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***रवींद्र गोले*** 
किसी आंदोलन को प्रगतिपथ पर ले जाने का काम नेता से ज्यादा उसके सहयोगी कार्यकर्ता सक्षमता से करते हैं। कोई आंदोलन या अभियान इसलिए जोर पकड़ता है क्योंकि कार्यकर्ता विचारों का वाहक है। इसका उदाहरण है कि डॉ. आंबेडकर का आंदोलन। १९२४ से डॉ. बाबासाहब आंबेडकर सामाजिक जीवन में आंदोलन जारी रहा। उससे पहले जब कुछ लोगों ने कोंकण के हरिजन बंधुओं की सभा लेने की सोची तब उन्होंने उसमें शामिल होने के लिए इन्कार किया था। उन्होंने कहा था, ‘हमें सभा नहीं चाहिए। हम सार्वजनिक कामों में दखलअंदाजी नहीं करेंगे, हम हायकोर्ट के जज बनेंगे।’ पर अपनी ही बात को उन्होंने आगे चलकर झुठला दिया। १९२४ के आसपास ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ की स्थापना कर अछूतता तथा जातीयता का विरोध किया। तब से १९५६ तक बाबासाहब ने अनेक आंदोलन चलाए और अपने हितैषियों के बल पर सफल बनाए।
‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ के सीताराम नामदेव शिवतरकर का नाम लिए बगैर आगे बढ़ना असंभव है। शिवतरकर पहले बाबासाहब के निजी सहायक थे। बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना करने के बाद बाबासाहब ने उनको सेक्रेटरी बनाया। ‘महाड सत्याग्रह कमिटी’ के वे जनरल सेक्रेटरी थे। १९२२ में ‘भारतीय शिक्षण प्रसारक मंडल’ की स्थापना बाबासाहब ने की। उस संस्था के व्यवस्थापक और कोषाध्यक्ष शिवतरकर थे। ‘गोलमेज परिषद’ के लिए जाते समय उन्होंने पूरा आंदोलन और पारिवारिक जिम्मेदारी शिवतरकरजी को सौंपी थी। बाबासाहब को खत लिखते समय शिवतरकर ‘प्रिय दादा भीमराव’ लिखते थे, तो बाबासाहब उनको ‘प्रिय शिवतरकर मास्टर’ लिखते थे। समता का प्रचार-प्रसार करने के लिए ४ सितंबर १९२७ को बाबासाहब ने ‘समता समाज संघ’ की स्थापना की। यह काम अपनी जिम्मेदारी समझकर हर-एक ने अपने घर स्नेह भोजन की व्यवस्था करने की सोची। १९२८ में शिवतरकर के घर स्नेह भोजन का आयोजन हुआ। उसमें हरिजन, कायस्थ, भंडारी, मराठा, ब्राह्मण सदस्य भी थे। आंबेडकर के आंदोलनों में मास्टरजी का वर्चस्व कुछ लोगों से नहीं देखा गया। चर्मकार समाज ने उन्हें बहिष्कृत कर दिया। १९३७ के बाद शिवतरकर सामाजिक आंदोलनों से ज्यादा राजनीतिक आंदोलनों में सक्रिय हुए, पर बाबासाहब से दोस्ती हमेशा रही।
महाड के ‘चवदार’ नामक तालाब के आंदोलन के समय पुणे के ब्राह्मणेतर आंदोलन के मुखिया जवलकर ने बाबासाहब के सामने प्रस्ताव रखा, ‘आपके साथ रहनेवाले ब्राह्मण कार्यकर्ताओं से आप दूर रहें, तभी हम आपका साथ देंगे।फ बाबासाहब ने कहा था, ‘मैं ब्राह्मणों का विरोध नहीं करता, ब्राह्मणत्व का करता हूं।’ महाड चवदार तालाब के सत्याग्रह के समय पोलादपुर, जिला-रायगड के अनंतराव विनायक चित्रे जी संगठक थे। बाबासाहब के ‘जनता’ इस समाचार पत्र के चित्रे जी संस्थापक थे। १९३६ के बाद उन्होंने संपादक पद की जिम्मेदारी संभाली। महाड सत्याग्रह, नाशिक सत्याग्रह, येवला धर्मांतर परिषद, खोती विधेयक को लेकर किसानों मोर्चा इत्यादि आंदोलनों में वे अग्रसर रहे। डॉ. बाबासाहब के दलित-मुक्ति और समता स्थापना के काम में अनंतराव ने जी-जान से व निष्ठा से काम किया। खोती विरोधी आंदोलन का प्रचार करने के लिए उन्होंने कोंकण के गांवों में किसान-सभाएं लीं।
