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कश्मीर में १९ जनवरी १९९० को हुए बर्बर जनसंहार के बाद सत्ताईस वर्षों का लम्बा अंतराल बीत गया है जिसमें दिल्ली और श्रीनगर की असंवेदनशीलता के सिवा कश्मीरी पंडितों को कुछ नहीं मिला है। अब तो यह भी विचारणीय प्रश्न है कि कश्मीर से निष्कासित कश्मीरी पंडित वहां पुनः बसना चाहते भी हैं या नहीं। अब यह आवश्यक है कि कश्मीरियों के पुनर्वास के पूर्व इस बात पर गहन विमर्श हो कि कश्मीरी पंडित कितने हैं जो वहां पुनः बसना चाहते हैं? इतना दीर्घ कालखंड बीत जाने के कारण स्वाभावतः ही अनेकों कश्मीरी पंडित परिवारों ने अन्य स्थानों पर अपने रोजगार विकसित करने, घरौंदे बनाने, नई पीढ़ी को पढाने,विवाह आदि के सम्बंध तय करने जैसे कार्य नई परिस्थितियों के अनुसार निश्चित कर लिए होंगे।
इस स्थिति में आवश्यक है कि उन परिवारों को चिह्नित किया जाए जो पुनः कश्मीर में बसना चाहते हैं व बाकी परिवारों को निश्चित भूमि, नकदी मुआवजे आदि की सुविधाएं देना निश्चित किया जाए। कश्मीर के सर्वाधिक नए जन सांख्यिकीय आंकड़ों पर नजर डाले तो स्वतंत्रता के समय वहां घाटी में १५% कश्मीरी पंडितों की आबादी थी जो आज १ % से नीचे होकर ०% की ओर बढ़ गई है। हाल ही के इतिहास में कश्मीर के जनसंख्या आंकड़ों में यदि परिवर्तन का सब से बड़ा कारक खोजें तो वह एक दिन यानि १९ जनवरी १९९० के नाम से जाना जाता है। कश्मीरी पंडितों को उनकी मातृभूमि से खदेड़ देने की इस घटना की यह भीषण और वीभत्स कथा १९८९ में आकार लेने लगी थी। पाकिस्तान प्रेरित और प्रायोजित आतंकवादी और अलगाववादी यहां अपनी जड़ें बैठा चुके थे। भारत सरकार आतंकवाद की समाप्ति में लगी हुई थी तब के दौर में वहां रह रहे ये कश्मीरी पंडित भारत सरकार के मित्र और इन आतंकियों और अलगाववादियों के दुश्मन और खबरी सिद्ध हो रहे थे। इस दौर में कश्मीर में अलगाववादी समाज और आतंकवादियों ने इस शांतिप्रिय हिन्दू पंडित समाज के विरुद्ध चल रहे अपने धीमे और छद्म संघर्ष को घोषित संघर्ष में बदल दिया। इस भयानक नरसंहार पर फारुक अब्दुल्ला की रहस्यमयी चुप्पी और कश्मीरी पंडित विरोधी मानसिकता केवल इस घटना के समय ही सामने नहीं आई थी। तब के दौर में तत्कालीन मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला अपने पिता शेख अब्दुल्ला के कदमों पर चलते हुए अपना कश्मीरी पंडित विरोधी आचरण कई बार सार्वजनिक कर चुके थे।
१९ जनवरी १९९० के मध्ययुगीन, भीषण और पाशविक दिन के पूर्व जमात-ए-इस्लामी द्वारा कश्मीर में अलगाववाद को समर्थन करने और कश्मीर को हिन्दू विहीन करने के उद्देश्य से हिज्बुल मुजाहिदीन की स्थापना हो गई थी। इस हिजबुल मुजाहिदीन ने ४ जनवरी १९९० को कश्मीर के स्थानीय समाचार पत्र में एक विज्ञप्ति प्रकाशित कराई जिसमें स्पष्टतः सभी कश्मीरी पंडितों को कश्मीर छोड़ने की धमकी दी गई थी। इस क्रम में उधर पाकिस्तानी प्रधान मंत्री बेनजीर ने भी टीवी पर कश्मीरियों को भारत से मुक्ति पाने का भड़काऊ भाषण दे दिया। घाटी में खुले