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राष्ट्रजीवन तथा राजनैतिक जीवन का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है ‘यदि आपने जहरीली जड़ों को सींचा तो आपको अच्छे फल कैसे मिलेंगे’? कश्मीर में फैले आतंकवाद का अध्ययन तथा विश्लेषण करने पर यह कटु सत्य सामने आता है।
१९६५ के पाकिस्तान-भारत युद्ध के समय मैं कश्मीर के तनमर्ग-गुलमर्ग क्षेत्र में कार्यरत था। पर्वतीय युद्ध प्रशिक्षण संस्थान में मेरा प्रशिक्षण चल रहा था। भारतीय इतिहास की यह वास्तविकता है। युद्ध काल में वहां के ग्रामवासियों ने हमारी मदद की। वे हमें पाकिस्तानी घुसपैठियों के छुपे स्थानों तक मार्ग बताते थे। हमें खबरें पहुंचाते थे। विभिन्न प्रकार से हमारी सहायता करते थे।
१९७१ के पाकिस्तान-भारत युद्ध के समय भी कश्मीरी जनमानस ने पाकिस्तान के खिलाफ भारतीय सेना की मदद की। इस युद्ध में मैंने जम्मू क्षेत्र में युद्ध में भाग लिया व तत्पपश्चात कश्मीर में कार्यरत था । १९८१ से १९८४ तक मैंने लाइन आफ कंट्रोल, नियंत्रण रेखा के रक्षण करने की जिम्मेदारी सम्हाली तब भी स्थानीय लोगों ने हमारी सहायता की। तब कश्मीर में अलगाववाद – आतंकवाद नहीं था। उसे हमने १९९० के बाद में अनुभव किया है। १९८७ के बाद से आतंकवादी वृत्ति- अलगाववादी प्रवृत्ति प्रोत्साहित हुई। इसके लिए मूल रूप से कश्मीर में सक्रिय हुर्रियत कान्फ्रेंस जिनके कुछ सरगना (जन्म से मृत्यु तक भारत से गद्दारी ही करते हैं), कुछ स्थानीय राजनैतिक तत्व-जो कश्मीर को अपनी पारिवारिक सम्पत्ति समझते हैं, और २४८ प्रभावशाली लोग ही उत्तरदायी हैं। इन्हीं लोगों ने कश्मीर को युवा पीढ़ी को बर्बादी के मार्ग पर ढकेल दिया है।
पाकिस्तान ने इस अवसर का लाभ उठाया तथा कश्मीर में सक्रिय कुरव्यात केवल ८०० लोगों ने अलगाववादी प्रवृत्ति को आतंकवाद में बदल दिया। आतंकवादी प्रवृत्ति, आतंकवादी विचारधारा को प्रत्यक्ष युध्द का विकल्प बना दिया है।
पूरे विश्व में विशेषत: पाश्चात्य देशों में ‘आतंकवादी युद्ध पध्दति को असमानता की युद्ध पध्दति- चौथी पीढ़ी की युद्ध पध्दति का नाम दे दिया है। कश्मीर में फैले आतंकवाद को हमारे ही कुछ स्वयंमू विशेषज्ञों ने, मूर्खवृत्ति के राजनीतिज्ञों ने, कुछ शासकीय अधिकारियों ने अपनी कमजोरी, अकर्मण्यता, अक्षमता, अकुशलता घुपाने के लिए सीमा पार से प्रभावित आतंकवाद, अप्रत्यक्ष युध्द, अपरोक्ष युध्द, गृह युध्द आदि नाम दे दिए हैं। यह जानबूझकर और शासकीय अकुशकता, अक्षमता तथा अयोग्यता को छुपाने के लिए १९९० के दशक से शुरू किया गया। हम एक मूलमूत बात, वास्तविकता, कदु सत्य भूलजाते हैं कि जब तक किसी भी राष्ट्र में, राज्य में, संगठन में, परिवार में आंतरिक एकता, क्षमता, योग्यता, कुशलता, तथा कौशल्य होती है तब तक कोई भी बाहरी ताकत किसी भी प्रकार से गलत फायदा नहीं उठा सकती है। पाकिस्तान ने भारत में तथा विशेषकर कश्मीर में फैले विरोधाभास, देशद्रोही प्रवृत्ति, देशद्रोही तत्वों को प्रोत्साहित करके आतंकवादी युध्द छेड़ दिया।
