भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर वैश्विक संस्थाओं का दृष्टिकोण तेजी से बदल रहा है। कुछ महीने पहले जिन अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने ऊँची ऊर्जा कीमतों, वैश्विक अनिश्चितता और भू राजनीतिक तनाव के कारण भारत की विकास दर का अनुमान घटा दिया था, वही एजेंसियां अब वित्त वर्ष 2027 के लिए अपने अनुमान बढ़ा रही हैं। प्रमुख रेटिंग एजेंसी मूडीज़ ने भारत की सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर का अनुमान 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 7 प्रतिशत कर दिया है। अन्य वैश्विक संस्थानों ने भी निवेश, घरेलू खपत और विनिर्माण क्षेत्र की मजबूती के आधार पर अपने आर्थिक आकलनों में सुधार किया है।

यह बदलाव केवल आंकड़ों का संशोधन नहीं है, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था की उस संरचनात्मक क्षमता का संकेत है जिसने अनेक वैश्विक चुनौतियों के बावजूद विकास की गति बनाए रखी है। जब दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाएं धीमी वृद्धि, महंगाई और व्यापारिक अनिश्चितता से जूझ रही हैं, तब भारत का लगातार तेज गति से आगे बढ़ना उसे वैश्विक अर्थव्यवस्था का प्रमुख विकास इंजन बना रहा है।
सकल घरेलू उत्पाद किसी देश की आर्थिक गतिविधियों का सबसे व्यापक मापदंड माना जाता है। इसमें कृषि, उद्योग, सेवा, निर्माण, परिवहन, व्यापार और विभिन्न आर्थिक क्षेत्रों में एक वर्ष के दौरान उत्पन्न कुल मूल्य को शामिल किया जाता है। विकास दर बढ़ने का अर्थ यह नहीं कि हर नागरिक तुरंत समृद्ध हो जाएगा, बल्कि इसका संकेत यह है कि उत्पादन, निवेश, रोजगार और आय सृजन की क्षमता मजबूत हो रही है। यही कारण है कि वैश्विक निवेशक और रेटिंग एजेंसियां विकास दर को किसी भी अर्थव्यवस्था की सेहत का महत्वपूर्ण संकेतक मानती हैं।
भारत के पक्ष में सबसे बड़ा कारण उसकी मजबूत घरेलू मांग है। लगभग 140 करोड़ की आबादी वाला देश एक विशाल उपभोक्ता बाजार प्रदान करता है। जब वैश्विक निर्यात में उतार चढ़ाव आता है, तब भी घरेलू खपत भारतीय अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाए रखती है। हाल के महीनों में शहरी उपभोग, खुदरा बिक्री, आवास क्षेत्र और सेवा गतिविधियों में सुधार देखने को मिला है। कम आधारभूत महंगाई और परिवारों की बढ़ती आय ने उपभोग को सहारा दिया है। यही कारण है कि कई अर्थशास्त्री भारत को बाहरी झटकों के मुकाबले अपेक्षाकृत अधिक लचीली अर्थव्यवस्था मान रहे हैं।
विनिर्माण क्षेत्र भी इस सकारात्मक बदलाव का प्रमुख आधार बनकर उभरा है। पिछले कुछ वर्षों में उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाओं, रक्षा उत्पादन, इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण, सेमीकंडक्टर परियोजनाओं और औद्योगिक गलियारों पर विशेष बल दिया गया है। इसका परिणाम यह हुआ कि अनेक वैश्विक कंपनियों ने भारत को केवल बाजार नहीं, बल्कि उत्पादन केंद्र के रूप में देखना शुरू किया है। मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, ऑटोमोबाइल पुर्जे और रक्षा सामग्री के निर्माण में उल्लेखनीय विस्तार दर्ज किया गया है। इससे रोजगार और निर्यात दोनों को नई गति मिलने की संभावना बढ़ी है।
पहली तिमाही में भारत की आर्थिक वृद्धि लगभग 7.8 प्रतिशत रही, जिसने अधिकांश विश्लेषकों के अनुमान को पीछे छोड़ दिया। निवेश मांग, निर्माण गतिविधियों और सेवा क्षेत्र की मजबूती ने इस प्रदर्शन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। यही आंकड़ा वैश्विक एजेंसियों के लिए सबसे बड़ा संकेत बना कि भारत की आर्थिक गति अनुमान से कहीं अधिक मजबूत है। परिणामस्वरूप मूडीज़ सहित कई संस्थानों ने वित्त वर्ष 2027 के लिए अपने अनुमान संशोधित किए।
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सार्वजनिक पूंजीगत व्यय भी इस कहानी का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। केंद्र सरकार ने सड़क, रेल, बंदरगाह, हवाई अड्डों, जलमार्गों और डिजिटल अवसंरचना पर बड़े पैमाने पर निवेश जारी रखा है। वित्त वर्ष 2027 के बजट में भी पूंजीगत व्यय को उच्च प्राथमिकता दी गई है तथा राजकोषीय घाटे को नियंत्रित रखने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसका उद्देश्य केवल तत्काल रोजगार पैदा करना नहीं, बल्कि दीर्घकाल में उत्पादकता और निजी निवेश के लिए आधार तैयार करना है।
सेवा क्षेत्र भारत की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बना हुआ है। सूचना प्रौद्योगिकी, वित्तीय सेवाएं, पर्यटन, स्वास्थ्य, शिक्षा और डिजिटल सेवाओं ने लगातार वृद्धि दर्ज की है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन सेवाओं के विस्तार ने नई आर्थिक गतिविधियों को जन्म दिया है। भारतीय कंपनियां वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था में अपनी उपस्थिति मजबूत कर रही हैं, जिससे विदेशी निवेशकों का विश्वास भी बढ़ा है।

