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- ले. जनरल (डॉ.) दत्तात्रय शेकटकर (निवृत्त)
जिस प्रकार युद्ध और आतंकवादी हमले से होने वाली तबाही, मानवीय, प्राकृतिक आघात हमें दिखाई देता है, उस प्रकार का आघात हमें आर्थिक आक्रमण से दिखाई नहीं देता है। इसीलिए हमारी सरकार, शासन व्यवस्था तथा जनता भी जाली मुद्रा के चलन तथा आर्थिक आक्रमण को गंभीरता से नहीं देखती है। इस दृष्टिकोण को बदलना जरूरी है।
आज २१वीं सदी के विश्व में किसी भी देश की संरक्षण व्यवस्था, सुरक्षा व्यवस्था तथा प्रणाली को अनेक समस्याएं, अनेक चुनौतियां प्रभावित करती हैं। संरक्षण व्यवस्था और सुरक्षा व्यवस्था को सामान्यत: एक ही तराजू में तौला जाता है। इस मान्यता का पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। संरक्षण व्यवस्था (Defence Mechanisum) तथा सुरक्षा व्यवस्था (Security Mechanisum) में बड़ा अंतर है। यदि कोई राष्ट्र स्वयं को संरक्षित समझता हो परंतु आवश्यक नहीं कि वह राष्ट्र सुरक्षित है। ९/११ के अमेरिका पर हुए आतंकवादी आक्रमण तथा भारतीय संसद पर हुए आतंकवादी आक्रमण, मुंबई का २६/११ का आतंकवादी आक्रमण तथा २३ दिसम्बर २०१४ को एन. डी. एफ. बी के आतंकवादी तथा अलगाववादी तत्वों ने असम के कोकराझार तथा सोनीतपुर जिले में सामान्य लोगों का नरसंहार करके ७२ लोगों की हत्या इस बात का सबूत है कि किसी भी राष्ट्र की बाह्य संरक्षण व्यवस्था मजबूत हो तब भी आंतरिक सुरक्षा मजबूत है यह मानना अनुचित होगा।
आज किसी भी देश के सुरक्षा ढ़ांचे को अनेक अनेक तरीकों से कमजोर किया जा सकता है। इन्हें हम दो प्रकार की सुरक्षा समस्या या चुनौतियों में विभाजित कर सकते हैं। एक बाह्य समस्याएं (External Challanges) तथा दूसरी आंतरिक समस्याएं (Internal Challanges and problems)। आंतरिक सुरक्षा से आशय हिंसात्मक अराजकता तथा विघटनकारी ताकतों से देश के अस्तित्व, उसकी स्थिरता (Stability) और उसके स्थायित्व की रक्षा करने से है। आंतरिक सुरक्षा के संदर्भ में सामाजिक एकता, आर्थिक स्थिरता, सामाजिक जागरूकता तथा सामंजस्य तथा वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकी का विशेष महत्व है। आर्थिक सुरक्षा सर्वांगीण तथा एकीकृत राष्ट्रीय सुरक्षा का महत्वपूर्ण अंग है। आर्थिक असुरक्षा का प्रभाव निश्चित ही विपरीत रूप से एकीकृत राष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ता है। वैश्विक ग्राम (Global Village) की अवधारणा के कारण वर्तमान में विश्व के एक कोने से दूसरे कोने में वित्तीय लेनदेन बेहद तेज एवं सरल हो गया है। ‘ई’ अर्थव्यवस्था (E-economy) ‘ई’ व्यापार (E-commerce, E-Trade) का प्रसार बढ़ रहा है। इंटरनेट, कम्प्यूटर के कारण आज कुछ भी संभव है। आज यदि वित्तीय गतिविधियां बढ़ी हैं, तो वित्तीय अपराधों की संख्या में भी वृद्धि हो रही है। बैंकिग अपराध, काला धन (Black Money), तथा जाली मुद्रा, जाली अर्थव्यवस्था, वित्तीय अपराध, वित्तीय चुनौतियां तथा वित्तीय आक्रमण (Economic Invasion) के ही रूप हैं। काला धन तथा जाली व बनावटी मुद्रा का प्रचलन भारतीय व्यवस्था, आर्थिक स्थिरता तथा आर्थिक सुरक्षा के लिए बहुत बड़ी चुनौती एवं बड़ा खतरा बन गया है।
