हिंदी विवेक
  • Login
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वांक
  • ग्रंथ
  • पुस्तक
  • संघ
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण
No Result
View All Result
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वांक
  • ग्रंथ
  • पुस्तक
  • संघ
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण
No Result
View All Result
हिंदी विवेक
No Result
View All Result
भारत की आत्मा और पश्चिमी दृष्टि

भारत की आत्मा और पश्चिमी दृष्टि

by हिंदी विवेक
in सामाजिक
0

भारत को समझने की सबसे बड़ी समस्या यह है कि भारत को आज भी भारतीय दृष्टि से नहीं बल्कि पश्चिमी, आब्राहमिक और औपनिवेशिक चश्मे से देखने का प्रयास किया जाता है। यही वह मूल कारण है, जिसने हिंदू समाज को अपनी सभ्यतागत स्मृति, अपनी दार्शनिक दृष्टि, अपने धर्मबोध और अपने सामाजिक स्वरूप से धीरे-धीरे दूर कर दिया। आज हिंदू समाज और हिंदू नेतृत्व की सबसे बड़ी समस्या केवल राजनीतिक नहीं है; सबसे बड़ी समस्या यह है कि भारत स्वयं को अपनी आँखों से देखने के स्थान पर यूरोप और पश्चिम की आँखों से देखने लगा है।

जब कोई सभ्यता स्वयं को अपने अनुभवों, अपने शास्त्रों, अपनी परंपराओं और अपने जीवन-दर्शन से देखने के स्थान पर किसी दूसरी सभ्यता के चश्मे से देखना शुरू कर देती है, तब उसके भीतर आत्म-संदेह पैदा होता है, वही भारत में हुआ। भारत को यह समझाया गया कि उसका समाज केवल शोषण पर आधारित था, उसकी जातीय संरचना केवल अत्याचार का साधन थी, उसकी आध्यात्मिकता अंधविश्वास थी और उसकी विविधता अव्यवस्था थी। धीरे-धीरे हिंदू समाज ने स्वयं को उसी दृष्टि से देखना शुरू कर दिया, जिस दृष्टि से औपनिवेशिक शक्तियाँ उसे देखना चाहती थीं।

जब अंग्रेज भारत आए, तब वे केवल व्यापारी या शासक बनकर नहीं आए थे। वे अपने साथ यूरोप का पूरा ऐतिहासिक और वैचारिक अनुभव लेकर आए थे। वह यूरोप जिसने सदियों तक रिलिजियस युद्ध देखे थे। वह यूरोप जहाँ चर्च सर्वोच्च सत्ता था। जहाँ समाज को “बिलीवर” और “नॉन-बिलीवर” में बाँटा गया। जहाँ “एक सत्य, एक पुस्तक, एक पैगंबर” की अवधारणा समाज और राजनीति दोनों को नियंत्रित करती थी। वहाँ जो चर्च की मान्यता को स्वीकार करे वही सही और जो असहमति प्रकट करे वह शत्रु।

यूरोप का पूरा चिंतन मूलतः बाइनरी अर्थात् द्वैतवादी सोच पर आधारित रहा। संसार को दो हिस्सों में बाँटकर देखने की आदत वहाँ की मानसिक संरचना का भाग बन गई— मोमिन और काफ़िर, बिलीवर और नॉन-बिलीवर, स्वर्ग और नर्क, सत्य और असत्य। यही सोच बाद में उनकी राजनीति, अर्थव्यवस्था, समाजशास्त्र और आधुनिक विचारधाराओं में भी दिखाई दी।

स्वर्ग और नरक में आत्माओं के बिच क्या अंतर किया जाता है ? | Difference  Between Hell And Heaven

यूरोप का इतिहास इसी मानसिकता का प्रमाण है। 1095 से प्रारंभ हुए क्रूसेड्स लगभग दो शताब्दियों तक चले। लाखों लोग मारे गए। 1618 से 1648 तक चला “थर्टी इयर्स वॉर” यूरोप के इतिहास का सबसे विनाशकारी रिलिजियस युद्ध माना जाता है। इतिहासकार पीटर विल्सन के अनुसार इस युद्ध में लगभग 40 से 80 लाख लोग मारे गए। यूरोप में चर्च और सत्ता का गठजोड़ इतना कठोर था कि 1633 में गैलीलियो को अपने वैज्ञानिक विचारों के लिए चर्च के सामने झुकना पड़ा। उसने केवल इतना कहा था कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है, परंतु चर्च की स्थापित मान्यता के विरुद्ध जाने के कारण उसे अपराधी घोषित कर दिया गया।