१९७१ में पाकिस्तान-भारत युध्द में पाकिस्तान की भारी पराजय तथा पाकिस्तान के विघटन व बांग्लादेश के जन्म के पश्चात पाकिस्तान को यह कठोर व कटु वास्तविकता का पता चला कि पाकिस्तान भारत से प्रत्यक्ष युद्ध में कभी भी नहीं जीत पाएगा। यह वास्तविकता पाकिस्तानी शासन, राजनीतिकों, पाकिस्तानी सेना, आय.एस.आय (पाकिस्तानी गुप्तचर सेवा) तथा कट्टरवादी तत्वों के गले नहीं उतरती है। अमेरिका, सऊदी अरब तथा कुछ अन्य इस्लामिक देशों ने भी पाकिस्तान को आगाह किया कि पाकिस्तान भारत के विरुध्द युध्द करने की मूर्खता न करें अन्यथा पाकिस्तान का एक और विघटन, विभाजन अवश्य हो जाएगा। परंतु पाकिस्तान ने भारत से १९७१ के युध्द तथा विभाजन का बदला लेने के लिए एक नई रणनीति बनाई जिसके तहत भारत की आंतरिक कमजोरियों का फायदा उठा कर भारतीय व्यवस्था, भारतीय जनमानस, भारतीय अर्थव्यवस्था, भारतीय युध्द शक्ति, भारतीय आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था को रक्त रंजित करना। इस नई रणनीति के तहत पहले पंजाब राज्य में आतंकवाद फैलाया, फिर इस आंतकवाद की आग पूरे भारत में फैलाई। हमारी प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या दिनदहाड़े उन्हीं के शासकीय निवास स्थान में की गई। पंजाब को तबाह कर दिया गया। पंजाब में आज जो तरुण लोगों में मादक पदार्थों के सेवन की लत लग गई है यह भी एक सोची-समझी चाल का नतीजा है।
पाकिस्तान द्वारा कश्मीर में आतंकवाद तथा अलगाववाद क्यों फैलाया गया? इसके कई कारण हैं? सर्वप्रथम कश्मीर की वादियों का भूभाग तथा लेह तक का भूभाग पाकिस्तान तथा चीन को भौगोलिक तथा सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान की पानी की व्यवस्था, खेती, उद्योगों के लिए कश्मीर से पाकिस्तान में जाने वाली सिंधु नदी, झेलम, किशनगंगा तथा चिनाब नदियां महत्वपूर्ण हैं। पाकिस्तान को सदैव यह डर लगता है कि यदि भारत ने इन नदियों के पानी का प्रवाह रोक दिया या बदल दिया तो पाकिस्तान का रेगिस्तान बन जाएगा। कश्मीर को पाकिस्तान में शामिक करने का यह महत्वपूर्ण कारण है।
कश्मीर को पाकिस्तान के अधीन रखने के उद्देश्य से ही कश्मीरी पंडितों को कश्मीर से पलायन करने पर मजबूर कर दिया। इससे जनसंख्या के अनुपात पर प्रभाव पड़ा तथा आज कश्मीर मुस्लिम बहुल भूभाग हो गया है। इसका दुश्प्रमाव जम्मू-कश्मीर की राजनीति तथा शासन पर भी पड़ा है। कश्मीर का अलगाववाद/ आतंकवाद भारतीय शासन से पैसा कमाने का एकमात्र साधन बन गया है। विकास के नाम पर, लोगों को खुश रखने के नाम पर भारतीय शासन १९४७ से प्रति वर्ष भारी राशि खर्च करता है। इस पैसे का फायदा पूरे कश्मीर में ४००-५०० लोगों को तथा शासकीय अधिकारियों, राजनीतिज्ञों ठेकेदारों को ही होता है। कश्मीरी जनसामान्य को फायदा नहीं होता है।