काले धन की उत्पति, काले धन का प्रसार, काले धन की व्यवस्था, तथा काले धन के दुष्परिणाम भारतीय अर्थव्यवस्था, औद्योगिक व्यवस्था, व्यापार व्यवस्था, राजनैतिक एवं शासकीय व्यवस्था तथा सब से महत्वपूर्ण, भारतीय एकीकृत सुरक्षा पर पड़ रहे हैं। काले धन की व्यवस्था भारत में एक समांतर अर्थव्यवस्था (Parellel Economy) पूर्ण भारत में कर्क रोग (Cancer) की तरह फैल रही है। कैंसर रोग शरीर के अंदर ही बढ़ता है, लेकिन दिखाई नहीं देता है और इसीलिए अंतत: मरीज के प्राण ले लेता है। ठीक उसी प्रकार काले धन का केंसर यदि प्रारंभिक अवस्था में ही काबू में न लाया गया तो भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्राणघातक आक्रमण सिद्ध होगा।
काला धन, काले धन की आर्थिक व्यवस्था अपने आप में एक पूर्ण विषय है। इस पर अनेकों पुस्तकें शोध ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं। इस लेख में जाली मुद्रा के सुरक्षा पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों पर ज्यादा विश्लेषण किया जा रहा है। भारत सरीखे बड़े देश में आर्थिक अपराधों को हम गंभीरता से नहीं लेते हैं। ज्यादा तर आर्थिक अपराध राजकीय तथा शासकीय संरक्षण तथा उदासीनता के कारण ही होते हैं। आतंकवाद, अलगाववाद, उग्रवाद के इस दौर में वित्तीय अपराध अपेक्षाकृत ज्यादा होने लगे हैं; क्योंकि विभिन्न अतंरराष्ट्रीय आतंकी संगठनों द्वारा भी वित्तीय अपराधों को अंजाम दिया जा रहा है।
आर्थिक सुरक्षा सर्वांगीण तथा एकीकृत राष्ट्रीय सुरक्षा का महत्वपूर्ण अंग है। आर्थिक अस्थिरता, असुरक्षा का प्रभाव निश्चित ही विपरीत रूप से एकीकृत राष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ता है। जाली व बनावटी मुद्रा का प्रचलन भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बहुत बड़ा खतरा बन गया है। जाली, नकली मुद्रा विदेशों में विशेषत: पाकिस्तान में छापी जाती है तथा बाहरी देशों से पूर्व नियोजित व्यवस्था तथा प्रणाली के तहत भारत भेजी जाती है। भारत में ही रहनेवाले राष्ट्रद्रोही तत्व अपने संकुचित दृष्टिकोण तथा वैयक्तिक काम की लालच में जाली मुद्रा का प्रसारण, वितरण व काले धन का व्यवसाय करते हैं। जाली मुद्रा के प्रचलन से भारतीय अर्थव्यवस्था पर होने वाला अप्रत्यक्ष आक्रमण हमारे देश में ही रहने वाले देशद्रोही (अस्तीन के सांप) तत्वों की सक्रिय मिलीभगत के बगैर सम्भव नहीं है। जाली मुद्रा का प्रचलन भारतीयों की मदद से ही सामान्य तथा गरीब भारतीय नागरिकों की वैयक्तिक आर्थिक सुरक्षा पर भी असर करता है।

पिछले ३० वर्षों से मैं जेहादी (आतंकवादी) ‘युद्ध पद्धति’ (Jihadi Concept of warfare) का गहन अध्ययन व विश्लेषण कर रहा हूं। पाश्चात्य जगत में ‘असामान्य युद्ध पद्धति’ (Asymmetric Warfare) तथा ‘चौथी पीढ़ी का युद्ध’ (Fourth Generation Warfare) के नाम से भी जाना जाता है। इस जेहादी युद्ध पद्धति के सिद्धांतों के अनुसार शत्रु राष्ट्र या प्रतिद्वंद्वी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था पर आघात करना, आक्रमण करना अत्यंत महत्वपूर्ण एवं आवश्यक भी होता है। इस युद्ध पद्धति के अनुरूप ‘The ware to be planned and conducted must be total to the infinite degree. It must be planned and fought in all fronts : External, Internal, Political, Diplomatic, Economic, Psychological and Militany front….. The resources and energy of the enemy, adversary (India) must not remain intact.’ ‘जेहादी युद्ध हर प्रकार से पूर्णरूपेण होना चाहिए। यह युद्ध प्रत्येक मोर्चे पर, प्रत्येक क्षेत्र में बाह्य आक्रमण, आंतरिक सुरक्षा, राजनैतिक, कूटनैतिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक, आर्थिक तथा सैन्य मोर्चे पर किया जाना चाहिए। हमारे शत्रु (भारत) की पूर्ण शक्ति, सामर्थ्य, अर्थव्यवस्था, एकीकृत तथा सुद्रढ़ नहीं रहना चाहिए!!!’ इसीलिए मेरी पूर्ण रूप से यह मान्यता है भारत में प्रचंड मात्रा में बाहरी देशों से अनधिकृत रूप से जाली मुद्रा का प्रसारण तथा प्रचलन एवं काले धन का प्रभाव भारत की एकीकृत तथा समग्र सुरक्षा पर तथा भारतीय अर्थव्यवस्था पर अघोषित व अप्रत्यक्ष आक्रमण है। इसके पहले कि यह आर्थिक आक्रमण हमारी आर्थिक व्यवस्था को खोखला कर दे, हमारे शासन की ओर से कठोर प्रतिकारात्मक तथा सुरक्षात्मक प्रभावी कदम उठाना आवश्यक है। भारतीय अर्थव्यवस्था बड़ी होने के कारण हम जाली मुद्रा तथा काले धन के रूप में ‘आर्थिक आक्रमण’ को गंभीरता से नहीं लेते हैं। पिछले ३० वर्षों में शासन का ध्यान, योग्य तथा सक्षम रूप से इस गंभीर समस्या की ओर नहीं गया है; जानकारी होते हुए भी सक्षम व कठोर कदम नहीं उठाए गए हैं। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण कटु सत्य है। आशा है कि केंद्र शासन में हुए नेतृत्व परिवर्तन के पश्चात इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए सक्षम तथा समयबद्द कार्रवाई की जाएगी।
भारत में आर्थिक अपराधों को हम गंभीरता से नहीं लेते हैं। चाहे वो हवाला के माध्यम से काले पैसे का वितरण, काला धन एकत्र करना, भारत में कमाया हुआ काला धन विदेशों में जमा करना, बड़ी बड़ी कम्पनियों में होने वाले घोटाले, बैंकों में होने वाले घोटाले, अपराध, बैंको से लिया गया कर्ज वापस न करना, शासकीय पैसे का दुरुपयोग आदि के प्रत्यक्ष परिणाम सामान्य जनता को दिखाई नहीं देते हैं, परंतु उसके अप्रत्यक्ष परिणाम ‘कैंसर रोग’ की तरह अवश्य होते ही हैं। जिस प्रकार युद्ध, आतंकवादी हमले से होने वाली तबाही, मानवीय, प्राकृतिक आघात हमें दिखाई देता है, उस प्रकार का आघात हमें आर्थिक आक्रमण से दिखाई नहीं देता है। इसीलिए हमारी सरकार, शासन व्यवस्था तथा जनता भी जाली मुद्रा के चलन तथा आर्थिक आक्रमण को गंभीरता से नहीं देखती है। यदि यही हाल रहा तो भारत पर इसके गंभीर दुष्परिणाम होंगे यह बात अवश्य है।
आर्थिक व्यवस्था तथा आर्थिक सुरक्षा पर आघात करने वालों को देशद्रोही तथा आक्रणमकारी के रूप में देखा जाना तथा न्याय व्यवस्था में देशद्रोह के अपराध का दंड देना अत्यंत आवश्यक है। महाराष्ट्र में हुआ ‘तेलगी स्टांप घोटाला’ इसका बड़ा उदाहरण है। इन जाली स्टांप पेपर्स, दस्तावेज के माध्यम से हुए व्यवहार क्या न्यायिक रूप से उचित होंगे? इस कांड में अनेक शासकीय अधिकारी, पुलिस अधिकारी, राजनीतिज्ञ आदि शामिल थे। परंतु इस घोटाले को राजनैतिक कारणों से एक सामान्य अपराध के रूप में ही देखा गया व इसी तरह न्यायिक कार्यवाही भी चली। इस कांड को जन्म देने वाले, प्रोत्साहन देने तत्व आज भी सम्मान तथा आराम की जिंदगी बसर कर रहे हैं!! क्या यह दुर्भाग्य पूर्ण नहीं है?