गंगाधर नीलकंठ सहस्त्रबुद्धे डॉ. आंबेडकर और उनके सहयोगियों में बापूसाहब सहस्त्रबुद्धे के नाम से जाने जाते थे। समता समाज संघ के वे प्रमुख कार्यकर्ता रहे। डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में महाड में हुए सत्याग्रह परिषद में बापूसाहब ने सवर्ण लोगों की प्रवृत्ति तथा मनुस्मृति की विषमता पर टिप्पणी की। इतना ही नहीं बल्कि मनुस्मृति दहन का प्रस्ताव भी रखा। २५ दिसंबर १९२७ को परिषद के मंडप में सहस्त्रबुद्धे ने मनुस्मृति जला दी। डॉ. आंबेडकर द्वारा स्थापित किए गए ‘म्युनिसिपल मजदूर संघ’ के वे सचिव थे। कुछ समय तक वे ‘जनता’ साप्ताहिक के संपादक थे। डॉ. आंबेडकर के सहयोगी थे सुरेंद्र गो. टिपणीस। उन्हें सब नानासाहब टिपणीस कहते थे। वे मूलत: महाड के रहिवासी थे। वे महाड में वकील थे। १९२४ में वे महाड नगरपालिका में चुने गए। सार्वजनिक हौज, (नदी) कुएं, सराय तथा मंदिरों में दलितों को प्रवेश मिले यह कानून १९२६ में पास हुआ। उस पर अमल करने के लिए सुरबा नाना अर्थात टिपणीस ने कोशिशें शुरू कीं। उसी से चवदार तालाब सत्याग्रह ने जोर पकड़ा। १९३७ में बाबासाहब द्वारा स्थापित ‘स्वतंत्र मजदूर पक्ष’ के वे संगठक थे। १९५७ के संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन में सुरबा नाना ने सक्रिय योगदान दिया। डॉ. बाबासाहब आंबेडकर और सुरबा नाना का स्नेह प्रदर्शित करनेवाले प्रसंग प्रकाशित हुए हैं। सुरबा नाना कहते हैं कि बाबासाहब कपड़ों के शौकिन थे। एक बार महाड आने पर कहने लगे, ‘सुरबा यह सूट बिलकुल नया है, मुझे फिट नहीं बैठता, तुम इसे रख लो।’ और वह सूट उन्होंने मुझे दे दिया। इस तरह वे स्वयं और उनके सहयोगी भी अच्छे ही कपड़े पहने ऐसा वे चाहते थे।
इसी प्रकार दूसरा प्रसंग वर्णन करते समय सुरबा नाना टिपणीस ने लिखा है। ‘मैं और डॉक्टर गपशप कर रहे थे तब धर्मांतर की जरूरत है? क्या वह निधर्मी बनकर समाज में रह नहीं सकता।’ इस पर डॉ. बाबासाहब ने विश्वासपूर्वक कहा, ‘मानव को धर्म की जरूरत है, किसी न किसी धर्म पर विश्वास किए बगैर वह जी नहीं सकेगा।’ बाद में मैंने पूछा, ‘जिस तरह प्रचलित धर्म अलग-अलग व्यक्तियों ने स्थापित किए और अपने तरीके से उसका प्रसार किया उसी प्रकार आप के तत्वों पर आधारित धर्म की स्थापना और प्रचार आप क्यों नहीं करते?’ इस पर उनका उत्तर था, ‘सुरबा, मैं धर्म स्थापन करने की योग्यता रखता हूं, फिर भी मैं एक हींग का बोरा बन गया हूं। जिस समाज-रचना में मैं पल-बढ़ रहा हूं उस समाज-रचना में मेरा दर्जा कनिष्ठ है, इसलिए मैं धर्म-संस्थापक नहीं बन सकता।’
डॉ. बाबासाहब को उच्च वर्णीय मित्रों का लाभ हुआ। मित्रों ने अपनी स्वयं की जाति से परे रहकर समता स्थापित करने के लिए डॉक्टर साहब को आंदोलन में सहयोग दिया। कुछ आंदोलन तो ऐसे ही कार्यकर्ताओं के बल पर चल पड़े। उसमें महत्वपूर्ण है नासिक के ‘काला राम मंदिर के प्रवेश’ का आंदोलन। यह तीन साल तक जारी रहा। दादासाहब गायकवाड ने उनका नेतृत्व किया। नाशिक के कालाराम मंदिर में हरिजनों को प्रवेश मिले इसलिए यह आंदोलन था। इस आंदोलन के पीछे अपने विचारों की ताकद और मार्गदर्शन आंबेडकरजी का था। हर बार सनातन विचारों वालों का सामना किया दादासाहब गायकवाड जी ने। आंदोलन में कर्मवीर के नाम से जाने जाते थे। ये मूलत: नाशिक जिले के रहिवासी थे। बाबासाहब के संपर्क में आए और उनका दाहिना हाथ बने। अनेक महत्वपूर्ण निर्णय लेना, उन पर अमल करना, इसमें दादासाहब गायकवाड का हाथ है। डॉ. आंबेडकर जब गोलमेज परिषद के लिए गए, तब उनकी भूमिका का समर्थन करनेवाले हजारों पत्र दादासाहब ने समाज के द्वारा लिखवाए। डॉ. बाबासाहब आंबेडकर के विचारों का अनुशीलनकर्ता तथा प्रसारकर्ता के तौर पर दादासाहब गायकवाड जाने जाते हैं। बाबासाहब के पश्चात उनका राजनीतिक आंदोलन आगे ले जाने में दादासाहब आगे रहे। संसद और राज्यसभा में प्रतिनिधित्व किया।
