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माओवादी आतंक का अंत

माओवादी आतंक का अंत

अर्बन नक्सलियों पर अमित शाह का प्रहार !

by हिंदी विवेक
in ट्रेंडींग, राजनीति
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देश नक्सलवाद-माओवाद के आतंक से मुक्त हो गया। माओवादी आतंक से मुक्ति एक बड़ी विजय के रूप में देखी जानी चाहिए। ये विजय दृढ़ संकल्प, दृढ़ इच्छाशक्ति और ध्येय निष्ठा की है। 1970 के दशक से चले आ रहे ख़ूनी आतंक, हथियारबंद माओवादियों का तय समय पर खात्मा सुनिश्चित हुआ, लेकिन जितना कह देना आसान है उतना आसान नहीं था इस माओवादी आतंक का समूलनाश कर देना।

Explainer: भारत में कितनी बची हैं नक्सलवाद की जड़ें, 1 साल में इसके खात्मे  के लक्ष्य में क्या हैं चुनौतियां? - Naxalism loosing ground in India Nine  States Still affected What ...

इसके लिए केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की स्पष्टता और ज़ीरो टॉलरेंस की नीति है। इस अभियान की सफलता के नायक वो सुरक्षाबल हैं, जो अपने प्राण हथेली पर रखकर – माओवादियों के अभेद्य कहे जाने वाले ठिकानों तक पहुंचे। पूरे नक्सल माड्यूल का खात्मा किया। सरकार की ‘पहले बोली फिर गोली’ वाली नीति अत्यंत कारगर सिद्ध हुई। साथ ही सरेंडर करने वाले नक्सलियों के लिए पुनर्वास नीति महत्वपूर्ण मानवीय पहलू है। जो उन्हें गरिमापूर्ण जीवन देती है।

सत्य ये है कि माओवादी आतंक का सबसे बड़ा दंश अगर किसी ने झेला तो वो छत्तीसगढ़ रहा, लेकिन 31 मार्च 2026 की तारीख़- नक्सलवाद के खात्मे के तौर पर दर्ज हो गई। छत्तीसगढ़ का बस्तर जहां कभी गोलियां और निर्दोषों की चीखें गूंजती थीं। अब वहां शांति, प्रगति और लोकतंत्र की नई किरणें चमकती हुई दिखाई दे रही हैं। छत्तीसगढ़ से नक्सलवाद के समाप्त होने में केंद्र सरकार, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और गृहमंत्री विजय शर्मा की महत्वपूर्ण भूमिका है। डबल इंजन की सरकार के क्रांतिकारी निर्णयों के चलते ही माओवादी आतंक के ताबूत में अंतिम कील ठोंकी जा सकी।

राजनीतिक नेतृत्व की सुस्पष्टता, लक्ष्य के लिए समर्पण और जवानों की प्रतिबद्धता, निष्ठा ने नए युग का शुभारंभ किया है। छत्तीसगढ़ का नक्सलवाद से मुक्त होना लोकतंत्र के सूर्योदय जैसा है।

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने 30 मार्च 2026 को लोकसभा में नक्सल उन्मूलन से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों की ओर ध्यानाकर्षित किया। उन तमाम आरोपों के सिलसिलेवार तरीके से जवाब दिए, जो माओवादियों के रहनुमाओं द्वारा लगाए जाते हैं। साथ ही गृहमंत्री शाह ने ऐसे-ऐसे तथ्य देश के सामने रखे, जो हर किसी को जानना चाहिए।

शाह के मुताबिक- “साल 2024, 2025 और 2026 का संयुक्त आंकड़ा इस प्रकार है- 4,839 नक्सलियों ने सरेंडर किया, 2,218 जेल गए और 706 नक्सलियों को मुठभेड़ में मार गिराया गया, जो दूसरों को बंधक बनाकर सरेंडर होने ही नहीं देते थे। यही शासन का अप्रोच होना चाहिए, जो वार्ता करना चाहता है, उसके साथ संवाद; और जो हमारे जवानों, किसानों, आदिवासियों और बच्चों पर गोली चलाता है, उसका जवाब गोली से देना चाहिए। यही शासन का नियम और यही शासन का मुद्दा है।”