लगभग प्रत्येक सप्ताह भारत के किसी न किसी क्षेत्र में, शहर में खासकर सीमा क्षेत्रों के राज्यों में मादक द्रव्य, (Drugs-Narcotics), अवैध हथियार, तथा जाली नोटों के साथ अनेक विदेशी नागरिक पकड़े जाते हैं। इन्हें भेजता कौन है? इन्हें स्थानीय सहायता, आश्रय भारत में देता कौन है? भेजने वाले कभी सामने नहीं आते-कभी पकड़े नहीं जाते। इनके पीछे बड़ी शासकीय, राजनैतिक ताकतें काम करती हैं। भारत में शायद ही कोई ऐसा राज्य है जहां कोई न कोई शासकीय अधिकारी, राजनीतिक शक्तियां इस प्रकार के अपराधी कार्यों से सम्बंधित नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं कि पूर्ण शासकीय व राजनैतिक व्यवस्था दोषी है, परंतु केवल एक व्यक्ति ही भारत का अहित करने के लिए काफी होता है। हमारी गुप्तचर संस्थाओं की ऐसी मान्यता है कि इस नियोजित षड्यंत्र को, आक्रमण को एक पूर्व नियोजित पद्धति के अनुसार पाकिस्तान की गुप्तचर संस्था आय. एस. आय. जो कि पाकिस्तान शासन की एक प्रमुख अंग है, तथा कुछ दूसरे विदेशियों द्वारा चलाया जाता है। यही हमारी समस्या का मुख्य कारण है। इस आक्रमण को कुछ भारतीय नागरिकों के माध्यम से संचालित किया जाता है।
भारत में नियोजित रूप से प्रसारित जाली मुद्रा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में स्थित मुजफ्फराबाद शहर तथा बलोचिस्तान के क्वेटा शहर में छापी जाती है। कुछ ऐसी भी खबरें आती हैं (जिनकी पूर्णत: पुष्टि नहीं हुई है) कि पाकिस्तान शासन की मुद्रा मुद्रण प्रेस (Currancy Printing Press) में व प्रेस के माध्यम से भारत में प्रसारित जाली मुद्रा छापी जाती है। इन जाली नोटों को छापने के लिए जो कागज, स्याही आदि सामग्री लगती है उसे पाकिस्तानी तत्व विदेशों से आयात करते हैं। पेपर व स्याही का आयात पाकिस्तान में शासकीय संस्थानों के नाम पर (चाहे वह गलत क्यों न हो) किया जाता है। यह सामग्री ज्यादातर पश्चिमी देशों से आयात की जाती है। चीन तथा उत्तरी कोरिया में इस प्रकार के पेपर्स बनाने सम्बंधी अपुष्ट समाचार अनेक माध्यमों से आ रहे है। एक सामान्य व्यक्ति इस विशेष प्रकार के पेपर तथा स्याही का आयात नहीं कर सकता है। इन नोटों को छापने की विशेष स्याही भी विदेशों से मंगाई जाती है। भारतीय रिजर्व बैंक के नोटों पर छापे हुए नम्बरों की शृंखला, फोटो, हूबहू भारतीय नोटों के समान ही होते हैं। सामान्य व्यक्ति इन्हें पहचान नहीं पाता है। ये जाली नोट बहुत बड़े प्रमाण में छापे जाते हैं। इन्हें छापने की कीमत बहुत कम होती है।
