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धर्मांतरण पर कठोर नीति और राष्ट्रीय कानून आवश्यक

धर्मांतरण पर कठोर नीति और राष्ट्रीय कानून आवश्यक

by हिंदी विवेक
in ट्रेंडींग, सामाजिक
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इस विषय की गंभीरता को देखते हुए इसी साल मार्च माह में देश के सर्वोच्‍च सदन राज्यसभा में डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी द्वारा इसे एक मांग के रूप में उठाया गया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि “यह विषय सिर्फ धार्मिक आस्था का प्रश्न होने भर तक सीमित नहीं है, आज यह हमारी सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक स्थिरता और संवैधानिक संतुलन का विषय बन चुका है।”

केरल के तिरुवल्ला में आयोजित एनडीए की रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा विपक्ष पर “झूठ के नैरेटिव” फैलाने के आरोपों के बीच एक महत्वपूर्ण और गंभीर विमर्श पर संवाद खड़ा किया गया, वह है “धर्मांतरण”। विशेषकर धोखे, प्रलोभन या दबाव के माध्यम से होने वाले मतांतरण पर उनकी तीखी टिप्‍पणियां सुनने को मिलीं। अब एक तरह से देखें तो ‘द केरल स्टोरी’ और ‘द कश्‍मीर फाइल्‍स’ जैसी फिल्मों के माध्‍यम से उठी यह विचार क्रांति देश की कानून व्यवस्था, संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक संतुलन के केंद्र में आ खड़ी हुई है।

वस्‍तुत: इसके बाद सवाल साफ है कि क्या भारत को इस विषय पर एक समान, स्पष्ट और सख्त केंद्रीय कानून की आवश्यकता नहीं है या यह मुद्दा सिर्फ राज्यों के भरोसे ही छोड़ दिया जाए? और यदि इस पर कार्रवाई होनी चाहिए तो क्‍यों नहीं केंद्रीय स्‍तर पर कानून बनाया जाता है! जबकि यह सर्वविदित है कि भारत में धर्मांतरण (कन्‍वर्जन) का प्रश्न नया नहीं है, जिसमें कि हाल के वर्षों में इसके स्वरूप और प्रभाव को लेकर चिंताएं तेज हुई हैं। विशेष रूप से जनजाति और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों में प्रलोभन, दबाव या कथित छल (इस्‍लाम) के माध्यम से धर्म परिवर्तन के आरोपों ने इस बहस को और गंभीर बना दिया है।

यही कारण भी है कि इस विषय की गंभीरता को देखते हुए इसी साल मार्च माह में देश के सर्वोच्‍च सदन राज्यसभा में डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी द्वारा इसे एक मांग के रूप में उठाया गया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि “यह विषय सिर्फ धार्मिक आस्था का प्रश्न होने भर तक सीमित नहीं है, आज यह हमारी सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक स्थिरता और संवैधानिक संतुलन का विषय बन चुका है।”

वर्तमान स्थिति यह है कि भारत में धर्मांतरण को लेकर कोई विशिष्ट केंद्रीय कानून मौजूद नहीं है। केंद्र सरकार ने संसद में यह स्पष्ट किया है कि “लव जिहाद” जैसी कोई परिभाषित कानूनी अवधारणा नहीं है। इसके बावजूद, कई राज्यों ने अपने-अपने स्तर पर कानून बनाए हैं, जिनका उद्देश्य जबरन या धोखे से धर्मांतरण को रोकना है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में ऐसे कानून लागू हैं, जिनमें सजा और दंड के प्रावधान हैं। उदाहरण के तौर पर, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में 2021 के अधिनियमों के तहत जबरन धर्मांतरण पर 10 वर्ष तक की सजा का प्रावधान है, जबकि छत्तीसगढ़ ने 2026 में पारित विधेयक में इसे और कठोर बनाते हुए आजीवन कारावास और भारी जुर्माने का प्रावधान जोड़ा है।

यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न एकरूपता का भी है। जब एक ही देश में अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग कानून और प्रक्रियाएँ हों, तो न्यायिक और प्रशासनिक स्तर पर जटिलताएँ उत्पन्न होना स्वाभाविक है। अंतरराज्यीय मामलों में यह समस्या और गहरी हो जाती है, जहाँ अपराध की प्रकृति और उसके कानूनी परिणाम राज्य के अनुसार बदल सकते हैं। यही कारण है कि एक समान केंद्रीय कानून की मांग को अब अधिक समर्थन मिलने लगा है और वर्तमान समय की यह एक जरूरी आवश्‍यकता बनकर सामने आया है।