कुछ धर्म के नाम पर अपना व्यवसाय चलाने वाले धार्मिक संगठनों ने विदेशों से पैसा प्राप्त करने के उद्देश्य से आतंकवाद का सम्बंध इस्लाम धर्म से जोड़ दिया है जबकि इस्लाम से आतंकवाद का कोई सम्बंध ही नहीं है। धर्म के नाम पर मध्यपूर्व के अनेक देशों से, विशेष कर सऊदी अरब से बहुत सारा पैसा जेहाद के नाम पर एकत्र किया जाता है। इसी पैसे का दुरुप्रयोग आतंकवाद को प्रोत्साहन देने हेतु किया जाता है। पाकिस्तान भी इस्लाम के नाम पर कश्मीर के तरुण व युवा वर्ग का ‘जेहाद’ के लिए प्रोत्साहित करता है, जेहादी मानसिकता को प्रोत्साहन देता है, युवाओं को आतंकवादी बनने के लिए पैसा, प्रशिक्षण, शस्त्र, आर.डी,एक्स. विस्फोटक तथा अन्य प्रकार की सहायता देता है। कश्मीर, पाकिस्तान, तथा भारत के अनेक भागों में कार्यरत अपने आप को धर्मगुरु कहलाने वाले तथा इन मासूम तरुणों को जेहादी युद्ध (आतंकवाद) की ओर आकर्षित करते हैं, प्रोत्साहित करते हैं। कई तरह के प्रलोभन में अनेक आतंकवादी प्रवृत्ति से प्रेरित युवक कश्मीर में आ जाते हैं, अपने प्राण गंवा बैठते हैं।
मुंबई में कार्यरत इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन का सरगना अपने राष्ट्रद्रोही भाषणों में बताता था कि ‘‘जिस प्रकार गीता में उपदेश दिया है कि युद्ध क्षेत्र में मारे जाना स्वर्ग के मार्ग पर जाना है, उसी प्रकार जेहादी युद्ध (आतंकवाद) में मारे जाना जन्नत में जाने का मार्ग खोलता है, जन्नत के दरवाजे आतंकवादियों के लिए हमेशा खुले रहते हैं।’’ नवयुवकों को कश्मीर में सक्रिय देशद्रोही हुरिरयत कान्फ्रेंस, कुछ स्वयंभू राजनीतिज्ञ, गद्दार राष्ट्रद्रोही इन युवाओं को हर प्रकार का प्रोत्साहन देते हैं, सहायता करते हैं। कश्मीर इस प्रकार की घातक प्रवृत्ति से प्रेरित होकर ही नवयुवक आतंकवादी, धर्मविद्रोही, राष्ट्रद्रोही बन जाते हैर तथा आतंकवादी कार्रवाई करते हैं। मैंने मेजर जनरल के पद पर कश्मीर में आतंकवादी युद्ध का सामना किया है, आतंकवाद पर भारतीय सेना ने कश्मीर की पुलिस तथा कश्मीर के लोगों की सहायता, सहयोग से आतंकवाद पर काबू किया था। पाकिस्तान की यह महत्वाकांक्षा कि कश्मीर में सक्रिय कुछ भारतद्रोही व्यक्तियों तथा संगठनों की सक्रिय सहायता तथा सहयोग से कश्मीर को आजाद करा कर कश्मीर को पाकिस्तान में शामिल कर लेंगे कभी भी पूरी नहीं होगी यह सत्य है। भारतीय जनमानस, भारतीय शासन, भारतीय सेनाएं तथा कश्मीर के निवासी कभी भी पाकिस्तान के कश्मीर हथियानपे के सपने को साकार नहीं होने देंगे। अयूब खान, जुल्फिकार अली मुट्टो, जियाउल हक, बेनजीर मुट्टो न जाने कितने पाकिस्तान के सेनापति, आय.एस.