पूर्ण भारत में संभवत: कोई ऐसा राज्य नहीं है जहां जाली मुद्रा का प्रचलन नहीं है। ज्यादा प्रभाव गुजरात, राजस्थान, पंजाब, जम्मू, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, असम, मेघालय, मणिपुर राज्यों में बढ़ रहा है। मुंबई जिसे अंडरवर्ल्ड तथा आर्थिक अपराधों का गढ़ कहा जाता है, जाली मुद्रा के प्रसारण का केंद्र बन गया है। यहां कार्यरत हवाला एजेंट, कोरियर कम्पनियां, स्मगलर, प्रापर्टी एजेंट आदि का सम्बंध पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, दुबई, शारजाह, बहरीन आदि देशों में कार्यरत तत्वों से है। मुंबई के पुलिस स्टेशनों में दर्ज की गईं शिकायतों का यदि बारीकी से अध्ययन व विश्लेषण किया जाए तो कई आश्चर्यजनक, तथा चौंकानेवाले तथ्य सामने आएंगे। जाली मुद्रा का आयात जल, थल, वायु मार्गों से किया जाता है। आयात, निर्यात करने वाली कम्पनियों में काम करने वाले कुछ कर्मचारी क्लियरिंग एजेंट जिन्हें आयात निर्यात प्रक्रिया की पूर्ण जानकारी होती है; जाली मुद्रा तथा काले धन के क्षेत्रों में मदद करते हैं। जाली मुद्रा भारत में लाने के लिए जिन तरीकों का प्रयोग किया जाता है, इनके बारे में हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। पिछले कुछ वर्षों से विमान कम्पनियों में काम करने वाले कुछ कर्मचारी, अन्य कर्मचारी, कुछ यात्री तथा फिल्म जगत से सम्बंधित कुछ लोग हवाई अड्डों पर पकड़े गए हैं।
जाली नोट अब कुछ बैंकों के माध्यम से भी बांटे जा रहे हैं। पिछले १० वर्षों में भारत में ऐसे अनेक मामले सामने आए हैं। कई लोगों ने बैंक से निकाले हुए पैसों में जाली नोट पाए हैं। उत्तर प्रदेश तथा बिहार में तो स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की कुछ शाखाओं में से निकाले गए पैसों में जाली नोट मिले हैं। इसका अर्थ है कि राष्ट्रीयकृत कुछ बैंकों के कुछ अधिकारी व कर्मचारी भी जाली मुद्रा के धंधे में लगे हुए हैं तथा राष्ट्रद्रोही तत्वों की सहायता करते हैं!! अन्यथा ये जाली नोट बैंकों में कहां से आते?
