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अपने देश के बाहर का पहला गांव देखने का सौभाग्य मुझे मिला था, आज से लगभग तीस वर्ष पूर्व। मैं जापान में ‘स्वीचिंगसिस्टम’ के प्रशिक्षण के लिए गया था। कुछ महीने जापान में रहने का अवसर मिला था। मेरा अधिकतम समय बीता था, टोकियो में। लेकिन लगभग दो सप्ताह जापान के छोटे से गांव में बिताए थे।
मेरे लिए यह एक अनूठा अनुभव था। कुछ अनपेक्षित भी। तब तक भारत के गांवों से भी पूरी तरह से परिचित नहीं था। जितना भी थोड़ा-बहुत गांवों में रहना हुआ था, वह कष्टप्रद था। अस्सी के दशक में हमारे अनेक गांवों में बिजली नहीं पहुची थी। अनेक गांवों में पहुचने के लिए बारह-मासी सड़कें नहीं थीं। गांव का पर्यायवाची शब्द, दिमाग ने ‘कष्ट’ ऐसा लिख दिया था…!
किन्तु जापान के उस गांव का अनुभव एक सुखद आश्चर्य था। वहां पहुंचने के लिए तेज रफ़्तार वाली रेल थी। एकदम साफ-सुथरी और हवाई जहाज का अनुभव देने वाली। अस्सी के दशक में ऐसी रेल से यात्रा करना तो सपने में भी नहीं सोचा था।
लेकिन शायद यह शुरुआत थी, उन सुखद आश्चर्यों की श्रृंखला की।
‘शिराईशिन्जुकू’ नाम का यह गांव अत्यंत छोटा था। टोकियो से साढ़े तीन- चार घंटे की दूरी पर बसे इस गांव में मात्र एक बड़ी फैक्ट्री थी, टेलिकॉम के उपकरण बनाने की, जहां मुझे जाना था। गांव के आसपास थोड़ी खेती थी। लेकिन गांव की अधिकांश युवा पीढ़ी उस फैक्ट्री के असेंबली लाइन में काम करती थी। उस समय के अपने देश के ‘गांव’ इस संकल्पना से यह ‘शिराईशिन्जुकू’ कोसों दूर था…!
इस गांव में एकमात्र होटल थी, जिसमें हमारे रुकने की व्यवस्था थी। अत्यंत साफ़-सुथरा और सभी आवश्यकताओं से परिपूर्ण। उस होटल में भी एक आश्चर्य हमारी प्रतीक्षा कर रहा था। उन दिनों होटलों में टीवी के साथ ही ‘म्यूजिक सिस्टम’ भी लगी होती थी, जिसमें गाने चलते रहते थे। अपने देश में भी होटलों में यही व्यवस्था होती थी। लेकिन, जो गाने चलाए जाते थे, उन्हीं को सुनना पड़ता था। अच्छे न लगे तो बस, आवाज बंद करने का ही विकल्प होता था।
लेकिन इस गांव के होटल में अलग व्यवस्था थी। वहां ‘सैटेलाईट म्यूजिक सिस्टम’ थी। संगीत के लगभग पचास से ज्यादा चैनल्स उपलब्ध थे। सारी दुनिया का संगीत वहां था। और खास बात कि उन चैनल्स में भारत के भी दो चैनल्स थे…! एक पर शास्त्रीय संगीत चलता था, तो दूसरे पर पुराने हिंदी फिल्मों के गाने..!!
पूरा गांव केवल और केवल जापानी ही बोलता/समझता था। गांव के एकमात्र छोटे से डिपार्टमेंटल स्टोर में भी सारे व्यवहार जापानी में ही होते थे। हिंदी सुनने के लिए कान मानो तरस गए थे। ऐसे समय में, रात में, दुनिया के एक कोने में बने छोटे से जापानी गांव में लता मंगेशकर, किशोर कुमार और महंमद रफ़ी को सुनना याने स्वर्गीय सुख का अनुभव था..!
अर्थात, जापान में ‘गांव’ का अर्थ ‘पिछड़ापन’ तब भी नहीं था और अब तो होने का प्रश्न ही नहीं है। अत्यंत विकसित, सर्वसुविधायुक्त तथा रोजगारयुक्त, प्रकृति के साथ बसी हुई छोटी बस्तियां याने‘गांव’ यह संकल्पना है। बस्ती छोटी होने के कारण समाज में आत्मीयता बनी रहती है तथा सारी सुविधाएं होने के कारण युवकों का गांव से शहर में पलायन अत्यंत कम होता है..!
