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Supreme Court SC reservation decision

सुप्रीम कोर्ट: अनुसूचित जाति आरक्षण निर्णय

क्यों मतांतरण है एक राष्ट्र विरोधी कार्य?

by हिंदी विवेक
in विशेष, शिक्षा
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भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने अनुसूचित जाति के संदर्भ में अत्यंत ही महत्वपूर्ण निर्णय दिया है। इस निर्णय से धर्मांतरण के अवैध व असामाजिक कृत्यों से देश को अंशतः मुक्ति मिलेगी। यद्यपि यह निर्णय अभी अधूरा है, जनजातीय समाज को भी इस निर्णय में सम्मिलित करने से ही देश आरक्षण के दुरुपयोग को रोक पायेगा, तथापि इस निर्णय से भारत में आरक्षण कानून की आत्मा की अंशतः रक्षा तो होगी ही। यह निर्णय समय की माँग के अनुसार जनजातीय वर्ग को अपने प्रभाव में नहीं ले रहा है तथापि इस प्रकार के निर्णय की प्रतीक्षा देश का अनुसूचित जनजातीय समाज बड़ी आतुरता से कर रहा है।

शीर्ष न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि अनुसूचित जाति (SC) के अंतर्गत मिलने वाले आरक्षण का लाभ केवल उन्हीं को मिलेगा जो मूल रूप से उस सामाजिक-धार्मिक श्रेणी में बने रहते हैं। यदि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन कर लेता है, तो वह स्वतः उस आरक्षण के अधिकार से वंचित हो सकता है, क्योंकि यह आरक्षण ऐतिहासिक सामाजिक वर्गीकरण के आधार पर दिया गया है।

Supreme Court of India | India

“एक धर्मांतरण एक देशद्रोही को जन्म देता है” – स्वामी विवेकानंद
यह निर्णय केवल एक कानूनी व्याख्या नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता को, सामाजिक संरचना को व हिंदुत्व के विरुद्ध चल रहे कुचक्र को रोकने वाला महत्वपूर्ण कदम है। स्वामी विवेकानंद ने धर्मांतरण की आग की आँच को भाँपकर ही कहा था- “एक धर्मांतरण एक देशद्रोही को जन्म देता है।”

भारत में विदेशी आक्रांताओं द्वारा भारतीय जाति व्यवस्था को षड़यंत्रपूर्वक छिन्न-भिन्न किया गया था। विदेशी आक्रमणकारी चाहे वे मुस्लिम हों या अंग्रेज़ अपने लाभ के लिए भाले-भाले हिंदू समाज में जातियों के आधार पर मतभेद के बीज बोते रहे हैं और सत्ता की फसल काटते रहे हैं। विदेशी आक्रणताओं के षड्यंत्रों के परिणाम स्वरूप ही पराधीन भारत में कई जातियों को हिंदू समाज में घोर उपेक्षा, अनदेखी, अनादरण व अपवंचन का करना पड़ा था।

सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया है कि जब कोई व्यक्ति धर्म बदलता है, तो वह उस मूल सामाजिक ढांचे से बाहर आ जाता है, जिसके कारण उसे आरक्षण दिया गया था, यह सही भी है। विदेशी धर्मों को मानने वाले कई लोग धर्म बदलकर भी आरक्षण का लाभ उठा रहे थे जो कि आरक्षण कानून की मूल आत्मा के ही विरुद्ध है।
सर्वोच्च न्यायालय ने यह मंतव्य प्रकट किया है कि ईसाईत व इस्लाम में जाति व्यवस्था का उल्लेख ही नहीं है, अतः जातिगत भेद-विभेद भी इन धर्मों में नहीं होते हैं। यह निर्णय ईसाई एवं इस्लामिक की मान्य मजहबी किताबों के आशय/दुराशय को ही आगे बढ़ाता है।

बौद्ध, जैन, सिक्ख समुदाय को आरक्षण का लाभ पूर्ववत् मिलता रहेगा क्योंकि इनमें जाति व्यवस्था लागू है।
भारतीय समाज में मंथन चलता रहा है कि धर्मांतरण केवल आस्था का विषय है या इसके पीछे सामाजिक, आर्थिक और संस्थागत कारण भी काम करते हैं। अधिकांश धर्म परिवर्तन के मामलों में यह देखा गया है कि गरीब और वंचित वर्गों को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार या अन्य सुविधाओं के माध्यम से प्रभावित कर धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित किया जाता है। मतांतरण के पीछे केवल और केवल दुराशय ही होते हैं।

