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वैश्विक स्तर पर अपने संगठन की क्रूरता ज्यादा से ज्यादा परिणामकारक स्वरूप में पहुंचाना ही आतंकवादी संगठन का प्रमुख उद्देश्य होता है़।  विश्व में जितने भी आतंकवादी संगठन हैं उनमें से आईएस आतंकवादी संगठन अपने आप को सभी आतंकवादी संगठनों से अधिक क्रूर जताने का हरदम प्रयास करता है। श्रीलंका की राजधानी  कोलंबो में तीन चर्च और पंचतारांकित होटलों में  कुल मिलाकर आठ  सीरियल धमाके करके आईएस ने सिर्फ श्रीलंका को ही नहीं संपूर्ण विश्व को एक गहरा संदेश देने का प्रयास  किया है। क्रिश्चियन  धर्मियों  के पवित्र उत्सव ईस्टर संडे के दिन ही ये अति  भीषण बम धमाके  किए गये  हैं। इन धमाकों के कारण मृतकों की संख्या  400 के आसपास हो गई है।

दक्षिण एशिया के एक शांत राष्ट्र के रूप में वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर श्रीलंका की पहचान बनती जा रही थी। शांति और नैसर्गिक सुंदरता के कारण  श्रीलंका  में पर्यटकों की संख्या दिन ब दिन बढ़ती जा रही थी। दुनिया के रत्न के रूप में श्रीलंका की नई  पहचान बन रही थी। तमिल अलगाववादी  गतिविधियां और  वर्ण द्वेष के कारण दो दशक तक  धधकता श्रीलंका  गृहयुद्ध  की स्थिति से  बाहर निकल रहा था।  दुनिया में  शांत और प्राकृतिक सुन्दरता से भरपूर राष्ट्र के रूप में अपनी छवि निर्माण कर रहा था। ऐसे समय में इस्लामी आतंकवाद ने इस देश को घेर लिया है।

श्रीलंका में हुए आतंकवादी हमले में धार्मिक द्वेष  की भावना स्पष्ट रूप में दिखाई देती  है। इस हमले की जिम्मेदारी लेते वक्त आईएस ने स्पष्ट कहा है कि न्यूजीलैंड में  क्रिश्चियन लोगों द्वारा मस्जिद में हमला करके  मुसलमानों को मारा गया,  उसी घटना का बदला श्रीलंका में  लिया गया है। जगविख्यात अमेरिकन विचारक  सैम्युअल हटिंगटन ने  1993 में विश्व के सम्मुख सिद्धांत रखा था कि “दो सभ्यताओं में संघर्ष शुरू हो गया है”। युद्ध दो देशों में होते हैं लेकिन भविष्य में होने वाले युद्ध दो सभ्यताओं में होंगे। इस्लामी आतंकवाद के कारण विश्व की शांति भंग होने का बड़ा संकट मंडरा रहा है। मध्य एशिया और अन्य देशों के प्रति अमेरिका का जिस प्रकार बर्ताव था उसे वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर अलकायदा द्वारा आतंकवादी हमला करके करारा जवाब दिया गया था। उसके बाद एक दूसरे पर हमले प्रति हमले का सिलसिला चलता रहा। इराक, अफगानिस्तान, सीरिया,  यमन  तक एक भयानक माहौल दिखाई दे रहा है। लेकिन अपने आपको अत्याधुनिक कहने वाले ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी  जैसे शक्तीशाली राष्ट्रों तक इस्लामी आतंकवाद ने अपनी पंख पसार लिए है। 15 मार्च को  न्यूजीलैंड में क्राइस्टचर्च की दो मस्जिदों  पर हमला कर  के मुस्लिमों को  रोंदने के लाइव वीडियो हमलावर ने  प्रसारित  किए थे। जिसमें 50 से ज्यादा मुस्लिम मारे गए थे। इसी के तुरंत बाद 10 साल से  शांति बरकरार रखने में कामयाब रहने वाले श्रीलंका के 3  पंचतारांकित होटलों  और तीन चर्च मे  मानवबम के द्वारा हमला किया गया। जिसमें 400 के आसपास श्रीलंकन और अन्य देशों के नागरिक अत्यंत बर्बरता से मारे गए। श्रीलंका में हुऐ इस  हमले के लिए नियोजन बद्ध तरीके से ईस्टर सन्डे का दिन चुना गया था। इस हमले को धार्मिक दहशतवाद से प्रेरित हमला ही कहा जा सकता है। इस हमले ने दो बातें  स्पष्ट कर दी हैं। जिन्होंने हमले को  अंजाम दिया वह श्रीलंकन मुस्लिम  परिवार अत्यंत धनसंम्पन्न परिवार था। बड़े व्यापारी के रूप में  उसका श्रीलंका में नाम  था। उस व्यापारी के दो युवा बेटे और  बहू जो कि गर्भवती थी, ने बम धमाकों को अंजाम दिया। दूसरी बात विश्व में धर्म युद्ध को भाषा, प्रान्त, राष्ट्र आदि की कोई सीमा नहीं रही गई है।

