विस्थापित होने के बाद केवल अपनी कर्मठता, लगन और स्वाभिमान के बल पर संघर्ष से सफलता की यात्रा तय करने वाले बहावलपुरी समाज को आज भारतवर्ष में अपनी एक स्वतंत्र और गौरवशाली पहचान की अत्यंत आवश्यकता हैं।
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1947 अखंड हिंदुस्थान के विभाजन विभिषिका की पीड़ा आज भी किसी न किसी रूप में गूंजती है। हालांकि समय के साथ उस पीढ़ी के अनेक लोग शारीरिक रूप से इस दुनिया से विदा हो चुके हैं, परंतु आज भी नई पीढ़ी के भीतर जेनेटिकली कहीं न कहीं आवाज देती रहती है।
पहचान का संकट: सिंधी या पंजाबी?
विभाजन के दौरान अपने धर्म की रक्षा हेतु करोड़ों लोग भारत आए, जिसमें हिंदू और सिख विस्थापितों का विशेष उल्लेख मिलता हैं। जब भी विस्थापितों की बात होती हैं तो इतिहास की पुस्तकों और इंटरनेट (गुगल) पर पंजाबी, सिंधी, बंगाली और कश्मीरी समुदायों का उल्लेख प्रमुखता से मिल जाता हैं, परंतु इन्हीं विस्थापितों में एक ऐसा समाज भी था, जो गुमनामी में जीता रहा, जिसका नाम हैं ‘बहावलपुरी समाज’। विडम्बना यह रही कि इस समाज को प्राय: सिंधी या पंजाबी समझकर कई जगहों पर इनकी अनूठी पहचान तक को भुला दिया गया। कदाचित् आपने भी इस समाज का नाम पहली बार सुना हो।


हमारे आसपास सिंधी जैसी व्यक्तित्व रखने वाले, सिंधियों के समीप रहने वाले और उन्हीं की तरह व्यापार में ऊंचाइयों को छूने वाले लोग असल में सिंधी नहीं बल्कि बहावलपुरी हैं। त्रासदी यह है कि समय के साथ आज की पीढ़ी स्वयं को सिंधी समझ बैठी है और अपने रीति-रिवाज, समृद्ध भाषा, संस्कृति-सभ्यता को भूलती जा रही हैं। इस लेख का उद्देश्य इसी कर्मठ, परिश्रमी और शांतिप्रिय समाज की पहचान को विलुप्त होने से बचाना हैं।
इतिहास और भाषा: ’सिरायकी’ की मिठास
बहावलपुर रियासत (जो वर्तमान में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत का हिस्सा है) अपने समृद्ध वैभव, विशिष्ट बोली और अनूठे रीति-रिवाजों के लिए जानी जाती थी। इस रियासत और इसके आसपास रहने वाले लोग ही आज ’बहावलपुरी’ के नाम से जाने जाते हैं।
भाषा का संगम: बहावलपुरी मूल रूप से मुल्तानी और पंजाबी भाषा का मिश्रण हैं, जिसे ’सिरायकी’ या ’मुल्तानी’ के नाम से भी जाना जाता है।
पहचान की जंग: भारत में विस्थापित होने के बाद यह समाज जहां-जहां बसता गया, वहां की स्थानिक बोली और लोगों में घुलमिल गया। अधिकतर सिंधियों के साथ रहने से लोग इन्हें सिंधी समझने लगे और सिखों (सरदारों) के साथ रहने से इन्हें सिख समझा जाने लगा।

नए देश-परिवेश में स्वयं को स्थापित करने के लिए इस समाज ने अपनी पहचान को आड़े न आने दिया और जो नाम मिला, उसी के साथ शून्य से संघर्ष शुरू किया। खोई हुई लिपि ’किड़की’: बहावलपुरी केवल एक बोलचाल की भाषा नहीं थी बल्कि व्यवहार के लिए इसकी एक विशेष लिपि थी, जिसे ’किड़की’ कहा जाता था। आज इसके जानकार लगभग समाप्त हो चुके हैं (जैसे मेरे दादाजी को यह लिखनी आती थी)। व्यवहार में किड़की की लिखावट के दस्तावेज आज भी हैं और यह गहन शोध एवं संरक्षण-संवर्धन का विषय है।