इस पूरे विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण पहलू भारतीय संविधान भी है, जिसमें कि अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को धर्म मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है, किंतु यह स्वतंत्रता पूर्ण नहीं है, इसके पीछे कुछ उत्‍तरदायित्‍व भी हैं, यह “सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य” के अधीन है। दूसरी ओर, अनुच्छेद 21 व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है, जिसमें अपनी पसंद के साथी से विवाह करने और जीवन जीने का अधिकार भी शामिल है। किंतु यहां भी किसी को धोखा देना, लालच देना, भय दिखाना स्‍वीकार्य नहीं है।

राज्य सरकारों का तर्क है कि जब धर्मांतरण धोखे, दबाव या प्रलोभन के माध्यम से होता है, तब वह व्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन है, साथ ही यह सामाजिक संतुलन को भी प्रभावित करता है, इसलिए ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करना राज्य का दायित्व है।

हम सभी जानते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय विभिन्न राज्यों के धर्मांतरण विरोधी कानूनों की संवैधानिक वैधता की इस समय समीक्षा भी कर रहा है। किंतु दूसरी ओर फिल्मों और मीडिया ने इस विषय को व्यापक जनचर्चा का हिस्सा बना दिया है। ‘द केरल स्टोरी’ और ‘द कश्मीर फाइल्स’ जैसी फिल्मों ने धर्मांतरण, लव जिहाद जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय बहस में प्रमुख स्थान दिलाया है। ऐसे में केंद्रीय कानून के पक्ष में तर्क स्पष्ट हैं कि एकरूपता, स्पष्टता और प्रभावशीलता ऐसे प्रकरणों के विषय में देश भर में होना आज की आवश्‍यकता है।

आज इस पूरे परिदृश्य में एक सबसे महत्वपूर्ण बात यह भी है कि धर्मांतरण, लव जिहाद का जो मुद्दा राजनीतिक भाषण के स्‍तर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा केरल के तिरुवल्ला में आयोजित एनडीए की रैली को संबोधित करते हुए उठाया गया है, वह सिर्फ राजनीतिक स्‍तर पर उठाया जानेवाला मुद्दा बनकर ही न रहे, इस दिशा में ठोस कार्य एवं नीति भी बने। यहां प्रधानमंत्री मोदी ने सीएए का उदाहरण देते हुए कहा भी कि जब नागरिकता संशोधन कानून लाया गया तो विपक्ष ने देश को डराने की कोशिश की, लेकिन आज सीएए लागू हो चुका है और देश को कोई नुकसान नहीं हुआ। यूसीसी यानी समान नागरिक संहिता गोवा में दशकों से लागू है और वहां कोई समस्या नहीं है।

वास्‍तव में ‘धुरंधर: द रिवेंज’ राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य अभियानों पर आधारित फिल्म है, जिसमें मजबूत राष्ट्रीय चेतना है। ‘द कश्मीर फाइल्स’ 1990 के दशक में कश्मीरी पंडितों के पलायन और हिंसा की सच्ची कहानी दिखाती है। वहीं ‘द केरल स्टोरी’ केरल की उन महिलाओं की कहानी है जिन्हें चरमपंथी संगठनों में भर्ती किया गया। इसके दूसरे पार्ट में लव जिहाद में फंसाई जा रही हिन्‍दू बेटियों की कहानी है, जोकि एक हकीकत भी है।

वस्‍तुत: ऐसे में अब यह जरूरी हो जाता है कि देश में यदि वास्तव में धोखे या दबाव से धर्म परिवर्तन हो रहे हैं, तो यह एक गंभीर अपराध घोषित किए जाएं। देश में इसे रोकने के लिए एक समान प्रभावी कानून बने। अत: कुल मिलाकर कहना यही है कि आज आवश्यकता अवैध धर्मांतरण पर अंकुश लगाने के लिए संवैधानिक मर्यादाओं, सामाजिक वास्तविकताओं और न्यायिक संतुलन के आधार पर एक ठोस निर्णय लिए जाने की है, त‍ाकि भारत में अमन-शांति बनी रहे और कोई भी देश की बेटी अपने को छला हुआ, भयक्रांत, डरा-सहमा महसूस न करे।

– डॉ. मयंक चतुर्वेदी

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Tags: #धर्मांतरण #ReligiousConversion #FaithJourney #SpiritualAwakening #CulturalTransformation

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