न्यूज़ीलैंड में हुई घटना का प्रत्युत्तर श्रीलंका जैसे शांत राष्ट्र में दिया जाता है। इससे यह बात महसूस होती है कि विश्व में अब कोई भी  राष्ट्र सुकून की जिंदगी नहीं जी सकता। तीसरा  सवाल जो अत्यंत महत्वपूर्ण है न्यूजीलैंड की घटना का जवाब श्रीलंका में ही क्यों? यूरोप एशिया अफ्रीका खंड में इस्लाम का विस्तार करने की महत्वाकांक्षा से उन्मादित इस्लामी समूह सिर्फ तलवारबाजी में अटक कर रह गया। तलवारबाजी के कारण अपने ज्ञान में वृद्धि नहीं कर पाया।  यूरोप में  मुस्लिमों की संख्या क्रिश्चियन  समुदाय से 10 -15 प्रतिशत कम थी। संख्या में कम इस्लाम धर्म को यूरोप में  अग्रस्थान पर लाने का सपना इस्लामी धर्म गुरुओं ने इस्लामी समुदाय के सम्मुख रखा। यही बात आईएस का अधिष्ठान बन गई। इस्लामिक स्टेट वैचारिक दृष्टिकोण से मध्ययुग में ही अटकी पड़ी है। इस्लाम के अनुयाई विश्व भर के काफीरों का विनाश कर के विश्व को इस्लाम में  तब्दील करने के  उद्देश्य से प्रेरित हो गए हैं। श्रीलंका में हुए हमले की जिम्मेदारी इस्लामिक स्टेट (आईएस) ने ली है। इसका मतलब यह होता है कि आईएस ने  अब अपनी गतिविधियों का केंद्र ईरान इराक  सीरिया से  हटा लिया है और अब दक्षिण एशिया क्षेत्र के गरीब मुस्लिम युवाओं को आतंकवाद की ओर आकर्षित करने का प्रयास हो रहा है। मालदीव और श्रीलंका में यह प्रयास अधिक जोर शोर से हो रहा है। इस विस्तार का पूरा श्रेय पाकिस्तान को जाता है। राजपक्षे के समय में श्रीलंका में चीन का प्रभाव बढ़ गया था। चीन के प्रभाव में आकर पाकिस्तान के साथ   श्रीलंका ने एक करार किया था।  उसमें पासपोर्ट के बीना पाकिस्तानी नागरिको को श्रीलंका में आने की अनुमति  देने  का करार हुआ था।  इस मौके का पाकिस्तान ने  भरपूर दुरुपयोग किया। इस्लामिक आतंकवादी संगठनों न आतंकवादी गतिविधियों का केंद्र सीरिया, इराक  अथवा यूरोप  से हटाकर दक्षिण एशिया में बनाने का प्रयास शुरू किया है। आईएस को अब नए लड़ाकों की जरूरत है। बिना अनुमति के श्रीलंका में घुस आए पाकिस्तानी नागरिक बात को अंजाम देने में बड़े सहायक हो रहे हैं। ‘नेशनल  तौफिक जमात’ इस स्थानीय आतंकवादी संगठन ने  धमाकों को अंजाम दिया है।   आईएस जैसे एक अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी संगठन और  ‘नेशनल तौफिक जमात’ जैसे स्थानीय आतंकवादी संगठन ने धार्मिक द्वेष भाव से  इन बम धमाकों को अंजाम दिया है। इस  हमलों में हुई जीव हानी को ध्यान में रखकर यह कहा जा सकता है कि यह 2019  का सबसे बड़ा आतंकवादी हमला है। श्रीलंका में बौद्ध  राजनीति का विरोध करने में ‘नेशनल  तौफीक जमात’ सक्रिय है।