Rising Forced Conversions in Tribal Chhattisgarh Spur Government to Bring Tougher Law - The Narrative World

यह और कुछ नहीं अपितु भारत में जनसांख्यिकीय संतुलन को बिगाड़ कर अपनी संख्या बढ़ाने समाज, सत्ता, व्यवस्था को मजहबी कानून से चलाने का एक षड्यंत्र है। लोकतंत्र में संख्या बल ही सत्ता को निर्धारित, नियंत्रित व नियमित करता है। धर्मांतरण कुचक्र का लक्ष्य अपनी संख्या बढ़ाने और टेक्टिकल वोटिंग के माध्यम से निर्णय प्रक्रिया में हावी होने का रहता है।

इस विषय में यह भी ध्यान देना चाहिए कि दो कथित धर्म की मूल व्याख्याओं में ही अपनी संख्या को येन केन प्रकारेण बढ़ाने का मूल लक्ष्य सम्मिलित है। यह एक प्रामाणिक तथ्य है जिसे हम इनकी मजहबी किताबों में सरलता दे देख सकते हैं। यहीं से मतांतरण एक राष्ट्र विरोधी कार्य बन जाता है। भारत में ईसाईयत एवं इस्लाम की विस्तारवादी दुष्प्रवृत्ति मतांतरण का प्रमुख कारण है। ईसाईयत एवं इस्लाम दुष्प्रवृत्ति ने भारत के जातीय वर्गीकरण में असंतोष, भेद, विभेद, मतभेद, दूरियों के बीज बोए और सत्ता हथियाकर भारतीय धन-संपदा, संसाधनों को भरपूर लूटा है।

Anti-Conversion Law in India Threatens Christians

सर्विदित है कि भारत में निर्धन वर्ग को व अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के बंधुओं को लक्ष्य बनाकर ईसाई व मुस्लिम संस्थानों द्वारा धर्मांतरण कराया जा रहा है। यह धर्मांतरण लव जिहाद, लैंड जिहाद आदि जैसे आपराधिक तरीकों से कराया जा रहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, नौकरी, कुछ सुविधाएँ, आदि देने के नाम पर बलात् मतांतरण के लाखों मामले देश के वायुमंडल में विष घोलते रहे हैं। डरा-धमकाकर, बहला-फुसलाकर भारतीय ग्रामीणों भी मतांतरण कराए जाने के लाखों मामले प्रतिवर्ष समाज में आते रहे हैं।

इस प्रकार के मामले सामने आने पर देश में अनेक बार सामाजिक शांति, सौहाद्र, सद्भाव बिगड़ता है व कानून व्यवस्था भंग होती है। मतांतरण के कारण देश में झगड़े, दंगे, बवाल होते हैं। अब सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से आरक्षण का लाभ समाप्त होने के भय से मतांतरण की गति कम होगी।
यह निर्णय सुनिश्चित करता है कि आरक्षण का लाभ उसी उद्देश्य के लिए उपयोग हो, जिसके लिए उसे बनाया गया था।

स्वाभाविक ही है कि धर्म परिवर्तन के साथ व्यक्ति का सामाजिक नेटवर्क, संस्थागत समर्थन और जीवनशैली बदल सकती है। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि क्या वह पहले जैसी सामाजिक वंचना का सामना कर रहा है या नहीं?

इस निर्णय का स्वागत समूचा देश कर रहा है किंतु इसमें अभी कुछ और सुधार होना शेष है। SC के साथ-साथ यह नियम ST पर भी लागू होना चाहिए था। देश का जनजातीय समाज भी इन विदेशी व आयातित धर्मों के दुश्चक्र का बड़ा शिकार रहा है। देश का इतिहास साक्षी है कि वनवासी समाज को बड़ी मात्रा में शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक लालच, लव जिहाद, लैंड जिहाद, डरा-धमकाकर मतांतरण के कुएँ में धकेला जाता रहा है।

सर्वोच्च न्यायालय को इस वन्दनीय निर्णय के आलोक में जनजातीय आरक्षण, मतांतरण आदि का अध्ययन करके स्वयं ही संज्ञान लेना चाहिए।
यदि शीर्ष न्यायालय ऐसा करता है तो देश में आरक्षण का लाभ केवल उन लोगों तक पहुंचेगा जो वास्तव में उसी सामाजिक परिस्थिति में हैं जिसके लिए नीति बनाई गई थी। अन्यथा तो आरक्षण कानून के दुरुपयोग के उदाहरणों के बड़े आकार के नित नए शूलनुमा पहाड़ देश में और भी खड़े होते ही रहेंगे।
– प्रवीण गुगनानी

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