप्रैल 2026 में होने की संभावना है, जहां ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस मजबूत स्थिति में है और भाजपा को 2021 के बाद भी राज्य में पैठ बढ़ाने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी।
इन चुनावों में नितिन नबीन को संगठनात्मक परीक्षा के साथ-साथ पार्टी की राष्ट्रीय छवि, सामाजिक समीकरणों का प्रबंधन और विपक्षी एकता को तोड़ने की रणनीति भी तय करनी होगी। यदि ये चुनाव सफल रहे, तो यह उनकी नेतृत्व क्षमता की मजबूत पुष्टि होगी; अन्यथा आंतरिक असंतोष और 2029 के लोकसभा चुनावों के लिए दबाव बढ़ सकता है।
कुल मिलाकर, नितिन नबीन का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना भाजपा की उस संगठनात्मक क्षमता को रेखांकित करता है, जिसके तहत वह अपने भीतर से नेतृत्व गढ़ती और समय के साथ आगे बढ़ाती है।
इस निर्णय की सफलता का अंतिम मूल्यांकन भविष्य करेगा, लेकिन फिलहाल स्पष्ट है कि भाजपा नेतृत्व परिवर्तन को भावनात्मक नहीं, बल्कि रणनीतिक और दीर्घकालिक दृष्टि से देखती है— खासकर इन आगामी विधानसभा चुनावों की चुनौतियों के बीच। यही कारण है कि वह लगातार राजनीतिक बढ़त बनाए हुए हैं, जबकि विपक्ष अभी भी नेतृत्व और दिशा की तलाश में भटकता दिखता है।
– डॉ. संतोष झा