श्रीलंका की कुल जनसंख्या 2 करोड़ 60 लाख के आसपास है। उनमें 70%  स्थानीय सिंहली बौद्ध  धर्म के हैं। 12  प्रतिशत हिंदू है। 7%  क्रिश्चन है और 7% मुस्लिम है। 1948 में ब्रिटिशों की गुलामी से  उस समय के सिलोन को मुक्ति मिल गई थी। स्वतंत्रता मिलने के कुछ वर्ष बाद ही वहां के  सिहली समुदाय ने  तमिल समुदाय को सभी आवश्यक बातों से बेदखल कर दिया। असंतुष्ट तमिल  समुदाय ने आर्मी लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल इलम अर्थात एलटीटीई की स्थापना की।

 

सिंहली  और  बुद्ध  श्रीलंकन सैनिकों ने 2009 में एलटीटीई नेता प्रभाकरण को  मार कर  एलटीटीई का  पूर्णत: सफाया कर दिया। 1988 से 2009 तक चले इस युद्ध में दोनों तरफ से एक दूसरे पर बहुत अत्याचार किए गए। कुल मिलाकर  इस युद्ध में 6 लाख  नागरिक मारे गए। पिछले कुछ वर्षों में श्रीलंका की आर्थिक स्थिति प्रति वर्ष केवल 4% से बढ़ रही है। श्रीलंका की   मुद्रा का भी अवमूल्यन हुआ है। वर्तमान में अंतर्राष्ट्रीय कोष का बकाया देने में श्रीलंका असमर्थ है। चीन की बकाया राशि देने में श्रीलंका असमर्थ रही है इसी कारण श्रीलंका ने अपना हंबनटोटा बंदर और 15000 एकर कृषि जमीन चीन को दे दी है। एलटीटीई का बंदोबस्त करते समय  श्रीलंका के तत्कालीन अध्यक्ष महिंद्र राजपक्षे ने मानवअधिकारों की बिल्कुल परवाह नहीं की। श्रीलंका में 10 प्रतिशत  मुसलमान है। एलटीटीई और मुसलमान एक दूसरे के साथ रह कर श्रीलंका सरकार के साथ आतंकवादी खेल खेलते थे।  एलटीटीई का सरगना प्रभाकरण मारे जाने पर श्रीलंका में  बौद्ध समुदाय का प्रभाव बढ़ गया और बुध्द समुदाय ने मुस्लिम समुदाय पर अपना शिकंजा कसने का प्रारंभ किया। बीते पांच सालों में  हर साल मुसलमान और  बौद्ध  समुदाय मे  हिंसक दंगे होते रहे हैं। आतंक का दबदबा तब बढ़ता है जब देश के अंदर नागरिकों में आपसी मतभेद होता है। उसी  अंदरुनी नाराज़गी को हथियर बनाकर  इस्लामी कट्टरपंथ के बीज बोए जाते हैं।  इसी बात को ध्यान में लेकर “नेशनल तौफीक जमात” के नेताओं ने बेकाबू भाषण बाजी करना प्रारंभ किया। “श्रीलंका में जो गैरमुस्लिम है, उन काफिरों को नष्ट करो” इस प्रकार का धार्मिक उन्माद से भरा आवाहन करने वाले वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने लगे। श्रीलंका के मुस्लिम युवाओं को इस्लाम के नाम पर बहला-फुसलाकर  धर्म के लिए मर मिटने वाली ल्वाकों में परिवर्तित किया जा रह है। इसी के कारण श्रीलंका से  आईएस में जिहादी  बनकर जाने वाले युवाओं की संख्या ज्यादा है। श्रीलंका में इस्लामी धर्म गुरुओं के माध्यम से  जहरीला प्रचार किया जाता था। लेकिन इस्लामी धर्म गुरुओं पर शिकंजा कसने की जरूरत श्रीलंका की सरकार को  महसूस नहीं हुई।  श्रीलंका में  इस्लाम का प्रभाव ‘दिन दूनी और रात चौगुनी’ गति से बढ़ रहा है इस बात की आशंका भारत ने पिछले साल ही श्रीलंका के सम्मुख जताई थी। पूरे विश्व को आतंकवादी माहौल में लाने वाले इस्लामी मानसिकता और गतिविधियों को नजरअंदाज करने वाली श्रीलंकन सरकार की  भूमिका ही  राष्ट्र के प्रति बेफिक्री की भावना प्रकट करती है। वर्तमान में आतंकवादी हमले हर कहीं होते ही रहते हैं। ऐसे में  वहां की सरकार  आतंक के विरोध में किस  प्रकार सजगता रखती  है, आतंक के विरोध में किस प्रकार से कदम उठाती है, यह बात अत्यंत महत्वपूर्ण है। श्रीलंका की पुलिस और गुप्तचर यंत्रणा इस  पर नियंत्रण ला सकती थी।  भारत  ने श्रीलंका को  होने वाले हमले के संदर्भ में सूचित किया था। लेकिन यह बात  श्रीलंका के प्रधानमंत्री  रनील विक्रमसिंघे तक पहुंची ही नहीं। इस बात से यह महसूस होता है श्रीलंका  सरकार में आपसी संपर्क नहीं है। और यह सच्चाई है, कि आज श्रीलंका राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री  दोनों के बीच की अस्थिरता में डूबा है।