व्यवसाय: सफलता की यात्रा: बहावलपुरी समाज स्वभाव से ही कूट-कूट कर कर्मठता से भरा है। इनकी व्यावसायिक और आर्थिक यात्रा हर किसी के लिए प्रेरणास्रोत हैं।
विभाजन से पूर्व: यह समाज बड़े पैमाने पर खेती और जमींदारी से जुड़ा था। सिंध और पंजाब प्रांत में पानी प्रचुर मात्रा में होने से खेती समृद्ध थी। ये लोग दिल्ली और मध्य प्रदेश तक अनाज बेचने आया करते थे।
शून्य से शुरुआत: केवल धर्म में आस्था और धर्म रक्षण के लिए अपना सब कुछ छोड़कर भारत आए इस समाज के हर परिवार का अपना एक संघर्षमयी इतिहास हैं। आज के कई बड़े उद्योगपतियों और धनवानों ने शुरुआत में हाथ-मजदूरी करके जीवनयापन किया और अपनी बुद्धि व अथक परिश्रम के बल पर शहरों के बड़े नाम बने।
प्रमुख कार्यक्षेत्र: वर्तमान में यह समाज कपड़ा व्यवसाय (टेक्सटाइल क्लोथिंग) में एक बहुत बड़ी और सफल छाप छोड़ चुका हैं। साथ ही किराना व्यापार में भी इस समाज के लोग बहुत सफल हैं।
महिलाओं का अतुलनीय योगदान: जिस तरह पुरुष वर्ग अपने परिश्रम के लिए जाना जाता है, वैसे ही बहावलपुरी महिलाएं भी विभाजन के पूर्व से ही बहुत श्रमशील रही हैं। घर सम्भालने के साथ-साथ वेऔर कपड़ों पर हाथ से की जाने वाली विशेष कलाकृतियों में महारत रखती हैं। आज की आधुनिक पीढ़ी शिक्षा और कॉर्पोरेट क्षेत्र में भी उत्कृष्ट सफलता प्राप्त कर रही है।
रीति-रिवाज और धार्मिक आस्था
भौगोलिक निकटता के कारण बहावलपुरी समाज के पहनावे और रीति-रिवाज पंजाब, सिंध और बलूचिस्तान से मिलते-जुलते प्रतीत होते हैं, परंतु इनकी अपनी एक विशिष्ट और प्रकृति-आधारित जीवन पद्धति है।

सर्वधर्म समभाव: यह समाज पंजाबियों के समीप होने के कारण गुरु ग्रंथ साहेब को श्रद्धापूर्वक मानता है और गुरुमुखी पढ़ता हैं। साथ ही भगवान शिव, माता रानी और आर्य समाज के प्रति इनकी अटूट आस्था हैं। लगभग हर बहावलपुरी क्षेत्र में आर्य समाज मंदिर अवश्य होता हैं। सिंधियों के करीब रहने से भगवान झूलेलाल के मंदिर और उन्हें मानने वाले भी बहुत से परिवार हैं।माघ अन्न पूजा: माघ महीने में विशेष रूप से ज्वार (अन्न) की पूजा की जाती है।
गोगा पूजन: श्रावण मास में स्वतः उत्पन्न होने वाले कांटे के पौधे की विशेष पूजा की जाती है।
प्रकृति का आभार: सावड़े में जलचरों (मछलियों व जीवों) को अन्न प्रदान कर प्रकृति का आभार माना जाता हैं। साथ ही हर पूर्णिमा पर नदी, कुओं और जल स्रोतों पर जाकर कृतज्ञता व्यक्त की जाती हैं।
सामाजिक व्यवस्था और पहनावा: समाज को एकसूत्र में पिरोने के लिए आज भी ’पंचायत’ और ’पंच’ की सुंदर व्यवस्था हैं, जो सामाजिक रीति-रिवाजों और रहन-सहन की देखरेख करती हैं। महिलाओं में पंजाबी सूट और पुरुषों में पहले पगड़ी, कुर्ता-पायजामा का चलन था, जिसकी जगह अब पैंट-शर्ट ने ले ली हैं।
धुलिया (धुले) का गौरव और ’बहावलपुरी दिवस’
आज यह समाज पूरे देश में फैला हुआ है- विशेष रूप से राजपुरा, पानीपत, सोनीपत, दिल्ली, सीहोर, बुधनी, नागपुर, अमरावती, जलगांव, अकोला और धुले (महाराष्ट्र) में, परंतु अपनी भाषा और संस्कृति को जीवंत रखने में महाराष्ट्र के धुलिया शहर और पंजाब के राजपुरा के बहावलपुरी समाज ने सर्वश्रेष्ठ कार्य किया हैं। यहां के छोटे बच्चे तक गर्व से आपस में बहावलपुरी भाषा में बात करते दिखाई देते हैं।