विदेश के गांव में रहने का मेरा दूसरा अनुभव फ्रांस का है। सन १९९१ में, एक बहुत बड़े ‘टेलिकॉम एक्सपो’ में भाग लेने के लिए मैं जिनेवा गया था। जिनेवा के सारे होटल बुक थे। तो मुझे मजबूरन जिनेवा से सटे फ्रांस के एक छोटे से गांव में रुकना पडा। ‘चामोनिक्स’ क्षेत्र का यह गांव, एक सुंदर सपने जैसा था। लगभग पांच हजार बस्ती का गांव। लेकिन सारी सुविधाओं से लैस। वहां के दो होटल भी अंतरराष्ट्रीय स्तर के थे। मेरे साथ जिनेवा के एक्सपो में हिस्सा ले रहे और लोग भी इस गांव में रुके थे। रोज एक बस वहां से जिनेवा जाती थी।
वह गांव एक आदर्श फ्रेंच गांव था। ‘माउंटब्लांक’ के पास में, पहाड़ी वातावरण में बसा हुआ छोटा सा गांव। छोटी लेकिन अच्छी और पक्की सड़कें। गांव में आवश्यक वस्तुओं की छोटी- छोटी दुकानें। रास्ते में लगने वाले फ्रेंच कैफ़े। एक ही शाला। लेकिन अत्याधुनिक भवन में लगने वाली। उनका बड़ा सा खेल का मैदान। और रोज शाम को और रात को उस मैदान में बड़े-बड़े फ्लड-लाइट्स लगा कर बड़े जोश के साथ फुटबॉल खेलने वाले लड़के..!
केवल चार दिन के मुकाम में उस गांव की तासीर समझना संभव नहीं था। लेकिन फिर भी ‘फ्रेंच शैली का, खुशमिजाज, सारी सुविधाओं से युक्त गांव’ ऐसी प्रतिमा तो मन-मस्तिष्क पर बन ही गई।
बाद के वर्षों में जर्मनी में खूब घूमना हुआ। वहां के अनेक गांव देखे। एक गांव के ‘लोकल बॉडी’ (स्थानीय निकाय- पंचायत) की बैठक में उपस्थित रहने का भी अवसर मिला। और एक बात स्पष्ट हुई दुनिया के किसी भी कोने में, गांव अविकसित रहे या विकसित, लेकिन गांव की अपनी आत्मीयता होती है। अपनी पहचान होती है। और गांव के लोगों को इसका गर्व होता है।
जर्मनी में कई बार ट्रेन से प्रवास करना पड़ता था। रास्ते में गांव दिख जाते थे। उनके खेत भी दिखते थे। खेतों में दस पंद्रह मोटर गाड़ियां खड़ी हो, तो समझ लीजिए कि उस खेत में कटाई या बुआई चल रही है। वहां खेत खूब बड़े आकार के होते हैं और आधुनिक औजारों का प्रयोग करना सामान्य बात है। कटाई या बुआई करने वाले मजदूर ही होंगे ऐसा नहीं है। वहां मजदूर मिलना कठिन है। आसपड़ोस के खेतों के मालिक भी इन खेती कामों में एक दूसरे का हाथ बंटाते हैं।
लेकिन अपने देश में जैसे गांव के साथ खेती का समीकरण जोड़ा जाता है, वैसे अन्य विकसित देशों में नहीं हैं। उदाहरण के लिए, जर्मनी का दक्षिण-पश्चिम का क्षेत्र पूर्णतः औद्योगिक है। वहां गांवों के आसपास खेती नहीं हैं। कल-कारखानों से वह सारा परिसर व्याप्त है। यही दृश्य दिखता हैं फ्रांस में, इटली में, बेल्जियम में…. वहां छोटे से गांव में दो तीन तो छोटे-बड़े कारखाने होते ही हैं, जहां गांव के अधिकांश लोग काम करते हैं। खेती का दूर-दूर तक नामोनिशां नहीं होता। हॉलैंड, चेक रिपब्लिक, स्लोवाकिया, हंगरी आदि पूर्व यूरोपियन देशों में जरूर खेती, गांवों के साथ जुडी हुई हैं।
चूंकि अधिकांश गांव परिपूर्ण और स्वयंपूर्ण हैं, इसलिए रोजगार के अनेक अवसर तो गांव में ही मिल जाते हैं। यही कारण हैं की गांवों से शहरों की ओर पलायन, विकसित देशों में बहुत कम हैं। इन गांवों की अपनी दुनिया है। इनका अपना आलम है। इनकी अपनी संस्कृति है। इन गांवों के बीच खेलकूद प्रतियोगिताएं होती हैं। अनेक उत्सव होते हैं। विशेषतः जर्मनी, फ्रांस, चेक रिपब्लिक, इटली आदि देशों में अनेक गांव अपने-अपने उत्सवों के लिए प्रसिध्द हैं। स्पेन में भी अनेक उत्सव, फुटबॉल की स्पर्धाएं आदि गांव के साथ जुड़ी हुई हैं। स्पेन के गांवों में खेला जाने वाला ‘टमाटर उत्सव’ तो दुनिया में मशहूर है।
अपने देश में भी गांवों का अपना आलम है। एक भरी पूरी जिंदगी जीते हैं, हमारे गांव। फरक है तो बस इतना, कि अपने गांवों में मूलभूत संरचनाओं का अभाव है, जबकि विकसित देशों में छोटे-छोटे गांव भी सभी सुविधाओं से लैस रहते हैं..!!

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