तीस वर्षीय युद्ध | इतिहास

1450 से 1750 के बीच यूरोप में “विच हंट्स” हुए। इतिहासकार ब्रायन लेवैक के अनुसार लगभग 40,000 से अधिक लोगों को डायन घोषित कर मार दिया गया, जिनमें अधिकांश महिलाएँ थीं। केवल संदेह के आधार पर स्त्रियों को जिंदा जला दिया जाता था। यह वही यूरोप था जहाँ समाज को नियंत्रित करने के लिए भय, अपराधबोध और केंद्रीकृत सत्ता का उपयोग किया गया।

यही मानसिकता लेकर अंग्रेज भारत आए। उन्होंने भारत को भारत की दृष्टि से समझने का प्रयास नहीं किया। उन्होंने भारत में वही ढूँढ़ना शुरू किया, जो यूरोप में था। यूरोप में चर्च जनता पर नियंत्रण रखता था, इसलिए उन्होंने भारत में “ब्राह्मणवादी नियंत्रण” खोजा। यूरोप में सामंत और किसान का संघर्ष था, इसलिए उन्होंने भारत में “शोषक” और “शोषित” की स्थायी लड़ाई खोजी। यूरोप में महिलाएँ “विच” घोषित कर जिंदा जलाई जाती थीं, इसलिए उन्होंने भारत को “स्त्री-विरोधी सभ्यता” सिद्ध करने का प्रयास किया।

यूरोप में समाज “बिलीवर” और “नॉन-बिलीवर” में विभाजित था, इसलिए उन्होंने भारत को “उच्च” और “निम्न”, “आर्य” और “द्रविड़”, “ब्राह्मण” और “शूद्र” के संघर्षों में बाँटकर देखने का प्रयास किया। अर्थात् यूरोप की समस्याएँ भारत पर आरोपित कर दी गईं। यही औपनिवेशिक इतिहास लेखन की सबसे बड़ी चाल थी।

1817 में जेम्स मिल ने History of British India लिखी। वह कभी भारत आया तक नहीं था, उसे किसी भारतीय भाषा का ज्ञान नहीं था, फिर भी उसने भारतीय सभ्यता को असभ्य, अंधविश्वासी और दमनकारी घोषित कर दिया। बाद में उसी पुस्तक को अंग्रेज अधिकारियों के प्रशिक्षण का आधार बनाया गया। 1835 में मैकॉले ने अपनी शिक्षा-नीति में स्पष्ट लिखा कि अंग्रेजों को ऐसे भारतीय चाहिए जो “रक्त और रंग से भारतीय हों, किन्तु विचारों से अंग्रेज।” यह केवल शिक्षा-नीति नहीं थी; यह भारतीय मानस को बदलने की योजना थी। भारत को अपनी दृष्टि से हटाकर यूरोप की दृष्टि से देखने के लिए बाध्य करना ही औपनिवेशिक विजय का सबसे बड़ा लक्ष्य था।

Indian Culture and Traditions: “Circles of Trust” for Next-Gen Aspirations  - Indica Today

भारत की वास्तविकता इससे पूर्णतः भिन्न थी। भारत समाज को नियंत्रित करने योग्य भीड़ नहीं मानता था। भारत समाज को परिवार की तरह देखता था। यहाँ व्यक्ति अकेला नहीं था। वह परिवार से जुड़ा था, परिवार कुल से जुड़ा था, कुल गोत्र से जुड़ा था, गोत्र परंपरा से जुड़ा था और परंपरा धर्म से जुड़ी थी। भारत में समाज राज्य से बड़ा था। राजा समाज का मालिक नहीं, धर्म का रक्षक माना जाता था। महाभारत के शांतिपर्व में राजधर्म का उद्देश्य समाज को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा करना बताया गया। यही कारण था कि भारत में सत्ता बदलती रही, आक्रमण होते रहे, परंतु समाज जीवित रहा क्योंकि भारत की शक्ति राज्य में नहीं, समाज में थी।

अंग्रेजों के लिए यह व्यवस्था समझना कठिन था। यूरोप की केंद्रीकृत राजनीतिक सोच समाज को भेड़ों की तरह एक बाड़े में बंद कर नियंत्रित करना चाहती थी। “सभ्य बनाने” के नाम पर भारत को एकरूप बनाने का अभियान चलाया गया। सबको एक जैसी शिक्षा, एक जैसे कानून, एक जैसी राजनीतिक पहचान और राज्य-नियंत्रित सामाजिक संरचना में बाँधने का प्रयास हुआ।