आय. के प्रमुख, आज भी जन्नत में ही यही स्वप्न देखते होंगे कि कब भारतीय कश्मीर पाकिस्तान का अंग बनेगा। हमारा दुर्भाग्य है कि भारत में ही, विशेषत: कश्मीर में सक्रिय कुछ राष्ट्रद्रोही जो अपने आप को राजनीतिज्ञ बताते हैं, कश्मीर के युवाओं के जीवन को तबाह करके अपना जीवन ऐशोआराम में बिताते हैं; पाकिस्तान की सहायता करते हैं। भारतीय शासन उनके विरुद्ध कोई भी कानूनी, न्यायिक कार्रवाई १९४७ से लेकर आज तक नहीं कर पाया है। देशद्रोही, भारतद्रोही, गद्दार, अपराधी, आर्थिक चोर, लुटेरे आदि तमान लोगों को भारत में अमयदान हमारी ही शासन व्यवस्था, कानूनी व्यवस्था, न्यायिक व्यवस्था तथा हमारी कमजोर राष्ट्रीय मानसिकता ही देती है। विदेशों से मिलने वाले प्रोत्साहन, पैसे से चलने वाले कुछ स्वयंभू तथाकथित फर्जी मानवाधिकार संगठनों को इसी प्रकार के कुछ लोग प्रोत्साहन देते हैं। भारतीय जनमानस एक असहाय जनसमूह की तरह लाचार होकर केवल एक श्रोता या दर्शक बनकर रह गए हैं। क्या हमारी इस राष्ट्रीय मानसिकता में कभी परिवर्तन आएगा?
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से २०१६ तक की अवधि में केवल श्री नरसिंह राव ही एकमात्र प्रधान मंत्री थे जिन्होंने १५ अगस्त को लाल किले से राष्ट्र के नाम में उद्बोधन में बिल्कुल स्पष्ट रूप से कहा था, ‘‘पाकिस्तान-भारत के बीच कोई मसला नहीं है। केवल एक ही मसला है कि पाकिस्तान कब पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर भारत को वापस करने वाला है। इस प्रकार का साहस, दृष्टिकोण दिखाने वाले वे एकमात्र प्रधान मंत्री थे। इसीलिए उन्हें ‘चाणक्य’ कहा जाता था । हमें यह आशा करना चाहिए, पार्थना करनी चाहिए कि हमारे पूर्व प्रधान मंत्री श्री नरसिंह राव के स्वप्न को साकार करने की दूरदर्शिता, हिम्मत, साहस, योग्यता तथा कर्मठता निकट भविष्य में भारतीय जनमानस तथा भारतीय शासन दिखाएगा। गिलगिट, बाल्टिस्तान, पी.ओ.के. ये सब भारतीय क्षेत्र स्वतंत्र होना चाहते हैं। पाकिस्तान की गुलामी, सैन्य शासन से मुक्त होना चाहते हैं। इनके स्वप्न को साकार कौन कराएगा? बलूचिस्तान का युवा वर्ग पाकिस्तान की गुलामी से, सैन्य शासन से, भ्रष्टाचार से, अत्याचार से मुक्त होना चाहता है। कौन उनकी सहायता करेगा?
कश्मीर के युवा वर्ग, विद्यार्थी समाज को एक सत्य, वास्तविकता अच्छी तरह समझनी चाहिए कि कश्मीर में सक्रिय कुछ परिवार, पारिवारिक राजनैतिक स्वार्थी दलों ने, राष्ट्रद्रोही तत्वों ने एकत्र होकर आर्थिक रुप से सम्पन्न ३५० लोगों ने ‘आजादी’ का नारा देकर पूरे कश्मीर के खिलाफ जघन्य अपराध किया है । पिछले ३० सालों में कश्मीर को पूरी तरह आतंकवादियों तथा पाकिस्तान के समर्थकों के हाथों में सौंप दिया है। कश्मीरी युवा वर्ग अपनी मानसिकता खो चुका है। आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक, औद्योगिक रूप से कश्मीर को ५० वर्ष पीछे ले जाया गया है। यह जानबूझकर किया गया है। अपना भविष्य कश्मीर के युवाओं को ही बनाना पड़ेगा।
मेरा निवेदन है कि कश्मीर का युवा वर्ग निम्न बातों पर विचार करें:-
१. यदि शिक्षण व्यवस्था सुचारू रूप से न चले तो क्या विद्यार्थी समय पर परीक्षा पास कर पाएंगे?