डॉ. बाबासाहब को सामाजिक, राजनीतिक आंदोलन में अनेक निष्ठावान सहयोगी मिले। उनके आंदोलन में अनेकों ने तन-मन-धन लगा दिया। उनमें से एक महत्वपूर्ण नाम है ‘श्रीयुत मनोहर भिकाजी चिटणीस’। जिला सिंधुदुर्ग में उनका जन्म हुआ था। बाबासाहब के नज़दीकी, विश्वसनीय सहयोगियों में उनकी गणना होती थी। उन्होंने खालसा कॉलेज, सिद्धार्थ कॉलेज में पढ़ाया। वे खालसा कॉलेज में थे, तब बाबासाहब ने शिक्षा-संस्था खोलने का मनोदय जाहिर किया था। प्रो. चिटणीस ने उत्साहित होकर सहयोग दिया। सिद्धार्थ महाविद्यालय और औरंगाबाद महाविद्यालय की स्थापना करने के पीछे इनका बड़ा योगदान है। उनके द्वारा लिखित ‘युगयात्रा’ नाटक बाबासाहब की उपस्थिति में खेला गया। संत चोखामेला से लेकर डॉ. आंबेडकर तक की वेदना और पीड़ा दर्शाने की कोशिश की। डॉ. बाबासाहब आंबेडकर लिखित ‘बुद्ध और उसका धम्म’, मूल अंग्रेजी किताब का अनुवाद चिटणीस और तलवलकर ने किया था। १९५० से १९५६ तक बाबासाहब के जीवन के आखिरी दौर में वे ज्यादातर नानकचंद रट्टू के साथ रहे। बाबासाहब का साथ उनको ज्यादा मिला। बाबासाहब जब दिल्ली में थे, तब नानकचंद उनके यहां टायपिंग करते थे, बाबासाहब का व्यक्तिगत काम भी करते थे। वे पंजाब के होशियारपुर में जन्मे थे। ५ दिसंबर १९५६ के दिन रात के ११.३० बजे तक नानकचंद बाबासाहब से मिले थे। रात को बाबासाहब का महापरिनिर्वाण हुआ। टायपिंग, पत्र लिखना आदि काम नानकचंद किया करते थे। बाबासाहब ने उनको इस काम के लिए ७५ रुपये देना तय किया था, पर इसे लेने से उन्होंने मना किया था।
बाबासाहब के एक और निष्ठावान सहयोगी हैं ‘वामनराव गोडबोले’। वे मूलत: नागपुर के रहिवासी थे। नागपुर में बाबासाहब के विचार उन्होंने दूर दूर तक पहुंचाने की कोशिश की। जब बाबासाहब ने धम्म दीक्षा के लिए नागपुर जैसा स्थल निश्चित किया तब वामनरावजी ने वहां की देखरेख का काम सफलता से पूरा किया। ब्रह्मदेश से महापेराना को लाना और उनको धम्म दीक्षा समारोह में सम्मिलित करवाने के लिए वामनराव गोडबोलेजी ने इंतजार किया। नागपुर के साथ विदर्भ में अन्य स्थलों पर भी धम्म दीक्षा के कार्यक्रम संपन्न हुए। उसका नेतृत्व भी वामनरावजी ने ही किया था।
इस प्रकार बाबासाहब आंबेडकर को अनेकों निष्ठावान सहयोगियों का लाभ मिला। उनके विचार और आंदोलन फलने-फूलने में मदद मिली। दीपस्तंभ की तरह उनका मार्गदर्शन और ऊंचा व्यक्तित्व, उनके साथ काम करनेवाले निष्ठावान कार्यकर्ताओं का सुंदर मिलाप हुआ, समन्वय हुआ। परिणामस्वरूप स्वतंत्रता के बाद समाज पर उसने अपनी विशिष्ट छाप छोडी। समाज पर अनुकूल असर हुआ।
कोई भी आंदोलन केवल नेता के विचारों पर अथवा कार्य पर अवलंबित नहीं होता। उसके विचार, कार्य समाज के आखरी स्तर तक ले जानेवाले कार्यकर्ताओं पर आंदोलन की सफलता निर्भर होती है। डॉ. बाबासाहब आंबेडकर का आंदोलन समाज, धर्म और शिक्षा इन तीनों स्तर पर कार्यरत था। प्रत्यक्ष कार्य से उनके विचारों को साकार करनेवाले अनेकों सहयोगी उनके साथ थे। इन सहयोगियों की विशेषता यह है कि उन्होंने अपनी जाति एक तरफ रख दी और बाबासाहब आंबेडकर के अनुसार समता स्थापित करने के लिए बाबासाहब का साथ दिया।
मो.: ९५९४९६१८६०
 

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