 

आधुनिक राज्य को समाज नियंत्रित करने का सबसे बड़ा उपकरण बनाया गया।
आज भी वही मानसिकता आधुनिक वैश्विक संरचनाओं में दिखाई देती है। आधुनिक ग्लोबल मार्केट फोर्सेज और वैश्विक कंपनियों का मूल उद्देश्य यह है कि दुनिया का धन, संसाधन, व्यापार, सूचना और उपभोग कुछ सीमित शक्तियों के हाथ में केंद्रित हो जाए। जैसे हम अपने घर में एक बटन दबाते हैं और पूरे घर की बिजली नियंत्रित हो जाती है, वैसे ही आधुनिक वैश्विक आर्थिक शक्तियाँ ऐसी व्यवस्था चाहती हैं जहाँ एक बटन दबाने पर दुनिया की पूँजी, संसाधन, सूचना और उपभोग उनके नियंत्रण में आ जाए।

इसीलिए आधुनिक वैश्विक व्यवस्था परिवार, परंपरा, स्थानीय संस्कृति और आत्मनिर्भर समाज को कमजोर करती है। परिवार टूटेगा तो व्यक्ति अकेला होगा। अकेला व्यक्ति अधिक उपभोक्ता बनेगा। वह बाजार पर अधिक निर्भर होगा। उसकी पहचान उपभोग से बनेगी। नशा बढ़ेगा, मानसिक अस्थिरता बढ़ेगी, सामाजिक विखंडन बढ़ेगा और बाजार का विस्तार होगा। आधुनिक उपभोक्तावादी व्यवस्था को संयमित और संतुलित समाज नहीं चाहिए; उसे निरंतर इच्छाओं से संचालित उपभोक्ता चाहिए।

Tyaga – The Vitalizing Force of the Indic Civilization

यहीं भारत और पश्चिम का सबसे बड़ा अंतर दिखाई देता है। पश्चिम का आधुनिक चिंतन मूलतः अर्थ और काम तक सीमित होकर रह गया। चाहे वह आधुनिक पूंजीवाद हो, समाजवाद हो, राइट हो, लेफ्ट हो, सेंटर हो, सेकुलरिज्म हो या आधुनिक नेशनलिज्म इन सबकी उत्पत्ति यूरोप की ऐतिहासिक परिस्थितियों से हुई। इनकी दिशाएँ अलग हो सकती हैं, परंतु उनका मूल ढाँचा भौतिक, सत्ता-केंद्रित और संघर्ष-केंद्रित है।

समाजवाद वर्ग-संघर्ष तक सीमित रहा। पूंजीवाद बाजार और उपभोग तक सीमित रहा। सेकुलरिज्म चर्च और राज्य के संघर्ष की उपज था। आधुनिक नेशनलिज्म केंद्रीकृत राज्य की अवधारणा पर आधारित था। इन सबमें मनुष्य को मुख्यतः आर्थिक, राजनीतिक या वैचारिक इकाई के रूप में देखा गया। आत्मा, मोक्ष, पुनर्जन्म, कर्म और ब्रह्म जैसी अवधारणाएँ इन ढाँचों में अनुपस्थित रहीं।

भारत की दृष्टि इससे भिन्न है। भारत जीवन को केवल भौतिक स्तर पर नहीं देखता। भारत जीवन को आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक तीनों स्तरों पर देखता है। भारत कहता है कि संसार केवल वह नहीं है जो आँखों से दिखाई देता है। जीवन केवल शरीर नहीं है। मनुष्य केवल उपभोग करने वाली इकाई नहीं है। वह आत्मा है, वह ब्रह्म का अंश है।

इसीलिए भारत का पूरा जीवन-दर्शन धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार पुरुषार्थों के संतुलन पर आधारित है। धर्म के बिना अर्थ विनाशकारी बन जाता है। धर्म के बिना काम विकृति बन जाता है और मोक्ष के बिना जीवन केवल भौतिक उपभोग तक सीमित होकर रह जाता है। भारत ने अर्थ और काम को कभी नकारा नहीं, लेकिन उन्हें धर्म के अधीन रखा और अंतिम लक्ष्य मोक्ष को माना। यही भारतीय सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता है।