आम भारत विरोधी नारे लगने लगे। घाटी की मस्जिदों में अजान के स्थान पर हिन्दुओं के लिए धमकियां और हिन्दुओं को खदेड़ने या मार-काट देने के जहरीले आवाहन बजने लगे। एक अन्य स्थानीय समाचार पत्र अल-सफा ने भी इस विज्ञप्ति का प्रकाशन किया था। इस भड़काऊ, नफरत, धमकी, हिंसा और भय से भरे शब्दों और आशय वाली इस विज्ञप्ति के प्रकाशन के बाद कश्मीरी पंडितों में गहरे तक भय, डर, घबराहट का संचार हो गया। यह स्वाभाविक भी था क्योंकि तब तक कश्मीरी पंडितों के विरोध में कई छोटी बड़ी घटनाएं वहां सतत घाट ही रही थीं और कश्मीरी प्रशासन और भारत सरकार दोनों ही उन पर नियंत्रण नहीं कर पा रहे थे। १९ जनवरी १९९० की भीषणता को तथा कश्मीर और भारत सरकार की विफलता को इससे स्पष्ट समझा जा सकता है कि पूरी घाटी में कश्मीरी पंडितों के घर और दुकानों पर नोटिस चिपका दिए गए थे कि २४ घंटों के भीतर वे घाटी छोड़ कर चले जाएं या इस्लाम ग्रहण कर कड़ाई से इस्लाम के नियमों का पालन करें। घरों पर धमकीभरे पोस्टर चिपकाने की इस बदनाम घटना से भी भारत और कश्मीरी सरकारें चेती नहीं और परिणाम स्वरुप पूरी घाटी में कश्मीरी पंडितों के घर धूं-धूं जल उठे। तत्कालीन मुख्यमंत्री फारुक अब्दुल्ला इन घटनाओं पर रहस्यमयी आचरण अपनाए रहे, वे कुछ करने का अभिनय करते रहे और कश्मीरी पंडित अपनी ही भूमि पर ताजा इतिहास की सर्वाधिक पाशविक- बर्बर-क्रूरतम गतिविधियों का खुले आम शिकार होते रहे। घाटी में पहले से फैली अराजकता चरम पर पहुंच गई। कश्मीरी पंडितों के सर काटे गए, कटे सर वाले शवों को चौक-चौराहों पर लटकाया गया। बलात्कार हुए, कश्मीरी पंडितों की स्त्रियों के साथ पाशविक-बर्बर अत्याचार हुए। गर्म सलाखें शरीर में दागी गईं और इज्जत आबरू के भय से सैकड़ों कश्मीरी पंडित स्त्रियों ने आत्महत्या करने में ही भलाई समझी। बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों के शवों का समुचित अंतिम संस्कार भी नहीं होनें दिया गया था, कश्यप ऋषि के संस्कारवान कश्मीर में संवेदनाएं समाप्त हो गईं और पाशविकता-बर्बरता का वीभत्स नंगा नाच दिखा था।
जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट और हिजबुल मुजाहिदीन ने जाहिर और सार्वजनिक तौर पर इस हत्याकांड का नेतृत्व किया था। ये सब एकाएक नहीं हुआ था, हिजबुल और अलगाववादियों का अप्रत्यक्ष समर्थन कर रहे फारुख अब्दुल्ला तब भी चुप रहे थे या कार्रवाई करने का अभिनय मात्र कर रहे थे जब भाजपाई और कश्मीरी पंडितों के नेता टीकालाल टपलू की १४ सितंबर १९८९ को दिनदहाड़े ह्त्या कर दी गई थी। अलगाववादियों को कश्मीर प्रशासन का ऐसा वरद हस्त प्राप्त रहा कि बाद में उन्होंने कश्मीरी पंडित और श्रीनगर के न्यायाधीश एन. गंजू की भी ह्त्या की और प्रतिक्रया होने पर ३२० कश्मीरी स्त्रियों, बच्चों और पुरुषों की ह्त्या कर दी थी। ऐसी कितनी ही ह्रदय विदारक, अत्याचारी और बर्बर घटनाएं कश्मीरी पंडितों के साथ घटती चली गई और दिल्ली सरकार लाचार देखती भर रही और उधर श्रीनगर की सरकार तो जैसे खुल कर इन आतताइयों के पक्ष में आ गई थी।
