| तकनीक चाहे जितनी भी आगे बढ़ जाए, मानवीय आवाज की आत्मीयता का कोई विकल्प नहीं। रेडियो स्मृतियों का संदूक है- जिसमें बचपन की धुनें, युवावस्था के गीत और जीवन के कई अनकहे पल सुरक्षित हैं। रेडियो था, है और रहेगा- तरंगों में बहती भावनाओं और यादों के साथ, समय की हर कसौटी पर खरा उतरता हुआ। |
ये आकाशवाणी है… और मैं उद्घोषक हूं। हम तो दिलों पर आवाज लिखा करते हैं। हम ध्वनियों के संग चलते हैं। जब हम रेडियो से बोलते हैं तो देश के हर घर-गली और सड़क पर सुनाई पड़ते हैं। जब आप अपने रेडियो का स्विच ऑन करते हैं तब हम तुरंत ही आपको आकर्षक भावनात्मक ध्वनियों के धागे से जोड़ लेते हैं।
अब रही बात आपकी खुशियों की तो जब कभी आप परेशानियों में होते हैं, चिंता या अनेक तरह के तनावों से गुजर रहे होते हैं या यूं कहें कि आप अपने आप से बिछुड़ गए हों, अपने भीतर अपने आप को ढूंढ नहीं पा रहे होते हैं, तब हम आपके साथ होते हैं। हम आपके चारों ओर ध्वनियों के धागों से ही एक अपनेपन व आत्मीयता का एक रेशमी संसार बुनते हैं।

एक बड़ा-सा साउंडप्रूफ कमरा- जिसे स्टूडियो कहते हैं, वहीं माइक्रोफोन के सामने बैठते हैं और हमारे सामने एक बड़ा-सा कंसोल होता है, जिसमें कई सारे फेडर लगे होते हैं। आस-पास कम्प्यूटर, जिसमें ढेर सारे गानों और प्रोग्रामों का भंडार भरा होता है। माइक्रोफोन के सामने बैठे हम विशेष तैयारी के साथ आते हैं और फेडर ऑन कर कहते हैं- आइए चलें… अब फिल्मी गानों के सफर पर। फिर आपका मन ध्वनि के तरंगों पर सवार होकर आनंद लोक की यात्रा पर निकल पड़ता है।
कितना अनोखा है न, आपने रेडियो का स्विच ऑन किया, तब आपके घर में एक अपरिचित व्यक्ति अपनी आवाज के माध्यम से उपस्थित हो जाता है और बड़ी ही आत्मीयता से आपसे संवाद करता है। कभी-कभी तो वह इतना अपना लगता है जैसे आपके घर का कोई सदस्य हो और उसके आने की आपको प्रतीक्षा रहती हो।
उद्घोषक अपने इस लोकप्रिय और जिम्मेदार स्वरूप को जीने के लिए इसी रेडियो से सीखता है, ग्रहण करता है और रेडियो को लौटाता भी है।
रेडियो की जादुई दुनिया में कार्यक्रमों की प्रस्तुति अपने आप में चुनौतीपूर्ण कार्य है। इसमें हर सांस, हर शब्द पूरे संतुलन के साथ बोलना होता है। इस प्रक्रिया के दौरान अपने अंदर मंथन चलता रहता है। बोलने के समय उतार-चढ़ाव, विराम, ठहराव, स्वराघात से हर वाक्य इतना आकर्षक बनाया जाता है कि श्रोताओं के मन के कैनवास पर सुंदर चित्र उभर आए और आवाज की मधुरता उसमें रंग भरे।
भारत के जनमानस में आकाशवाणी केवल एक रेडियो स्टेशन नहीं बल्कि एक युग की आवाज है। इलेक्ट्रॉनिक युग के पहले के दशकों में तब ‘ये आकाशवाणी है…’ जैसे भारी और सुरीले स्वर ने करोड़ों भारतीयों के ड्राइंग रूम से लेकर खेतों की मेड़ों तक अपनी जगह बनाई। आकाशवाणी केवल एक प्रसारण संस्थान नहीं बल्कि सूचना, ज्ञान और मनोरंजन घर-घर तक पहुंचाने वाली अपनी भूमिका निभाते हुए जीवन की सुरीली धुन बनी। आकाशवाणी ने शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत और साहित्य को सहेजने का काम भी किया। आकाशवाणी की वही पुरानी चिरपरिचित सिग्नेचर ट्यून जिसे प्रसिद्ध पियोनिस्ट वाल्टर कॉफमैन ने तैयार किया था, आज भी एक अलग सुकून और नास्टैल्जिया पैदा करती है।
