दक्षिण एशिया की भू-राजनीतिक तस्वीर में भारत और पाकिस्तान अक्सर तुलना के केंद्र में रहते आए हैं, फिर चाहे वह अर्थव्यवस्था हो, लोकतंत्र हो या सामाजिक विकास, लेकिन इन दोनों देशों के बीच सबसे गहरी और निर्णायक खाई जो इस वक्त दिखाई देती है, वह है महिलाओं की आर्थिक भागीदारी। पाकिस्तान में औद्योगिक क्षेत्रों में महिलाओं की हिस्सेदारी महज़ 3.6 प्रतिशत है। इसके विपरीत, भारत तमाम चुनौतियों के बावजूद एक ऐसे रास्ते पर बढ़ रहा है, जहाँ महिलाओं की भागीदारी को विकास का केंद्रीय तत्व माना जा रहा है।
यहां समझ लें कि यह तुलना कोई दो अर्थव्यवस्थाओं के बीच नहीं हो रही है, वास्तव में यह तो उन दो दृष्टिकोणों की है, जिनमें से एक के लिए विकास का अर्थ समावेशिता और लोकतंत्र के सहारे आगे बढ़ता है, तो दूसरी ओर वह सोच है, जिसमें मतान्धता, मजहबी मानसिकता और जिहादी सोच हावी है। वह पाकिस्तान आज अपनी ही आधी आबादी को सीमित कर खुद को पीछे खींचता हुआ विश्व पटल पर दिखाई दे रहा है।
पाकिस्तान : आंकड़ों में कैद एक ठहरी हुई सच्चाई
इस नजरिए से पाकिस्तान की श्रम संरचना पर नजर डालें, तो तस्वीर आज चिंताजनक रूप से उभरकर सामने आती है। कामकाजी उम्र की महिलाओं में से लगभग 25 प्रतिशत ही किसी न किसी रूप में रोजगार से जुड़ी हैं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 80 प्रतिशत के आसपास है। पाकिस्तान की आबादी का लगभग आधा हिस्सा महिलाओं का होने के बाद भी काम करने की उम्र वाली महिलाओं में से सिर्फ हर चार में से एक ही काम करती है, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा पांच में से लगभग चार का है।

इससे भी अधिक गंभीर तथ्य यह है कि जो महिलाएँ काम करती हैं, उनमें से अधिकांश कृषि क्षेत्र में सीमित हैं, यानी कि कम आय, कम सुरक्षा और सीमित अवसर ही यहां पर महिलाओं को मिले हुए हैं।
औद्योगिक क्षेत्र, जो किसी भी आधुनिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है, वहाँ महिलाओं की हिस्सेदारी महज़ 3.6 प्रतिशत है। यह स्थिति दर्शाती है कि पाकिस्तान ने अपने औद्योगिक विकास को आधा अधूरा ही विकसित किया है। औपचारिक नौकरियों में महिलाओं की भागीदारी 15 प्रतिशत से भी कम है, जोकि यह साबित करती है कि महिलाएँ न केवल कम काम कर रही हैं, बल्कि बेहतर और सुरक्षित रोजगार से भी वंचित हैं। यह जानकारी कराची स्थित द न्यूज इंटरनेशनल अखबार में प्रकाशित एक लेख में दी गई है।
पाकिस्तान में जड़ें गहरी हैं सामाजिक और वैचारिक बाधाओं की
दरअसल, पाकिस्तान में महिलाओं की कम भागीदारी के पीछे कई स्तरों पर समस्याएँ मौजूद हैं। शिक्षा और तकनीकी कौशल की कमी, वित्तीय संसाधनों तक सीमित पहुँच और कार्यस्थल पर सुरक्षा का अभाव तो प्रमुख कारण हैं ही, लेकिन इससे भी गहरी समस्या सामाजिक मानसिकता की है। इस्लामिक शरिया नियम महिलाओं को घर की चारदीवारी तक सीमित करने का दबाव बनाते हैं। कई क्षेत्रों में महिलाओं का अकेले बाहर निकलना या काम करना सामाजिक रूप से हतोत्साहित किया जाता है, उन पर हिंसा तक की जाती है।

