| बंगालियों का प्रकृति प्रदत्त मूंगफली जैसा स्वभाव जो हर परिस्थिति में “कुरकुरे” बने रहे, परिस्थिति चाहे स्थिति कितनी भी कठिन क्यों न रही हों उन्होंने उसे पहले अपनाया पर प्याज की भांति परत-दर-परत खुलती घटनाएँ जो कभी चुनावी हिंसा, कभी प्रशासनिक सवाल के रुप में उठी। |
बंगाल की पहचान कभी रसोगुल्ला की मिठास से होती थी – नरमी, संतुलन और अपनत्व का स्वाद पर अब वही बंगाल झालमुड़ी के तीखेपन में अपनी बात कह रहा है। यह खान-पान का बदलाव नहीं जनभावना का नया समीकरण है—बिना किसी परत के सीधा, चुभता हुआ……
ममता बनर्जी के लंबे शासनकाल में “माँ, माटी, मानुष” का नारा खूब गूंजा, लेकिन समय के साथ यह प्रश्न भी उठता गया कि “मानुष” कौन है और कौन नहीं?
आलोचनाओं की सूची छोटी नहीं रही । चुनावों के समय हिंसा और विरोधियों पर हमले, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2021
के बाद की अप्रिय घटनाएं जहाँ दीदी के राज में बहनों की अस्मिता तार तार हुई।

त्योहारों के समय प्रतिबंधों और अनुमति को लेकर विवाद, नोआखाली की हिंसात्मक घटनाएं,शोभायात्राओं पर पथराव और प्रशासनिक निष्पक्षता पर बार-बार उठते प्रश्न।
लगा जहाँ सरकार “सर्वसमावेशी” होने का दावा करती है, वहीं एक बड़ा वर्ग स्वयंक्षित या उपेक्षित अनुभूत करने लगता है। यही धारणा राजनीति में बारूद का काम करती है।
इसी बीच, एक प्रतीक ने चुपचाप अपनी जगह बना ली……. झालमुड़ी।
आम जनता ने मुरमुरे की भांति हल्के, सीधे-सादे ढंग से हर स्वाद को अपने अंदर समेट लिया
बंगालियों का प्रकृति प्रदत्त मूंगफली जैसा स्वभाव जो हर परिस्थिति में “कुरकुरे” बने रहे, परिस्थिति चाहे स्थिति कितनी भी कठिन क्यों न रही हों उन्होंने उसे पहले अपनाया पर प्याज की भांति परत-दर-परत खुलती घटनाएँ जो कभी चुनावी हिंसा, कभी प्रशासनिक सवाल के रुप में उठी। तब हरी मिर्च के तीखेपन के साथ वह वर्षों से जमा असंतोष का प्रतिकार करने को तैयार हो गई ।
नमक जैसी रोज़मर्रा की छोटी-छोटी समस्याएँ जो कम हो तो स्वाद फीका, अधिक हो तो असहनीय।
समय आने पर बंगाल ने अपनी सांस्कृतिक परंपरा, की मूल पहचान को सरसों के तेल की तरह सबसे अलग खुशबू के साथ अपने दुखद अनुभवों को समेटकर है , नींबू के खट्टापन के साथ चुनावी परिणाम में राजनीतिक स्वाद बदल दिया। मीडिया, बयानबाज़ी और आरोप- प्रत्यारोप के चाट मसाले ने हर घटना को और चटपटा बना दिया।
और इस पर जब नरेंद्र मोदी ने झाल मुड़ी को आम लोगों के बीच बैठकर खाया, तो यह नाश्ता “जुड़ाव” का प्रतीक बन गया। वह दृश्य मानो यह कह रहा था कि “जो स्थानीय है, वही राष्ट्रीय भी हो सकता है” और यहीं से तुलना और तेज हो गई।
एक ओर वह राजनीति जो प्रतीकों के माध्यम से संवाद बना रही थी, वहीं दूसरी ओर वह शासन जिस पर आरोप था कि उसने संवाद के स्थान पर अराजकता को प्राथमिकता दी।
फिर आया वह क्षण, जब जनता ने न घोषणापत्र में, न टीवी बहस में , उसने बस अपने ढंग से उत्तर दिया…… जहाँ पहले जीत पर रसोगुल्ला खिलाया जाता था, वहाँ अब झालमुड़ी बांटी गई।

जैसे हर कौर में एक संदेश था—
“मीठे वादों का समय गया, अब तीखे अनुभव बोलेंगे। ”पश्चिम बंगाल का चुनावी परिणाम व्यक्तियों पर नहीं, उस प्रवृत्ति पर प्रहार है जहाँ सत्ता अपने ही मूल से कटने लगती है। जब शासन संतुलन खो देता है, तो जनता संतुलन बनाने के लिए “स्वाद” बदल देती है।
बंगाल की जनता ने इस बार लोकतंत्र को सम्मान देते हुए मिठास की बनावटी भाषा में नहीं, अपनी थाली में परिवर्तन की तीखी भाषा में झाल मुड़ी को परोसकर निर्णय सुनाया “यदि शासन रसोगुल्ले जैसा सर्वस्वीकार्य नहीं रहेगा, तो जनता झालमुड़ी की तरह तीखी, स्पष्ट और देर तक याद रहने वाली प्रतिक्रिया देगी।”
पांचो विधानसभा के परिणाम के पश्चात संपूर्ण भारत में मिष्ठान वितरण के स्थान पर झलमुरी का वितरण किया गया। जो यह दर्शाता है कि पश्चिम बंगाल के जनमानस की मनोदशा है वही आज संपूर्ण भारत के आम जनमानस की हो गई है।
डॉ नुपूर निखिल देशकर