आकाशवाणी आज भी हमारी संस्कृति का वह जीवंत अभिलेख है जिसने शब्दों को पंख दिए और आवाज को पहचान। हम यानी आकाशवाणी एक लोक प्रसारक हैं। हमारा लक्ष्य है पारम्परिक और भौगोलिक सीमाओं से आगे सामाजिक आवश्यकताओं को पूरा करना। आकाशवाणी की पहुंच देश की लगभग 98% जनसंख्या तक है। यह दुनिया के सबसे बड़े भूभागीय नेटवर्क में से एक है। इसलिए हम अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को महसूस करते हुए देशभर में लोगों तक पहुंचते हैं।
आकाशवाणी की अपील व्यापक, विश्वसनीय, सूचनात्मक, शिक्षाप्रद और मनोरंजक होती है। हमारा यानी आकाशवाणी का उद्देश्य वाक्य ही है ‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’। आम जनता के हितों और मनोरंजन के लिए हमने भारतीय भाषाओं को ही माध्यम बनाया है और हम सामान्य जनमानस से उनकी भाषा में ही संवाद करते हैं, परंतु समय के साथ अब लोगों के पास रेडियो सेट का अभाव हो चला है। ऐसे में अब आप रेडियो कैसे सुनें? अपने मोबाइल पर पशुीेपरळी ऐप डाउनलोड करें और इस पर देश के 150 से अधिक आकाशवाणी केंद्र ट्यून कर अपनी भाषा और अपनी रुचियों के कार्यक्रम आप सुन सकते हैं।
तरंगों में बसती यादें और आज भी जीवित प्रासंगिकता
हर वर्ष 13 फरवरी को मनाया जाने वाला विश्व रेडियो दिवस हमें उस माध्यम की याद दिलाता है, जिसने शब्दों को आत्मीयता की आवाज दी, दूरियों को पाट दिया और पीढ़ियों की स्मृतियों में अपनी अमिट छाप छोड़ी। आज के डिजिटल और दृश्यप्रधान युग में भी रेडियो की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है बल्कि उसने समय के साथ स्वयं को नए रूप में ढाल लिया है। एक समय था जब घर के किसी कोने में रखा रेडियो पूरे परिवार का केंद्र हुआ करता था। सुबह की शुरुआत भक्ति संगीत या समाचार से होती, दोपहर में नाटक और गीतों की फरमाइशें चलतीं और रात को कहानियां सुनकर बच्चे नींद के आंचल में सो जाते। रेडियो केवल एक यंत्र नहीं था, वह परिवार का सदस्य था- जो बिना किसी शोर-शराबे के दिलों से बात करता था। रेडियो की सबसे बड़ी ताकत उसकी आवाज है। बिना चित्र के भी वह कल्पनाओं की दुनिया रच देता है।
शब्दों और सुरों के सहारे श्रोता अपने अनुभव और भावनाओं के अनुसार दृश्य गढ़ लेता है। यही कारण है कि रेडियो सुनना एक व्यक्तिगत अनुभव बन जाता है- ऐसा अनुभव, जिसमें श्रोता और प्रसारक के बीच एक अदृश्य, परंतु गहरा सम्बंध बनता है। आज जब इंटरनेट, पॉडकास्ट और मोबाइल ऐप्स का दौर है, रेडियो ने खुद को नए समय के अनुरूप ढाल लिया है। एफएम रेडियो, ऑनलाइन रेडियो और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर प्रसारण ने इसकी पहुंच को और व्यापक बना दिया है। आपातकालीन सूचनाओं से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक जागरूकता फैलाने में रेडियो आज भी एक सशक्त माध्यम है। कम संसाधनों में अधिक लोगों तक पहुंचने की इसकी क्षमता इसे अद्वितीय बनाती है।
–आनंद सिंह