नक्सलवाद की समस्या : कानून-व्यवस्था कड़ाई से लागू करनी होगी - problem of  naxalism law and order will have to be strictly implemented-mobile

वैसे हथियारबंद नक्सलवाद तो ख़त्म हो गया और जहां भी पनपता दिखाई देगा, सुरक्षाबल वहीं ठिकाने लगा देंगे, लेकिन ‘अर्बन नक्सल’ का ख़तरा अब भी मौजूद है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने लोकसभा में 30 मार्च 2026 को जिन तथ्यों की ओर ध्यान दिलाया। उन पर चर्चा करना अत्यन्त आवश्यक है। वस्तुत: अर्बन नक्सल और हथियार बंद नक्सलियों में कोई विशेष अंतर नहीं है। अंतर सिर्फ़ इतना है कि हथियारबंद माओवादी- हथियार से लोगों की हत्या करते थे। अर्बन नक्सली अपने एसी केबिनों, यूनिवर्सिटीज, एनजीओ, एक्टिविस्ट, कलम घिस्सू, चीखती-चिल्लाती आवाज़ों, नाटक मंडलियों, किताबों की शक्ल में रक्तपात का प्रोपेगैंडा फैलाते हैं।

रक्तपात के लिए हथियारबंद माओवादियों को तैयार करते हैं। जब हथियारबंद माओवादी कमजोर पड़ते हैं, तो अर्बन नक्सली मदद भेजते हैं। जब अर्बन नक्सली कमज़ोर पड़ते हैं तो हथियारबंद माओवादी मदद के लिए आगे आते हैं। ये सिलसिला 70 के दशक से चलता आ रहा है। देश से हथियारबंद नक्सलवाद के ख़त्म होने के बाद अर्बन नक्सली नई रणनीति पर जुट गए होंगे। ऐसे में उस पूरे माड्यूल को समझना और तथ्यों को सार्वजनिक प्रकाश में लाना समय की मांग है।

अर्बन नक्सली कैसे काम करते हैं? उसे ऐसे समझें कि जब से मोदी सरकार ने नक्सलवाद को ख़त्म करने की 31 मार्च 2026 की डेडलाइन दे दी थी। उसके बाद से लगातार माओवादी आतंकियों के पक्ष में नैरेटिव तैयार किया जा रहा था। माओवादियों के ख़िलाफ़ की जाने वाली कार्रवाइयों को ग़लत बताया जा रहा था। बातचीत न करने के आरोप लगाए जा रहे थे।

ऐसे में गृहमंत्री अमित शाह सदन में जब चर्चा करने आए तो वो फैक्टशीट के साथ आए। उन्होंने इसी संदर्भ में कहा- “मैंने छह दिनों में ‘अर्बन नक्सलस’ के लगभग 2,000 आर्टिकल निकाले हैं, सभी इनके समर्थक बुद्धिजीवियों के लिखे हुए। इनके सारे आर्टिकल यही कहते हैं कि हथियार उठाकर घूम रहे माओवादियों के साथ चर्चा करो, ये अन्याय के खिलाफ लड़ रहे हैं, इन्हें मारना नहीं चाहिए, उनके प्रति सहानुभूति होनी चाहिए, लेकिन कोई भी आर्टिकल, 8 साल के अबोध बच्चे के लिए नहीं है, जिसे उठाकर हथियार पकड़ा दिया गया।

कोई भी आर्टिकल उस किसान के लिए नहीं है, जिसका पैर खेत में जाते हुए उड़ गया और जो आज जीवनभर दिव्यांग है। 5,000 से ज़्यादा सिक्योरिटी फोर्सेस शहीद हुए, उनकी विधवाओं के लिए एक भी आर्टिकल नहीं है, उनके अनाथ बच्चों के लिए कोई लेख नहीं है। उनकी मानवता केवल संविधान तोड़कर हथियार उठाने वालों के लिए है?”
बात केवल इतनी ही नहीं है। जब साल 2005 में माओवादी आतंक के ख़िलाफ़ जन आंदोलन खड़ा हुआ। बस्तर टाइगर के नाम से सुप्रसिद्ध राजनेता महेंद्र कर्मा इसके योजनाकार थे।‌

