अर्थव्यवस्था के लिये बेहतर वर्ष

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मुद्रा और मण्डी की स्थिति नया संवत्सर शुरु होने के बाद भी सुधरी नहीं है। जनवरी में यूरोपकी स्थिति उतनी डांवाडोल नहीं थी और अमेरिका भी धीरे-धीरे मंदी के दायरे से बाहर आ रहा है।

रुपये का अप्रत्यक्ष अवमूल्यन

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जहां केंद्र के सत्तारूढ़ दल को खतरा दिखाई दे रहा है। इसके बाद 2014 के चुनावों तक उसे कोई दिक्कत नहीं हेागी। सरकार ‘ठण्डा कर खाने’ की सोचेगी। जनता को तब तक ‘अंधेर नगरी, टकासेर भाजी टकासेर खाजा’ की स्थिति से निपटना होगा। जन लोकपाल विधेयक पारित होने के बाद अण्णा टीम भी सुस्त हो जाएगी।

बढ़ती महंगाई से संकट

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आने वाले दिनों में मुद्रा का संकट गहरा होने वाला है। यूरोप के ग्रीस जैसे ही इटली और स्पेन पर भी आर्थिक संकट गहराने का खतरा बढ़ता जा रहा है। ग्रीस की आर्थिक संप्रभुता अब खतरे में है। यूरोपीय बैंक उसे बचाने की कोशिश कर रहे हैं। परंतु, ग्रीस के नए बाँड्स खरीदने के लिए कोई तैयार नहीं है।

बैंक शेयरों में उछाल की उम्मीद

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दुनिया की अर्थनीति में मुद्रा और मंडी का बहुत महत्व है और भारत की अर्थनीति उससे अलग नहीं रह सकता। यूरोप के कई देशों में स्थिति हाथ से बाहर निकल गयी है। यूनान जैसे देशों को अतंरराष्ट्रीय मुद्रा निधि ने ज्यादा ऋण देने का प्रबंध किया है। लेकिन उससे फर्क नहीं पड़ेगा।

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