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सम्पूर्ण व्यावसायिक निर्यात की वैश्विक रैंकिंग में बुरी तरह से पिछड़ते हुए भारत का १९ वां स्थान है वहीं कृषि उत्पाद के निर्यात के मामले में आश्चर्यजनक रूप से छठा स्थान है।

वित्तीय साक्षरता की ही भांति हर भारतीय के लिए कृषि का ज्ञान होना भी आवश्यक है।
विगत वर्ष में, भारतीय रिजर्व बैंक के तत्कालीन गवर्नर ने भारतीय जनमानस में वित्तीय साक्षरता के ज्ञान को बढ़ावा देने की बात कही और समाधान के तौर पर इसे स्कूली शिक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने की वकालत की। सही है, वित्तीय साक्षरता के वृहद् ज्ञान की आवश्यकता है लेकिन वित्तीय साक्षरता के साथ ही साथ भारत को कृषि की भी उतनी ही आवश्यकता है।

कृषि साक्षरता, एक समसामयिक दृष्टिकोण, विद्यार्थियों और आम लोगों के बीच खेती के प्रति सजगता को व्याख्यायित करता है। प्रत्येक तरुण और वयस्क को अपने दैनिक जीवन में कृषि के महत्व का पता होना चाहिए। कृषि के अंतर्गत जीव विज्ञान, अर्थशास्त्र, तंत्र विज्ञान, राजनीति, समाजशास्त्र, अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के अतिरिक्त व्यापार भी आ जाते हैं( मूर – १९८७)। कृषि साक्षरता का ज्ञान होते ही व्यक्ति को इन तमाम विषयों की बेसिक जानकारी सहज ही हो जाती है।

प्रत्येक साक्षर भारतीय जानता और दुखी होता है कि भारत दुनिया का दूसरा सबसे ज्यादा जनसंख्या वाला देश है पर कितने पढ़े-लिखों को पता है कि कृषि उत्पादन के क्षेत्र में भी हम भारतीयों का दूसरा स्थान है? और कितने लोगों को पता है कि कृषि क्षेत्र देश का सबसे बड़ा गैर सरकारी उपक्रम है। २०१४ में कृषि क्षेत्र ने ३६७ बिलियन डालर मूल्य के उत्पादन के साथ ही साथ२६ करोड़ किसानों और कृषि मजदूरों को भी लाभ पहुंचाया।

२०११ की जनगणना के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में महिला कर्मचारियों का प्रतिशत तीस है जबकि उपनगरीय क्षेत्रों में यही औसत मात्र १५ प्रतिशत है। दूसरे शब्दों में, भारतीय कृषि क्षेत्र महिलाओं को अधिक रोजगार मुहैया कराता है – और वह भी बिना किसी आरक्षण और सरकारी हस्तक्षेप के।

सम्पूर्ण व्यावसायिक निर्यात की वैश्विक रैंकिंग में बुरी तरह से पिछड़ते हुए भारत का १९ वां स्थान है वहीं कृषि उत्पाद के निर्यात के मामले में आश्चर्यजनक रूप से छठा स्थान है। यह अनुभवजनित तथ्य भारतीय कृषि उत्पादों की वैश्विक प्रतिस्पर्धा को दर्शाता है। इसके अलावा कृषि उत्पादों के अंतर्राष्ट्रीय निर्यात द्वारा प्राप्त होने वाला विदेशी मुद्रा का भंडार सेवा या औद्योगिक व्यापार की अपेक्षा बहुत ज्यादा होता है। दुनिया भर में पैदा होने वाले अनाज का सत्तर प्रतिशत भाग जानवरों के लिए प्रयोग में लाया जाता है। परन्तु भारत की स्थिति अलग है। कृषि उत्पाद हमारा बुनियादी भोज्य पदार्थ है। वैश्विक स्तर पर मांस की खपत का प्रति व्यक्ति औसत ४२ किलो सालाना है, वहीं भारत में इसकी सालाना खपत मात्र ४

देश की उत्पादकता (बिलियन डॉलर में)

क्षेत्र जी.डी.पी विश्व जी.डी.पी भारत भारत का हिस्सा % में भारत की स्थिति
सेवा ४९६६९ ११८५ ११
उद्योग २३८५७ ४९५ १२
कृषि ४७७१ ३६७

किलो प्रति व्यक्ति का है। भारत में सबसे ज्यादा मात्रा में उपयोग होने वाले उत्पादों की सूची के प्रमुख तीन उत्पादों की क्रमवार सूची है – सब्जियां, दूध और चावल। हमारी खाद्य अर्थव्यवस्था बाकी की दुनिया से बिलकुल अलग है।
भारत की कृषि उत्पादन प्रणालियां भी अलग हैं। कृषि, बागवानी और मवेशी उत्पादों के विभिन्न प्रकार के उत्पादनों द्वारा देश के छोट खेतिहरों ( १.१६ हेक्टेअर तक के परिमाण वाले) का सम्पूर्ण वार्षिक कृषि उत्पादन, उस अमेरिका से भी ज्यादा है जहां व्यापक पैमाने पर औद्योगिक और पूंजी आधारित खेती को बढ़ावा दिया जाता है।

फसल और मवेशी उत्पाद की सामूहिक प्रणाली भारतीय कृषि की प्रधान विशेषता है। यह सामूहिक प्रणाली का ढांचा जैविक, पारिस्थितिकीय, पर्यावरणीय और सामाजिक लाभ को बहुगुणित कर देता है। यह उच्च संपोषणीय भी है।
भारत की फसलों की विभिन्नता विश्व में सर्वाधिक है। पिछले दो वर्षों में हुई अल्पवर्षा के कारण देश के कई राज्य सूखे की चपेट में हैं। २४६ जिलों के लगभग ३४ करोड़ लोगों पर इस सूखे की मार पड़ी है। देश भर में पानी की भारी किल्लत के कारण क्या अनाज की भारी कमी है? २०१६ में केंद्र सरकार का अनाज भंडारण (मुख्यतः चावल और गेहूं) अपने उच्चतम स्तर तक पहुंच गया था। ठीक है, दालों की उच्चतम कीमत की बात कही जा सकती है।पर क्या दालों की कमी के लिए मुख्य रूप से सूखे को ही जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? बिलकुल नहीं। ताजा समाचार रिपोर्ट यह है कि इस गर्मी में ग्रामीण इलाकों में गृहोपयोगी इलेक्ट्रानिक वस्तुओं जैसे फ्रीज, ए.सी. आदि की बिक्री में सौ प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। हमारी कृषि अनुमान से ज्यादा असमान और लोचदार है।

अब हम मुख्य प्रश्न की ओर लौटते हैं, कितने शिक्षित भारतीय इस सत्य से परिचित हैं और कृषि को उच्च वरीयता देते हैं? शायद बहुत थोड़े!
भारतीय कृषि के विषय में इन सुक्ष्म सत्यों का जन संचार होते ही लोगों की धारणा बदल जाएगी। यहीं से कृषि साक्षरता की आवश्यकता और प्रासंगिकता को बल मिलता है।

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