२. क्या उच्चस्तरीय अध्यापक, प्राध्यापक कश्मीर में स्थित विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयो में अध्यापत करने का तैयार होते हैं?
३. कश्मीर घाटी में पिछले ३० वर्षो में कितने उद्योग लगाए गए?
४. कश्मीर में सक्रिय राष्ट्रद्रोही, स्वयं को राजनीतिज्ञ बताने वाले, शासकीय अधिकारी, उद्योगपतियों के बच्चे क्या कश्मीर में शिक्षा प्राप्त करते हैं?
५. कश्मीर के युवा विद्यार्थियों को अमेरिका, कनाडा, यूरोप, आस्ट्रेलिया में उच्च शिक्षा के लिए प्रवेश मिलेगा? क्या विद्यार्थी वीजा मिलेगा?
६. कश्मीर के युवा वर्ग को क्या विदेशों में नौकरी मिलती है? कश्मीर के कितने युवक हैं जिन्हें पाकिस्तान में लगे उद्योंगों में नौकरी मिली है?
७. भारत के बड़े शहरों में महाविद्यालयों में, विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को आसानी से मकान किराए पर मिलते हैं?
८. क्या कश्मीर के युवाओं को भारत में कार्यरत विदेशी कम्पनियों में नौकरी आसानी से मिलती है?
यदि इन तमाम प्रश्नों का उत्तर नकारात्मक है तो इसके लिए उत्तरदायी कौन है? कश्मीर के हुकमरान, राजनीतिज्ञ, देशद्रोही तथा हुर्रियत कान्फ्रेंस, दुखतराने मिल्लत, जैश ए मोहम्मद, हिजबुल मुनाहिदीन या भारतीय जनमानस, विश्व समुदाय? जब तक कश्मीर में शाति, सुव्यवस्था, सहयोग, सद्भाव का वातावरण युवा वर्ग ही नहीं बनाएगा तब तक बाहर से कौन आएगा? हाफिज सईद, लखवी, पाकिस्तान में सक्रिय आतंकवादी संगठन? कश्मीर के सामान्य जनमानस को गुमराही, बर्बादी के रास्ते पर कश्मीर में जन्मे, पले- बढ़े देशद्रोहियों ने, कश्मीरद्रोहियों ने, पाकिस्तान प्रेमियों ने ही कश्मीर के युवा वर्ग को बर्बादी के रास्ते पर ढकेल दिया है।
अच्छे फलों का प्रयास, अच्छे भविष्य की कामत, शांतिपूर्ण भारत में ही जीवन, सहअस्तिव की कामना तथा प्रयास कश्मीर के युवा वर्ग, विद्यार्थी वर्ग को ही करना पड़ेगा कोई दूसरा नहीं कर सकता।
पाकिस्तान ने कश्मीर के नाम पर भारत से शत्रुता, युद्ध (घोषित-अघोषित, प्रत्यक्ष -अप्रत्यक्ष) पिछले ७० वर्षों से किए हैं, परंतु उसे कोई सफलता नहीं मिली उल्टे पाकिस्तान का विभाजन हो गया। बांग्लादेश बन गया। मूर्खतावश, बदले की भावना से प्रेरित होकर पाकिस्तान के शासक, सेना, आय.एस.आय. तथा कट्ठरपंथी अगले ७०० वर्षों तक भी प्रयास करें तब भी कुछ नहीं होगा। हां एक बात, घटनाक्रम की प्रबल संमावना है कि पाकिस्तान का एक और विभाजन होगा। पाकिस्तान का फिर से विघटन होगा। बलूचिस्तान, गिलगिट, बाल्टिस्तान ये स्वतंत्र राष्ट्र बनेंगे यह निश्चित है। निर्णय पाकिस्तान को ही करना है। निर्णय कश्मीर के युवाओं को ही करना है।

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