रक्षा और सामरिक विषय संवेदनशील और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े होते हैं। इन पर प्रमाणिक, शोध-आधारित और तथ्यपरक किताबें लिखना इसलिए आवश्यक है क्योंकि ये समाज में सही जानकारी का प्रसार करती हैं, मिथकों और भ्रांतियों को दूर करती हैं।
ऐसी किताबें नीति-निर्माताओं, सेना के अधिकारियों, युवा अधिकारियों, पत्रकारों और जागरूक नागरिकों को विश्वसनीय ज्ञान देती हैं। गलत या सनसनीखेज जानकारी राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुंचा सकती है। प्रमाणिक साहित्य राष्ट्रीय सुरक्षा चेतना को मजबूत करता है, वैचारिक स्पष्टता लाता है और आने वाली पीढ़ियों को सैन्य-रणनीतिक सोच से परिचित कराता है।
इस क्रम में, वरिष्ठ लेखक योगेश कुमार गोयल की पुस्तक ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ हिंदी में रक्षा, सामरिक अध्ययन और राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान है।
हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा प्रकाशन के लिए अनुदान प्राप्त यह कृति (जो लेखक की सातवीं पुस्तक है) जनवरी 2026 के आसपास चर्चा में आई और इसे हाल की एक अहम रचना माना जा रहा है। यह पुस्तक स्वतंत्र भारत की रक्षा यात्रा को समुद्र से लेकर अंतरिक्ष तक की व्यापक परिधि में प्रस्तुत करती है, जिसमें आत्मनिर्भर भारत के संदर्भ में सैन्य तकनीकी विकास की गहन पड़ताल की गई है।

पुस्तक का केंद्रीय विषय भारत की रक्षा क्षमताओं का बहुआयामी विकास है। लेखक ने थलसेना, नौसेना और वायुसेना के क्रमिक उन्नयन को विस्तार से चित्रित किया है। प्रारंभिक अध्यायों में स्वतंत्रता के बाद की रक्षा नीति, 1962, 1965, 1971 और कारगिल जैसे युद्धों के सबकों से निकले सुधारों पर प्रकाश डाला गया है।
इसके बाद आधुनिक युग में मिसाइल प्रौद्योगिकी (अग्नि, पृथ्वी, ब्रह्मोस, आकाश आदि), लड़ाकू विमान (राफेल, तेजस, सुखोई-30), एयर डिफेंस सिस्टम (एस-400), युद्धपोत (विक्रांत, कोलकाता क्लास डिस्ट्रॉयर), पनडुब्बियां और ड्रोन तकनीक जैसी उपलब्धियों का गहन विश्लेषण है।
एक विशेष आकर्षण पुस्तक का अंतरिक्ष खंड है, जहां इसरो के साथ डीआरडीओ के सहयोग से विकसित एंटी-सैटेलाइट हथियार (मिशन शक्ति), सैन्य उपग्रह, जीसैट श्रृंखला और अंतरिक्ष युद्ध की रणनीतिक क्षमता पर विस्तृत चर्चा है।
लेखक स्पष्ट करते हैं कि आज का युद्ध केवल भूमि, जल या आकाश तक सीमित नहीं रहा बल्कि अंतरिक्ष अब रक्षा का चौथा आयाम बन चुका है। यह खंड भारत की ‘नो फर्स्ट यूज’ नीति को बनाए रखते हुए भी निर्णायक रक्षात्मक शक्ति के रूप में उभरते भारत की तस्वीर पेश करता है।
योगेश कुमार गोयल की पत्रकारिता की पृष्ठभूमि पुस्तक में स्पष्ट झलकती है। तथ्य आधारित, आंकड़ों से समृद्ध और सरल भाषा में जटिल विषयों को समझाने की क्षमता सराहनीय है। तकनीकी विवरणों को आम पाठक के लिए सुगम बनाया गया है, बिना गहराई खोए।
पुस्तक में आत्मनिर्भर भारत अभियान के अंतर्गत मेक इन इंडिया, iDEX और डिफेंस PSU की भूमिका को रेखांकित किया गया है, जो वर्तमान सरकार की नीतियों से जोड़ती है। साथ ही, चीन-पाक गठजोड़ और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की बढ़ती सामरिक अहमियत पर भी संतुलित टिप्पणियां हैं। हिंदी में रक्षा विमर्श की कमी को देखते हुए यह एक मूल्यवान कृति है।
कुल मिलाकर, ‘सागर से अंतरिक्ष तक’ उन पाठकों के लिए अनिवार्य है, जो भारत की रक्षा क्रांति को समझना चाहते हैं। यह पुस्तक गर्व की अनुभूति कराती है कि कैसे एक विकासशील राष्ट्र ने चुनौतियों के बावजूद सागर से अंतरिक्ष तक अपनी रक्षा को मजबूत और स्वावलंबी बनाया है। योगेश गोयल ने हिंदी में एक ऐसा दस्तावेज तैयार किया है, जो छात्रों, रक्षा प्रेमियों, नीति-निर्माताओं और सामान्य नागरिकों के लिए प्रेरणादायक और सूचनाप्रद दोनों है।
यह कृति न केवल भारत की सामरिक प्रगति का दर्पण है बल्कि भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार रहने का संदेश भी देती है। 2025-26 में भारत ने रक्षा क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की। रक्षा बजट 7.85 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचा, जिसमें आधुनिकीकरण के लिए पूंजीगत व्यय में 15 प्रतिशत से अधिक वृद्धि हुई। आत्मनिर्भर भारत के तहत स्वदेशी उत्पादन 1.5 लाख करोड़ रुपये पार कर गया, निर्यात में रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज हुई। ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियानों ने सशस्त्र बलों को और सशक्त बनाया।
योगेश कुमार गोयल की यह पुस्तक इन ताजा घटनाक्रमों के साथ पूरी तरह मेल खाती है। यह पाठकों को बताती है कि सागर से अंतरिक्ष तक की यात्रा अब केवल इतिहास नहीं बल्कि वर्तमान और भविष्य की राष्ट्रीय सुरक्षा की आधारशिला है। ऐसी किताबें रक्षा चेतना को जीवंत रखती हैं और युवा पीढ़ी को मजबूत भारत के निर्माण में योगदान देने के लिए प्रेरित करती हैं।
समीक्षक: विवेक शुक्ला
पुस्तक: सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति
लेखक: योगेश कुमार गोयल
पृष्ठ संख्या: 300
मूल्य : 695 रुपये
प्रकाशक: मीडिया केयर नेटवर्क, नई दिल्ली