चूंकि मेरा अध्ययन तथा विश्लेषण आतंकवाद, जेहादी युद्ध पद्धति, अलगाववाद, नक्सलवाद में ज्यादा गहन है, मैं शासकीय पद्धति का दुरुपयोग देशद्रोही कैसे करते हैं इस विषय पर ज्यादा ध्यान देता हूं। पिछले ३० वर्षों से मैं कुरान का अध्ययन तथा विश्लेषण कर रहा हूं। मेरा बैंक अकाउंट पूणे स्थित सेंट्रल बैंक की एक शाखा में है। वहां से मैंने कुछ पैसे निकाले तो मुझे बिल्कुल नए नोटों के बंडल दिए गए। ये सील युक्त थे। नोटों की गिनती करते समय यह मुझे ध्यान में आया कि एक बंडल से ‘७८६’ अंतिम नम्बर का नोट गायब था। उस ७८६ के नम्बर के नोट की जगह दूसरे नम्बर का नोट रखा गया था। एक धर्म विशेष में ७८६ नम्बर का काफी महत्व है व इसे शुभ माना जाता है। मैंने लिखित रूप में ब्रांच मैनेजर, डिवीजनल मैनेजर, झोनल मैनेजर तथा चेयरमैन तक शिकायत की कि बैंक में नोट बदले जाते है। मैंने यह भी आगाह किया कि बंडलों में नकली नोट भी मिलाए जा सकते हैं और अवश्य ही इसमें बैंक का कोई कर्मचारी शामिल है। यह भी सिद्ध है कि बैंक सुरक्षा में कमी है। आज तक मुझे उत्तर नहीं मिला। इससे यह सिद्ध होता है कि नकली नोट बैकों में भी असली नोटों के बंडलों में मिलाए जा सकते हैं, और मिलाए भी जाते हैं। यह काम अधिकारी व कर्मचारियों मिली भगत के सिवाय नहीं हो सकता है।
जाली मुद्रा का चलन केवल भारतीय मुद्रा तक ही सीमित नहीं है। जाली अमेरिकन डॉलर, पौंड, फ्रेंक, आदि का प्रचलन भी बढ़ रहा है। ऐसी भी जानकारी मिल रही है कि जाली अमेरिकन डॉलर, (जिनकी पहचान करना मुश्किल है); उत्तरी कोरिया में छापे जाते हैं। कोलंम्बिया, मेक्सिको तथा दक्षिण अमेरिका के कुछ देशों में भी जाली मुद्रा का मुद्रीकरण होता है और वहां से विदेशों में वितरण होता है। पिछले कुछ वर्ष पूर्व ही अमेरिका में एक तथ्य सामने आने की खबरें आई थीं कि, वहां प्रचलित जाली मुद्रा का ३८ प्रतिशत; कम्प्यूटर से जाली नोट, जाली स्टाम्प पेपर व यहां तक कि जाली पासपोर्ट तथा ड्राइविंग लायसेंस छापने का काम किया जाता है।
इतिहास इस बात का साक्षी है कि जाली मुद्रा का प्रचलन शासकीय स्वीकृति से भी किया गया है व सम्भवत: अब भी किया जाता है। अमेरिका के स्वातंत्र्य युद्ध के दौरान, १७७० में ब्रिटेन ने इस प्रकार का दुष्कर्म किया था। अमेरिका में भी गृह युद्ध के दौरान अमेरिका के शासन ने इस प्रकार का प्रयास किया था। द्वितीय महायुद्ध के दौरान जर्मनी ने भी जाली डॉलर तथा जाली पौंड का प्रचलन करने का प्रयत्न किया था। लाखों पौंड के जाली नोट १९५० में जब्त किए गए थे। आज भी जाली नोटों के प्रसारण में पाकिस्तान की खुफिया व्यवस्था तथा सम्भवत: पाकिस्तान की शासन व्यवस्था अग्रणी है।
इस आर्थिक आक्रमण को रोकने के लिए हमारी शासकीय व्यवस्था को सक्षम तथा सजग तो बनाना ही पड़ेगा, इसके साथ साथ भारतीय नागरिकों को भी सजग, सक्षम, संयमित तथा सक्षम होना पड़ेगा। हमें एक आव्हान करना पड़ेगा: ‘Oh Citizen you Secure yourself’ प्रत्येक नागरिक को अपनी सर्वांगीण सुरक्षा स्वयं ही करनी होगी। ‘you can not out source security’ आपकी सुरक्षा के लिए आप दूसरे पर निर्भर नहीं रह सकते हैं। यदि जनता तथा शासकीय व्यवस्था संयुक्त रूप से कार्य करें तभी हम इस आर्थिक आक्रमण का संयुक्त रूप से, सक्षमता से सामना कर सकेंगे। इसीलिए हम सब को सजग रहना चाहिए।
उर्दू का एक शेर है:-
फसल गर बाकी है, तो मिले तकसीन का हक
फसल गर राखा हुई क्या मिले मजदूर का हक?
(लेखक फोरम फॉर इंटीग्रेटेड नेशनल सिक्योरिटी (भारतीय एकीकृत राष्ट्रीय सुरक्षा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा समर्थ भारत व्यासपीठ के अध्यक्ष हैं।)

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