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बांगलादेश, अफगानिस्तान एवं पाकिस्तान के गैर-मुस्लिमों को भारतीय नागरिकता देने का बिल संसद ने पास कर दिया। इस विधेयक के माध्यम से उपरोक्त देशों के हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी एवं इसाई समुदाय के लोगों को भारतीय नागरिकता दी जायेगी। यह केवल असम तक सीमित नही है वरन् देश के अन्य मागों में रहने वाले आश्रितों को भी इसका लाभ मिलेगा। उपरोक्त देशों में अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों की पार्श्वभूमि पर इनको भारत के सिवाय सुरक्षित स्थान नही है।

6 वर्षों से अधिक समय से रह रहे लोगों को ही नागरिकता
वर्तमान कानून में जो 12 वर्ष की समय सीमा है उसको संशोधित कर 6 वर्ष किया गया है। उपरोक्त देशों के जो अल्पसंख्यक 6 र्वेों से अधिक समय से भारत में रह रहे हैं उन्हे भारत की नागरिकता दी जायेगी। इस विधेयक के प्रावधान संविधान के विरोधी नही है इसलिये इस विधेयक का आसाम मे हो रहा विरोध बेमतलब है। असम के जनता की परंपरा और संस्कृति का जतन करना यह केन्द्र सरकार की जवाबदारी है एवं सरकार इसके लिये प्रतिबद्ध है ऐसा गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है।
विधेयक का कुछ राजनितिक दलों द्वारा विरोध

यह विधेयक संविधान विरोधी है ऐसा आरोप कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, राजद, माकपा, सपा, अगप एवं शिवसेना ने किया है। परंतु यही दल रोहिंग्या मुसलमानों को भारतीय नागरिकता देने का समर्थन कर रहे हैं। परंतु यही न्याय वे इन अल्पसंख्यकों को देने को तैयार नही है। असम गण परिषद इस विधेयक का विरोध कर ऐतिहासिक भूल कर रहा है एवं राज्य की जनता के साथ विश्वासघात कर रहा है ऐसा असम के मंत्री हेमंत बिस्वसर्मा ने कहा है। इन अल्पसंख्यकों को उचित कागजात के अभाव में भी यदि वे भारत में छह वर्ष से अधिक काल से रह रहे हैं, तब भी नागरिकता देने का प्रावधान है। इन देशों के अल्पसंख्यकों को भारत के सिवाय अन्य कोई देश भी नही है इसलिये ऐसा करना आवश्यक था।

अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बंगलादेश में अल्पसंख्यंक असुरक्षित
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू भी पडोसी देशों के अल्पसंख्यकों को भारत में आश्रय देने के पक्ष में थे। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहनसिंह जब, भाजपा के कार्यकाल में, राज्यसभा में विरोधी पक्ष के नेता थे तब बांगला देश में अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों का मुद्दा उठाकर उसपर उदारता से विचार करने की आवश्यकता पर जोर दिया था। इस विधेयक पर बोलते हुए राजनाथसिंह ने कहा कि बंगलादेश एवं पाकिस्तान से अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के संबध में समझौता भी हुआ है परंतु दुर्भाग्य से उसका पालन नही हो रहा है।
असम को दूसरा काश्मीर बनाने का षडयंत्र

इस विधेयक के कानून बन जाने पर पडोसी देशों से भारत में आने वाले मुस्लिमों को भारत की नागरिकता नही मिल पायेगी। इस के कारण मुसलमानों के वोट बैंक वाले राजनितिक दल हायतौबा मचा रहे हैं। 2010 के आंकड़ो के अनुसार अमस में बंगलादेशियों की संख्या 35% थी एवं 2019 में वह 38 से 39% तक हो गई होगी ऐसा अनुमान है। इसके अलावा अन्य अवैध नागरिक भी हैं जिनकी गिनती ही नही हुई। असम के वरिष्ठ मंत्री हेमंत बिस्वसर्मा ने भय व्यक्त किया था कि यदि संसद द्वारा यह विधेयक पास नही हुआ तो आगामी पांच वर्षों में असम में हिन्दु अल्पसंख्यक हो जायेंगे। असम को दूसरा कश्मीर बनाने का बडयंत्र करने वाली समाज विरोधी शक्तियां यह विधेयक रोकने का प्रयत्न कर रही है

पाकिस्तान एवं बंगलादेश में हिन्दुओं की दशा
उपरोक्त दोनों देशों में अल्पसंख्यकों पर विशेषक हिंदुओं पर, जो अनन्वित अत्याचार किये गये, उनकी हत्या की गई, उनका धर्मपरिवर्तन किया गया उसके कारण जहां पाकिस्तान में सन् 1950 में उनकी संख्या 8 से 9% थी तथा बंगलादेश में (विभाजन बाद) 24 से 25% थी वह आज घटकर क्रमश: 2% से कम (अनुमानत: 10 लाख) एवं 8.6% रह गई है (एक करोड)। संयुक्त राष्ट्र संघ भी इस घटती जनसंख्या की अनदेखी कर रहा है। यदि ऐसा ही शुरु रहा तो दोनों देशों मे यह संख्या शून्य हो सकती है। शास्त्रज्ञों के अनुमान के अनुसार 2020 तक बंगलादेश में केवल 1.5% हिन्दु शेष रहेंगे। गत 25 वर्षों में 53 लाख हिन्दुओं ने बंगलादेश से पलायन किया है। विदेशी लेखक प्रो.अली रियाझ ने यह जो सत्य विश्व के सम्मुख रखा था उस पर तत्कालीन भारत सरकार ने कोई भी अधिकृत प्रतिक्रिया नही दी। यहां के समाचर पत्रों, संगठनों एवं मानवाधिकारवादी नेताओं से भी कडी प्रतिक्रिया अपेक्षित थी जो भारत सरकार ने कहा कि वह बांगलादेश नारिकों पर हुआ अत्याचार है और उसमें हिन्दु शब्द के समावेश को टाला।
क्या हमारी नैतिक जवाबदारी नही है?
बंगलादेशीय संगठनों की जानकारी के अनुसार अंदजन 30 लाख हिन्दू इस नरसंहार में गये। सन् 71 में भारत में आये निर्वासियों मे 90% हिन्दू थे। क्या इस अन्याय पर हमारी कोई नैतिक जवाबदारी नही है।
अफगानिस्तान , पाकिस्तान, बांगलादेश में अल्पसंख्यकों की रक्षा नही होती है। सन् 2019 में होने वाले आमचुनावों में अल्पसंख्यकों पर होने वाले अन्याय को जनता के समक्ष लाना होगा। इसलिये इस विधेयक का विरोध करने वाले राजनितिक दलों पर दबाव डालकर उन्हे इन नागरिकों के हितों की रक्षा करने हेतु मजबूर करना होगा।

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