Social Welfare in Ancient India: A Jurisprudential Perspective - Indica  Today

भारत सृष्टि को चक्रीय मानता है। दिन और रात चक्रीय हैं। ऋतुएँ चक्रीय हैं। जन्म और मृत्यु चक्रीय हैं। बीज वृक्ष बनता है, वृक्ष पुनः बीज देता है। गीता कहती है न जायते म्रियते वा कदाचित्।” आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है। “वासांसि जीर्णानि यथा विहाय” आत्मा केवल शरीर बदलती है। यही पुनर्जन्म और कर्म सिद्धान्त का आधार है।

भारतीय दर्शन सृष्टि को त्रिगुणात्मक कहता है सत्त्व, रज और तम। प्रकृति को देखिए। इन्द्रधनुष में सात रंग हैं। यदि कोई कहे कि केवल एक ही रंग होना चाहिए, तो इन्द्रधनुष समाप्त हो जाएगा। जंगल में हर वृक्ष अलग है- नीम, पीपल, बरगद, तुलसी फिर भी जंगल जीवित रहता है। परिवार में हर व्यक्ति अलग है माता, पिता, गुरु, बालक फिर भी परिवार एक रहता है। भारत इसी विविधता को जीवन का स्वभाव मानता है। भारत समरसता की बात करता है, एकरूपता की नहीं।

भारत में संघर्ष “धर्म और अधर्म” का है; “बिलीवर और नॉन-बिलीवर” का नहीं। रामायण में रावण ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर भी अधर्म का प्रतीक है और शबरी पूजनीय है। महाभारत में कौरव और पांडव एक ही कुल के हैं, परंतु संघर्ष धर्म और अधर्म का है। भारत व्यक्ति को जन्म से नहीं, उसके गुण, कर्म और आचरण से देखता है।

“एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति” का अर्थ यह नहीं कि सभी विचार समान हैं। इसका अर्थ यह है कि वैदिक सत्य को अनेक प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” का अर्थ यह नहीं कि जो सभ्यताएँ “मानो या मरो” की मानसिकता पर चलती हैं, जो दुनिया को “बिलीवर और नॉन-बिलीवर” में बाँटती हैं, जो विविधता को मिटाकर एकरूपता थोपना चाहती हैं, उन्हें भी उसी अर्थ में परिवार मान लिया जाए। परिवार वही हो सकता है, जो सहअस्तित्व, सहिष्णुता और विविधता का सम्मान करे।

आज हिंदू समाज के सामने सबसे बड़ी आवश्यकता यही है कि वह इस औपनिवेशिक और आब्राहमिक चश्मे को उतारे और स्वयं को अपनी दृष्टि से देखना प्रारंभ करे। भारत को समझने के लिए वेदों की दृष्टि चाहिए, उपनिषदों की दृष्टि चाहिए, गीता का कर्मयोग चाहिए, रामायण की मर्यादा चाहिए, महाभारत की व्यापकता चाहिए और योगवसिष्ठ का आत्मबोध चाहिए क्योंकि जो समाज स्वयं को दूसरों की आँखों से देखता है, वह धीरे-धीरे अपनी आत्मा खो देता है। और जिस समाज की आत्मा नष्ट हो जाती है, उसका पतन केवल समय की प्रतीक्षा रह जाता है।

– दीपक कुमार द्विवेदी

 

Share this:

  • Share on X (Opens in new window) X
  • Share on Facebook (Opens in new window) Facebook
  • Share on LinkedIn (Opens in new window) LinkedIn
  • Share on Telegram (Opens in new window) Telegram
  • Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp
Tags: Bharat vs Westcolonial mindsetdecolonizing Indiadharma civilizationhindu philosophyIndian knowledge systemIndic civilizationSanatan culturespiritual India

हिंदी विवेक

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

हिंदी विवेक पंजीयन : यहां आप हिंदी विवेक पत्रिका का पंजीयन शुल्क ऑनलाइन अदा कर सकते हैं..

Facebook Youtube Instagram

समाचार

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

लोकसभा चुनाव

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

लाइफ स्टाइल

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

ज्योतिष

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

Copyright 2024, hindivivek.com

Facebook X-twitter Instagram Youtube Whatsapp
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वाक
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण
  • Privacy Policy
  • Terms and Conditions
  • Disclaimer
  • Shipping Policy
  • Refund and Cancellation Policy

copyright @ hindivivek.org by Hindustan Prakashan Sanstha

Welcome Back!

Login to your account below

Forgotten Password?

Retrieve your password

Please enter your username or email address to reset your password.

Log In

Add New Playlist

No Result
View All Result
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वांक
  • ग्रंथ
  • पुस्तक
  • संघ
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण

© 2024, Vivek Samuh - All Rights Reserved

0