इस पृष्ठभूमि में हिजबुल और जे के एल का दुस्साहस बढ़ना स्वाभाविक ही था और वह निर्णायक तौर पर कश्मीरी पंडितों की दुकानों-घरों पर २४ घंटे में घाटी छोड़ देने या मार दिए जाने की धमकी के नोटिस चस्पां करने की हद तक बढ़ गया। इसके बाद जो हुआ वह एक दुखद, क्षोभजनक, वीभत्स, दर्दनाक और इतिहास को दहला देने वाले काले अध्याय के रूप में सामने आया। अन्ततोगत्वा वही हुआ जो वहां के अलगाववादी, आतंकवादी हिजबुल और जेकेएल चाहते थे।
कश्मीरी पंडित पूर्व की घटनाओं, घरों पर नोटिस चिपकाए जाने और बेहिसाब कत्लेआम से घबराकर १९ जनवरी १९९० को हिम्मत हार गए। फारुख अब्दुल्ला के कुशासन में आतंकवाद और अलगाववाद चरम पर आकर विजयी हुआ और इस दिन साढ़े तीन लाख कश्मीरी पंडित अपने घरों, दुकानों, खेतों, बागों और संपत्तियों को छोड़ कर विस्थापित होकर दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हो गए। कई कश्मीरी पंडित अपनों को खोकर गए, अनेकों अपनों का अंतिम संस्कार भी नहीं कर पाए, और हजारों तो यहां से निकल ही नहीं पाए और मार-काट डाले गए।
विस्थापन के बाद का जो दौर आया वह भी किसी प्रकार से आतताइयों द्वारा दिए गए कष्टों से कम नहीं रहा कश्मीरी पंडितों के लिए। वे सरकारी शिविरों में नारकीय जीवन जीने को मजबूर हुए। हजारों कश्मीरी पंडित दिल्ली, मेरठ, लखनऊ जैसे नगरों में सनस्ट्रोक से इसलिए मृत्यु को प्राप्त हो गए क्योंकि उन्हें गर्म मौसम में रहने की आदत नहीं थी। पच्चीस वर्ष पूर्ण हुए किन्तु कश्मीरी पंडितों के घरों पर हिजबुल द्वारा नोटिस चिपकाए जाने से लेकर विस्थापन तक और विस्थापन से लेकर आज तक के समय में मानवाधिकार, मीडिया, सेमीनार, तथाकथित बुद्धिजीवी, मोमबत्तीबाज और संयुक्त राष्ट्रसंघ सभी इस विषय में कमोबेश बोले या नहीं यह तो नहीं पता किन्तु इन कश्मीरी पंडितों की समस्या का कोई ठोस हल अब तक नहीं निकला यह पूरी दुनिया को पता है। ये सच से मुंह मोड़ने और शुतुरमुर्ग होने का ही परिणाम है कि कश्मीरियों के साथ हुई इस घटना को शर्मनाक ढंग से स्वेच्छा से पलायन बताया गया! इस घटना को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने सामूहिक नरसंहार मानने से भी इंकार किया; ये घोर अन्याय और तथ्यों की असंवेदी अनदेखी है! नरेन्द्र मोदी सरकार कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास हेतु प्रतिबद्ध है और वह इस प्रतिबद्धता को दोहराती रही है। दुर्योग है कि नमो को प्रधान मंत्री बनने के बाद अवसर नहीं मिला। पहले कश्मीर में बाढ़ आ गई और फिर चुनाव आ गए जिससे कश्मीरी पंडितों का उनका संकल्प परवान नहीं चढ़ पाया किन्तु अब समय आ गया है। सत्ताईस वर्षों के इस दयनीय, नारकीय और अपमानजनक अध्याय का अंत होना चाहिए अब। कश्मीरी पंडितों का पुनर्वास हो, पुनर्प्रतिष्ठा हो, कश्मीरियत का पुनर्जागरण हो यह आशा और विश्वास है प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी से इस देश को।

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