‘सलवा जूडूम’ के ज़रिए स्थानीय जनजातीय युवाओं को SPO बनाया गया। उन्हें माओवादियों से लड़ने के लिए प्रशिक्षण और शस्त्र दिए गए। इसके चलते माओवादी आतंक पर नकेल कसनी शुरू हो गई थी, लेकिन अर्बन नक्सलियों को ये पहल रास नहीं आई। उसके बाद ‘सलवा जुडूम’ को वापस लेने के लिए एक सुनियोजित रणनीति शुरू हुई। 5 जुलाई 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया। ‘नन्दिनी सुन्दर और अन्य’ द्वारा दायर विवाद पर जस्टिस सुदर्शन रेड्डी की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह आदेश दिया कि नक्सलियों के खिलाफ राज्य की लड़ाई गैर-कानूनी है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने तुरंत सलवा जुडूम से जुड़े लोगों से हथियार वापस लेने का आदेश जारी किया।

Naxalism to end before March 31: Amit Shah - The Hitavada

किंतु इसका परिणाम क्या हुआ? सलवा जुडूम बैन होने से माओवादी आतंकियों को एक कवच मिला। सलवा जुडूम के SPO ‘कोया कमांडोज’ से उनके हथियार वापस ले लिए गए। इस बीच माओवादियों ने चुन-चुनकर उन लोगों की हत्याएं की। जो सलवा जुडूम से जुड़े हुए थे‌। मई 2013 में सुकमा-जगदलपुर मार्ग से गुज़र रहे महेंद्र कर्मा के काफिले पर- झीरम घाटी में घात लगाए नक्सलियों ने हमला कर दिया। महेंद्र कर्मा समेत 30 से अधिक नेता और सुरक्षा जवानों को माओवादियों ने मौत के घाट उतार दिया। इस हमले का भी मास्टरमाइंड वही ‘माडवी हिड़मा’ था जिसे अर्बन नक्सली ‘हीरो’ की तरह ग्लैमराइज कर रहे हैं।

हिड़मा: नक्सल आंदोलन का वो आदिवासी चेहरा, जिसने नक्सलियों के लड़ने के  तरीक़े को बदल डाला - BBC News हिंदी

जबकि ‘माडवी हिड़मा’ को दुर्दांत अपराधी बनाने के पीछे अर्बन नक्सली ही थे। जिन्होंने हिड़मा के ज़रिए रक्तपात किया। निर्दोषों का ख़ून बहाया। वो हिड़मा जो अपनी मां, बाप, घर-परिवार, गांव और अपने जनजातीय समाज का सगा नहीं हुआ। वो हिड़मा जिसने सैकड़ों निर्दोष लोगों की बर्बरतापूर्ण ढंग से हत्या की। अब अर्बन नक्सली हीरो बनाने पर जुटे हैं, ये दुर्भाग्यपूर्ण है। तथ्य ये भी है कि महेंद्र कर्मा की नक्सलियों ने इसीलिए हत्या की, क्योंकि उन्होंने ‘सलवा जूडूम’ की शुरुआत की थी। उन्होंने कांग्रेस की पार्टी लाइन से हटकर माओवादी आतंकवाद के ख़िलाफ़ मोर्चा लिया था।

अब, सलवा जुडूम को बैन करवाने से जुड़े दो किरदारों की बात करते हैं जिनका गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में ज़िक्र किया। इन दोनों का कांग्रेस से कैसे कनेक्शन जुड़ता है? इस पर भी चर्चा करेंगे। पहली हैं नंदिनी सुंदर और दूसरे हैं जस्टिस सुदर्शन रेड्डी। नंदिनी सुंदर, डीयू की प्रोफेसर हैं जिन पर माओवादियों का साथ देने के आरोप लगते रहे हैं। वहीं उनके ख़िलाफ़ साल 2016 में एक आदिवासी की हत्या का मुक़दमा दर्ज हुआ था।