आज श्रीलंका आतंकवादी माहौल में पिस रहा है। इस्लामिक स्टेट किस प्रकार का भीषण  आतंकवादी उपद्रव फैला सकती है यह बात भी दुनिया के सामने आई है।  भारत के तमिलनाडु  में  भी ‘नेशनल  तौफिक  जमात’ के लोग मौजूद है। इसके साथ बांग्लादेश और  म्यानमार में भी इस संगठन का अस्तित्व  महसूस होता है।  दक्षिण एशिया की भूमि पर इस संगठन के द्वारा हो रही गतिविधियों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसे  संगठनों  के आतंक से दक्षिण एशिया और साथ में भारत को भी मुक्त करना अत्यंत आवश्यक है। इस विचारधारा के खिलाफ दक्षिण एशिया के सभी देशों ने एकजुट होकर कदम उठाने की आवश्यकता है। दक्षिण एशिया के लिए अब आतंकवाद सबसे बड़ा मुद्दा है क्योंकि आईएस जैसे संगठन ने अपनी गतिविधियों का रुख अब दक्षिण एशिया की ओर किया है। सार्क परिषद में  एकजुट और एक दिल होकर आतंकवाद को हम किस प्रकार से   परास्त कर सकते हैं,  इस पर विचार होना अत्यंत आवश्यक है। सीरिया में नाकाम होने पर आईएस  विश्व को अपना अस्तित्व दिखाने के लिए फड़फड़ा रहा है। ऐसे में दक्षिण एशिया की भूमि को इस्लामी आतंकवाद की रणभूमि बनाने का प्रयास आईएस करेगा। आईएस को सफल होने देना है या पूरी तरह से परास्त करना है। इसका फैसला करने के लिए एशियाई देशों को एकजुट होकर  एक दिल से काम करना अत्यंत आवश्यक है। आतंकवाद के विरोध में अपनी  निश्चित भूमिका के साथ  सभी को खड़ा करने में तथा आतंकवाद को परास्त करने में भारत की भूमिका अहम होगी।

This Post Has One Comment

  1. आतंकवादी हमलो के खतरे से एशिया महाद्वीप के देशों को यदि बचना है और सुरक्षित रहना है तो उन्हें यूरोपीय यूनियन की तर्ज पर एकजुट होना ही होगा।एक दम सटीक लेख,,,👌👌👌

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