कृषि क्षेत्र को लेकर भी आशावाद और सावधानी दोनों मौजूद हैं। एक ओर कृषि उत्पादकता में सुधार, सिंचाई विस्तार और प्रौद्योगिकी आधारित खेती के प्रयास जारी हैं, वहीं दूसरी ओर कमजोर मानसून और अल नीनो जैसी मौसमी परिस्थितियां खाद्य उत्पादन को प्रभावित कर सकती हैं। यदि खाद्यान्न उत्पादन पर असर पड़ता है तो खाद्य महंगाई बढ़ सकती है, जिसका प्रभाव ग्रामीण आय और उपभोग दोनों पर पड़ेगा। इसलिए विकास दर के साथ कृषि स्थिरता भी समान रूप से महत्वपूर्ण बनी हुई है।
वैश्विक एजेंसियों ने भारत की प्रशंसा करते हुए यह भी स्पष्ट किया है कि जोखिम पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए तेल महंगा होने पर परिवहन, उर्वरक और उत्पादन लागत पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि भारत ने पिछले वर्षों में अपने कच्चे तेल के आयात स्रोतों में विविधता लाई है और उसके पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार भी मौजूद है, जो ऐसे झटकों से आंशिक सुरक्षा प्रदान करता है।
राजकोषीय अनुशासन भी भारत की आर्थिक विश्वसनीयता का महत्वपूर्ण आधार है। अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियां केवल विकास दर नहीं देखतीं, बल्कि यह भी मूल्यांकन करती हैं कि सरकार कितना कर्ज ले रही है, घाटा कितना है और भविष्य में ऋण चुकाने की क्षमता कैसी रहेगी। मूडीज़ ने भारत की स्थिर रेटिंग बनाए रखते हुए यह माना है कि सरकार धीरे धीरे राजकोषीय घाटा कम करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। इससे निवेशकों का भरोसा मजबूत होता है क्योंकि स्थिर सार्वजनिक वित्त दीर्घकालिक आर्थिक विकास के लिए आवश्यक माना जाता है।
निजी निवेश में बढ़ती सक्रियता भी उत्साहजनक संकेत है। बैंकिंग प्रणाली की मजबूत बैलेंस शीट, घटते फंसे ऋण, बेहतर ऋण उपलब्धता और औद्योगिक क्षमता विस्तार ने उद्योग जगत को नए निवेश के लिए प्रोत्साहित किया है। यदि निजी पूंजी निवेश लगातार बढ़ता है तो रोजगार, आय और उत्पादन की एक सकारात्मक श्रृंखला विकसित होती है, जिससे विकास दर टिकाऊ बनती है।
रोजगार का प्रश्न इस पूरी बहस का सबसे संवेदनशील पक्ष है। उच्च विकास दर तभी सार्थक होगी जब उसके लाभ व्यापक समाज तक पहुंचें। विनिर्माण, निर्माण, पर्यटन और सेवा क्षेत्रों में रोजगार सृजन की संभावना अवश्य बढ़ी है, लेकिन कौशल विकास, श्रम उत्पादकता और छोटे उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को मजबूत करना भी उतना ही आवश्यक है। भारत की युवा आबादी एक बड़ा अवसर है, बशर्ते उसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और रोजगार के अवसर मिलें।

भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती का एक कारण उसकी विविध संरचना भी है। अनेक देशों की अर्थव्यवस्था एक या दो क्षेत्रों पर अत्यधिक निर्भर रहती है, जबकि भारत में कृषि, उद्योग और सेवा तीनों का संतुलित योगदान है। यही विविधता संकट के समय अर्थव्यवस्था को स्थिरता प्रदान करती है। यदि किसी एक क्षेत्र में कमजोरी आती है तो दूसरा क्षेत्र विकास को सहारा दे सकता है। यही कारण है कि वैश्विक संस्थाएं भारत को अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अधिक लचीला मानती हैं।
फिर भी चुनौतियां कम नहीं हैं। वैश्विक व्यापार में मंदी, निर्यात मांग की कमजोरी, जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा सुरक्षा और खाद्य महंगाई जैसे विषय आने वाले महीनों में नीति निर्माताओं के सामने बड़ी परीक्षा होंगे। विकास दर को बनाए रखने के लिए केवल सरकारी निवेश पर्याप्त नहीं होगा। उत्पादकता वृद्धि, अनुसंधान, नवाचार, कौशल विकास और न्यायसंगत वित्तीय सुधारों पर भी समान ध्यान देना होगा।
भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि दुनिया उसकी आर्थिक क्षमता को गंभीरता से स्वीकार कर रही है। यह विश्वास अचानक नहीं बना, बल्कि निरंतर निवेश, डिजिटल परिवर्तन, अवसंरचना विकास और व्यापक आर्थिक स्थिरता के प्रयासों का परिणाम है। यदि घरेलू मांग मजबूत रहती है, विनिर्माण विस्तार जारी रहता है और राजकोषीय अनुशासन कायम रहता है, तो भारत आने वाले वर्षों में वैश्विक आर्थिक विकास का प्रमुख केंद्र बन सकता है। लेकिन इस संभावना को वास्तविक समृद्धि में बदलने के लिए आवश्यक होगा कि विकास का लाभ गांव, किसान, श्रमिक, छोटे उद्यमी और मध्यम वर्ग तक समान रूप से पहुंचे। यही समावेशी विकास भारत को केवल सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि सबसे सशक्त और संतुलित अर्थव्यवस्था भी बना सकता है।
– महेन्द्र तिवारी