देश में अपनी अलग पहचान स्थापित करने के विचार से धुलिया शहर के ही कुछ ऊर्जावान युवाओं ने एक अनूठी पहल की और 13 अप्रैल को ’बहावलपुरी दिवस’ के रूप में मनाना घोषित किया। पिछले 12 वर्षों से यह दिन पूरे देश में बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता हैं। इसकी शुरुआत महाराष्ट्र के धुलिया शहर से हुई थी, जिसे देखकर अब अन्य राज्यों के बहावलपुरी भी प्रेरित हो रहे हैं।
इस दिवस पर गुरु ग्रंथ साहेब के अखंड पाठ से प्रारम्भ होकर 2 दिनों तक सांस्कृतिक कार्यक्रमों की चहल-पहल रहती हैं। अंतिम दिन पूरा समाज एकत्रित होकर सामूहिक भोज करता है। विशेष बात यह है कि इस दिन किसी भी बहावलपुरी घर में चूल्हा नहीं जलता, पूरा समाज एकसाथ मिलकर भोजन करता है, जो उनकी अटूट एकता और एकसंघ रहने की आदत का प्रमाण हैं।
समाज के देदीप्यमान रत्न
कला के क्षेत्र में: श्री गिरिजा शंकर जी, जिन्होंने दूरदर्शन के सुप्रसिद्ध और लोकप्रिय ’महाभारत’ धारावाहिक में महाराज धृतराष्ट्र की कालजयी भूमिका निभाई और अमर हो गए। राजनीति व प्रशासन में: श्री जगदीश मुखी जी, जिन्होंने असम राज्य के मा. राज्यपाल के रूप में देश और समाज की गरिमामयी सेवा की।
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मिलनसार स्वभाव के कारण समाज में हुए समरस
विभाजन होने के बाद धन-सम्पत्ति सब छोड़ कर केवल पत्नी-बच्चों को साथ लेकर हम यहां भारत आए। तब यहां पर भी हमारे साथ रिफ्यूजी जैसा व्यवहार किया गया और उसके बाद शहरों के बाहर हमारी अस्थाई कॉलोनियां बसा दी गई। सतत संघर्ष एवं मांग के कुछ समय बाद रहने की जगह मिल गई। हम जिस भी राज्य-प्रदेश में गए, वहां विपरित परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। उदाहरण के तौर पर महाराष्ट्र में हमारा अनुभव है कि व्यवसाय खड़ा करने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ा।
लोग हमें ताने मारते थे कि ये लोग रिफ्यूजी हैं, बाहर के देश से आए हैं, पाकिस्तानी है, परंतु हम धर्म रक्षण के लिए यहां आए क्योंकि हमें वहां पर बोला गया था कि मुसलमान बनो या फिर यहां से निकल जाओ तो हमने हिंदू रहना ही स्वीकार किया और फिर भारत में आ गए, परंतु यहां व्यवसाय करने के लिए हमारे पूर्वजों को बहुत प्रताड़ना सहन करनी पड़ी। भारत हमारा ही अपना देश हैं, यही मान कर हमने यहां पर अपने पैर जमाए और आज सभी लोगों ने हमें स्वीकार किया हैं, इस बात की हमें बहुत खुशी है, इसका श्रेय हमारे पूर्वजों को जाता है।
जिन्होंने अपनी कर्मठता, परिश्रम, शालीनता, सहनशीलता, शांत व मिलनसार स्वभाव से सभी का दिल जीता। किसी को उत्तर नहीं देना, झगड़ालूपन यह हमारे स्वभाव में ही नहीं था, इन्हीं स्वभाव एवं विशेषता के कारण हम भारतीय समाज में सहजता से घुलमिल गए। हमारा समाज अपनी प्रतिभा, परिश्रम, स्वयं व्यवसाय, रोजगार के माध्यम से समाज और राष्ट्र को स्वावलम्बी-आत्मनिर्भर बनाने के लिए अपना योगदान देता आया हैं।
वैद्य संजय सदाने