दरअसल, बस्तर क्षेत्र के सुकमा जिले के नामा गांव में ग्रामीण शामनाथ बघेल की हत्या के आरोप में पुलिस ने मृतक की पत्नी की लिखित शिकायत पर FIR दर्ज की थी। उस समय दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नंदिनी सुंदर, जेएनयू की प्रोफेसर अर्चना प्रसाद, विनीत तिवारी और छतीसगढ़ में मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव संजय पराते और अन्य लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था। हालांकि 2018 में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार आई। साल 2019 में भूपेश सरकार ने नंदिनी सुंदर के ख़िलाफ़ दर्ज केस वापस ले लिया था। दूसरे हैं जस्टिस सुदर्शन रेड्डी जिन्होंने ‘सलवा जुडूम’ को असंवैधानिक बताकर बैन किया था। वो उपराष्ट्रपति उपचुनाव 2025 में कांग्रेस और इंडी गठबंधन के प्रत्याशी बने।

Union Home Minister Amit Shah To Address Lok Sabha Tuesday Noon

इसी आधार पर गृहमंत्री अमित शाह ने लोकसभा में तीखा हमला बोलते हुए कहा था कि “जस्टिस सुदर्शन रेड्डी विपक्ष का उपराष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बने, यह स्पष्ट करता है कि कांग्रेस पार्टी का कहना ‘हमारा क्या लेना-देना’ सही नहीं है। हमारे न्यायतंत्र में न्यायधीश को तटस्थ माना जाता है, लेकिन यदि कोई न्यायधीश अपनी व्यक्तिगत विचारधारा को संवैधानिक पोशाक में बदलकर आदेश जारी करता है और इसके कारण हजारों निर्दोष आदिवासियों की जान जाती है, तो इस न्यायनिर्णय की घोर निंदा होनी चाहिए। जिन लोगों ने इन्हें वोट दिया और प्रत्याशी बनाया, उन्हें यह समझना चाहिए कि विचारधारा जनता के भले से ऊपर नहीं हो सकती। विचारधारा कभी भोले-भाले आदिवासियों की सुरक्षा से ऊपर नहीं हो सकती। विचारधारा जनता के कल्याण से ऊपर नहीं हो सकती।”

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने सदन में जिस तरह से कांग्रेस पर नक्सलियों को संरक्षण देने के आरोप लगाए,वो झकझोर कर रख देने वाले हैं।
ऐसे में सवाल उठते हैं कि क्या ‘सलवा जुडूम’ बैन, नंदिनी सुंदर, जस्टिस बी सुदर्शन रेड्डी और कांग्रेस का कनेक्शन केवल एक संयोग है या सुनियोजित तंत्र?

इसके अतिरिक्त भी गृहमंत्री अमित शाह ने मनमोहन सरकार के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार की सबसे पॉवरफुल काउंसिल NAC के बारे में भी तीखे प्रहार किए। सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली NAC में नक्सलवाद माओवाद से जुड़े लोगों की भूमिका पर भी पर्याप्त प्रकाश डाला। उन्होंने इसे ‘अर्बन नक्सल’ इकोसिस्टम से जोड़ा।

गृहमंत्री अमित शाह ने कहा- “1970 से नक्सली आतंक क्यों चला, इसका मूल समझना आवश्यक है। जब मनमोहन सिंह जी की सरकार बनी, तब एक NAC यानी नेशनल एडवाइजरी काउंसिल बनाई गई। यह एक्स्ट्रा कॉन्स्टिट्यूशनल फोरम था, देश की नीति और कानून बनाने वाला। इस फोरम में सोनिया गांधी अध्यक्ष थीं, हर्ष मंदर इसके सदस्य थे, उनके एनजीओ ‘अमन वेदिका’ ने शीर्ष नक्सली नेता की पत्नी को जिम्मेदारी दी। रिकॉर्ड है कि वही नक्सलियों में शामिल थी जिन्होंने अपहरण किए थे। इस NAC ने देश की नीति निर्धारण की, रामदयाल मुंडा कहते थे कि- नक्सल ऑपरेशन ज़रूरत से ज़्यादा कठोर है।