इसके साथ ही पाकिस्तान में घरेलू जिम्मेदारियों का असंतुलित बोझ, चाइल्डकेयर की कमी और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियाँ भी महिलाओं के कार्यबल में बने रहने की राह में बाधा बनती हैं। परिणामस्वरूप, बड़ी संख्या में महिलाएँ या तो काम ही नहीं कर पातीं या फिर अनौपचारिक और कम वेतन वाले कार्यों तक सीमित रह जाती हैं।
भारत : स्पष्ट दिशा से आगे बढ़ते कदम
इसके विपरीत, भारत में महिलाओं की आर्थिक भागीदारी सकारात्मक बदलाव के दौर से गुजर रही है। Periodic Labour Force Survey के अनुसार, 2026 में महिलाओं की श्रम शक्ति भागीदारी दर लगभग 35 प्रतिशत तक पहुँच चुकी है। भारत सरकार के Economic Survey 2025-26 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि महिलाओं की भागीदारी को 55 प्रतिशत तक बढ़ाना देश की उच्च आर्थिक वृद्धि के लिए आवश्यक है और इस दिशा में इन दिनों तेजी से हर सेक्टर में कार्य होता हुआ नजर आता है। यह सोच इस बात को दर्शाती है कि भारत में महिलाओं को “विकास की चालक शक्ति” के रूप में देखा जा रहा है।

यही कारण है जोकि भारत के औद्योगिक परिदृश्य में महिलाओं की भूमिका लगातार विस्तार पा रही है। टेक्सटाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और मोबाइल निर्माण जैसे क्षेत्रों में महिलाओं की संख्या बढ़ रही है। MSME सेक्टर में महिला उद्यमियों का उभरना इस परिवर्तन का महत्वपूर्ण संकेत है। IT और BPO जैसे क्षेत्रों ने महिलाओं को ऐसे अवसर दिए हैं, आर्थिक स्वतंत्रता प्रदान करने के साथ ही सामाजिक सशक्तिकरण का मार्ग भी खोलते हैं।
लोकतंत्र बनाम सामाजिक संकीर्णता
आज इन दो देशों के बीच देखने में यही आ रहा है कि भारत का लोकतंत्र महिलाओं को अधिकार, अवसर और आवाज देता है। इसके विपरीत, पाकिस्तान में सामाजिक रूढ़िवादिता और राजनीतिक अस्थिरता ने महिलाओं की प्रगति को सीमित कर दिया है। ऐसे में पाकिस्तान उस अधूरे गणित का उदाहरण है, जहाँ महिलाओं की अनुपस्थिति ने विकास को सीमित कर दिया है।
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दूसरी ओर भारत अपनी तमाम चुनौतियों के बावजूद निरंतर आगे बढ़ रहा है। यही कारण है जो भारत में महिलाओं की विकास यात्रा आज सशक्त परिवर्तन और उभरती संभावनाओं की कहानी बन चुकी है। आज IT, BPO, टेक्सटाइल और MSME जैसे क्षेत्रों में महिलाओं की सक्रिय उपस्थिति यह संकेत देती है कि वे औद्योगिक और सेवा अर्थव्यवस्था की महत्वपूर्ण हिस्सेदार बन रही हैं।
शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति देखने को मिली है; महिला साक्षरता दर में निरंतर वृद्धि हुई है और उच्च शिक्षा में लड़कियों का नामांकन कई स्थानों पर पुरुषों के बराबर या उससे अधिक हो चुका है। STEM क्षेत्रों में उनकी बढ़ती भागीदारी भविष्य की नवाचार-आधारित अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे रही है। स्वास्थ्य के मोर्चे पर भी सुधार स्पष्ट है- मातृ मृत्यु दर में कमी और संस्थागत प्रसव में वृद्धि ने महिलाओं के जीवन स्तर को बेहतर बनाया है।
वहीं, वित्तीय समावेशन की पहल जैसे जन धन योजना ने बड़ी संख्या में महिलाओं को बैंकिंग प्रणाली से जोड़कर उनकी आर्थिक स्वायत्तता को मजबूत किया है।
कहना होगा कि यहाँ नीतियाँ, सामाजिक बदलाव और आर्थिक अवसर मिलकर महिलाओं को मुख्यधारा में लाने का प्रयास कर रहे हैं। समग्र रूप से, भारत में महिलाएँ आज विकास की धुरी बनकर उभर रही हैं और देश की प्रगति को नई गति दे रही हैं। वहीं पाकिस्तान है जहां दिनोंदिन अप्रत्यक्ष रूप से इस्लामिक शरिया कानून प्रभावी होता जा रहा है और यहां की आधी जनसंख्या लगातार पीछे धकेली जा रही है।
– डॉ. मयंक चतुर्वेदी