प्रच्छन्न समर्थन ने नक्सलियों की हिम्मत बढ़ाई। शबनम हाशमी, राम पुनियानी, उषा रामनाथन, एनसी सक्सेना, जीन ड्रेज़, फराह नकवी और विनायक सेन जैसे लोग- 2010 में अदालत द्वारा दोषी पाए गए, फिर भी महत्वपूर्ण पदों पर रहे। जयराम रमेश ने महेश राउत, जो नक्सली था, उसकी रिहाई के लिए तत्कालीन कांग्रेस मुख्यमंत्री को पत्र लिखा।”
उपर्युक्त तथ्य डराने वाले हैं। ये तथ्य ये बताते हैं कि कैसे दशकों तक कांग्रेस और माओवादियों के गठबंधन के चलते देश हिंसा झेलता रहा। छत्तीसगढ़ के बस्तर समेत देश के कई राज्यों में नक्सलवाद का रक्त चरित्र देखने को मिला। कैसे माओवादी आतंकी- कांग्रेस के संरक्षण में आतंक मचाते रहे। देश के संविधान और कानून से ऊपर उठकर नक्सलियों ने पूरे जनजीवन को त्रासदी में बदल दिया था।‌

गृहमंत्री अमित शाह ने 30 मार्च 2026 को संसद में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से लेकर अब तक – ‘माओवाद, अर्बन नक्सल, कांग्रेस’ के अंतर्संबंधों को लेकर ही बातें नहीं रखी। बल्कि वर्तमान लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को लेकर भी चौंकाने वाले खुलासे किए। गृहमंत्री अमित शाह ने सीधा आरोप लगाते हुए कहा कि “जब सर्वोच्च सत्ता के केंद्र में नक्सल समर्थक बैठें, तो नक्सलियों का हौसला कैसे टूटेगा? यह कांग्रेस पार्टी ने किया था, यह इतिहास है। राहुल गांधी के राजनीतिक करियर में कई बार नक्सलियों और उनके हमदर्दों के साथ देखा गया। भारत जोड़ो यात्रा में कई नक्सल फ्रंटल संगठन शामिल थे।

राहुल गांधी ने 2010 में ओडिशा में लाडो सिकोका के साथ मंच साझा किया, 2018 में हैदराबाद में गुम्माडी विट्ठल राव उर्फ ‘गद्दार’ से मुलाकात की। 2025 में कोऑर्डिनेशन कमेटी ऑफ पीस के साथ मुलाकात हुई। हिडमा, जिसने 172 जवानों को मारा, वो जब मारा गया तो इंडिया गेट पर नारे लगे कि ‘कितने हिड़मा मारोगे, हर घर से निकलेंगे हिडमा’।— यह वीडियो राहुल गांधी ने खुद ट्वीट किया। वर्ष 2010 से मार्च 2026 तक नक्सलवाद का समर्थन जारी रहा, 20,000 लोगों की हत्या का दोषी अगर कोई एक है, तो कांग्रेस और उनकी वामपंथी विचारधारा वाली पार्टी है। नक्सलियों के बीच रहकर ये पार्टी और उनके नेता स्वयं नक्सलवादी बन गए।”

समेकित तौर पर कहा जाए तो अमित शाह ने नक्सलवाद के खात्मे को लेकर अपने संबोधन में जिन तथ्यों का उल्लेख किया। वो एक ओर हथियारबंद माओवादी आतंक पर निर्णायक जीत प्रकट करते हैं। दूसरी ओर अर्बन नक्सलियों के गंभीर ख़तरों को भी देश के सामने लाते हैं। लेकिन शाह ने इस बात पर भी ज़ोर दिया है कि अर्बन नक्सली भी बख़्शे नहीं जाएंगे। अगर देश और समाज में हिंसा, रक्तपात, संघर्ष के विषैले नाग निकलेंगे तो फन सहित कुचल दिए जाएंगे। क्योंकि ये देश संविधान, कानून और राष्ट्रीयता के भाव से चलता है। जो भी देश और समाज को उपद्रकवारी संघर्ष में झोंकेगा उसका हश्र वही होगा जो माओवादी आतंक का हुआ है। लेकिन एक व्यक्ति और समाज के नाते हम सभी की ये जिम्मेदारी बनती है कि हम भी अपने आस-पास ऐसे माड्यूल की पहचान करें। संविधान सम्मत ढंग से उनका प्रतिकार करें।
– कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

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