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अंग्रेजी एजुकेशन सिस्टम हमें गिटिर-पिटिर अंग्रेजी बोलनवाले ग्रेजुएट देगी, जो चाय कीदुकानों पर जॉबलेस रह कर सिर्फ देश की बदहाली पर चर्चा करते मिलेंगे। वास्तविकता के धरातल पर वह देशहित में योगदान देने में असमर्थ होंगे। आज हम उसी दौर में शामिल हो गए हैं।

एक बार फिर से रिजल्ट्स का दौर आ गया है। सीबीएसई, आइसीएसई, स्टेट बोर्ड, एक-एक करके सभी अपने परीक्षा परिणामों की घोषणा कर रहे हैं।

”मेरे बेटे ने 96% मार्क्स स्कोर किया…. मेरी बिटिया 99% मार्क्स के साथ स्टेट टॉपर हुई…… मेरी भतीजी साइंस में 100 में से 100 मार्क्स लाई….. मेरे भांजे ने कंप्यूटर में पूरे स्कूल में टॉप किया।” पिछले कुछ दिनों से पूरा सोशल मीडिया ऐसे पोस्ट्स से भरा पड़ा है। यहां तक कि ट्विटर और इंस्टाग्राम पर भी कई दिनों तक बोर्ड रिजल्ट 2019 का हैशटैग ट्रेंड करता रहा।

वाकई रिजल्ट्स का यह दौर बच्चों के साथ-साथ उनके अभिभावकों के लिए भी बेहद टेंशन भरा होता है, क्योंकि कुछ लोग इसे अपनी आन-बान-शान से जोड़कर देखते हैं।

कहीं खुशी, कहीं गम

हर साल ये एक्जाम रिजल्ट्स कुछ बच्चों और उनके साथ-साथ उनके अभिभावकों के चेहरे पर भी गर्वीली मुस्कान लेकर आते हैं; तो कुछ के लिए उदासी और अवसाद की वजह। जो बच्चे सफल होते हैं अर्थात वर्तमान कसौटी के अनुसार 90 फीसदी से ऊपर अंक लानेवाले (हम स्टेट बोर्ड वाले बच्चे इतने मार्क्स लाने की तो कभी कल्पना भी नहीं कर सकते थे), उनके घर मिठाइयां बंटती हैं। अड़ोसी-पड़ोसी और मुहल्लेवाले उन्हें बधाइयां देने आते हैं। वहीं दूसरी ओर जो बच्चे औसत अंक से पास हुए होंगे यानी 80 फीसदी या इससे कम अंक लानेवाले (इतने में तो हमारे समय में बच्चे स्टेट टॉपर बन जाते थे), उन्हें दिन-रात ताने मिल रहे होंगे (भले ही सोशल मीडिया पर उनके अभिभावक उन्हें गले लगाए अपनी तस्वीरें क्यों न पोस्ट कर रहे हों)- ”कहा था साल भर पढ़ाई कर लो, पर तुम्हें तो पेंटिंग/डांसिंग/फोटोग्राफी/घूमने से फुर्सत मिले तब ना। अब हो गया न रिजल्ट खराब।”

इतना ही नहीं कुछ अभिभावक टॉपर्स बच्चों से अपने बच्चों की तुलना करके उन्हें कमतर महसूस करवाने से भी पीछे नहीं हटते- “शर्मा जी के बेटे/बेटी को देखो, कितने अच्छे अंकों से पास हुआ/हुई है। तुमने तो मुहल्ले भर में मेरी नाक कटवा दी।”  अब जाहिर-सी बात है कि कुछ बच्चे पास हुए हैं, तो कुछ फेल भी होंगे। ऐसी स्थिति में उन बच्चों के बारे में तो सोच कर ही जी घबराता है कि इस घोर प्रतिस्पर्द्धी माहौल में उन पर क्या बीतती होगी।

अधिकतर बच्चे होते हैं औसत बुद्धिवाले

आखिर ऐसे बच्चों के माता-पिता यह क्यों नहीं समझते कि सभी बच्चों की रुचि, योग्यता, बौद्धिक क्षमता, अभिव्यक्ति का स्तर आदि एक समान तो हो नहीं सकता। मनोविज्ञान भी कहता है कि 100 में से करीब 70 फीसदी बच्चे औसत बुद्धि के होते हैं। बाकी के 10 फीसदी तीव्र बुद्धि और 20 फीसदी औसत से कम या मंद बुद्धि के होते हैं। ऐसे में हर बच्चे से ‘धाकड़’ होने की उम्मीद करना बेमानी है।

दूसरी ओर, किसी भी बच्चे की बौद्धिक क्षमता के विकास पर उसके परिवार, समाज, परवरिश, गर्भावस्था की परिस्थितियों सहित अन्य कई वातावरणीय कारक- यहां तक कि मौसमी अनुभवों का भी प्रभाव पड़ता है। अत: यह कहना कि आपके बच्चे का पढ़ने-लिखने में मन नहीं लगता या फिर वह ‘बेवकूफ’ है, सही नहीं होगा। कई बार सारी सुख-सुविधाएं मिलने के बावजूद अगर कोई बच्चा पढ़ाई में पिछड़ रहा हो, तो इसके लिए उसे डांटने-फटकारने के बजाय पहले उसके पीछे निहित वजहों को जानने-समझने की जरूरत है।

हालांकि कई बच्चों के रिजल्ट्स खराब होने की एक बड़ी वजह आजकल स्मार्टफोन भी है, जिसमें बच्चे दिन-भर अपना सिर घुसाए रहते हैं, लेकिन यहां हम उन बच्चों की चर्चा नहीं कर रहे, क्योंकि उस समस्या के भी कई सारे पहलू हैं।

हर बच्चा होता है स्पेशल

अगर आपको लगता है कि जिन बच्चों को कम अंक आए हैं, वे कमजोर हैं, तो आपका ऐसा सोचना बिल्कुल गलत है। किसी भी व्यक्ति-विशेष की शिक्षा का आकलन उसके प्राप्तांकों से करना निहायत ही बेवकूफी है। जरूरी नहीं कि हर बच्चा पढ़ाई में ही धाकड़ हो। कुछ बच्चे खेल में, कुछ बच्चे कला के क्षेत्र में, तो कुछ बच्चे अन्य किसी क्षेत्र में उन बच्चों से कहीं बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं, जिन्होंने 90 या इससे अधिक अंक प्राप्त किए हैं।

अत: अभिभावक न तो खुद दबाव में आएं और न अपने बच्चों पर कम मार्क्स लाने की वजह से दबाव बनाएं। उन्हें यह समझने की जरूरत है कि परीक्षा और अंकों के आगे भी दुनिया में काफी कुछ है देखने, जानने और करने के लिए। जिंदगी की पाठशाला इससे कहीं अधिक ऊंची और बड़ी है, जिसे समझने के लिए इन कोरे अंकों की नहीं, बल्कि अनुभव की जरूरत होती है। अत: कम मार्क्स वाले बच्चों को अपने रास्ते खुद चुनने दीजिए। हो सकता है जिंदगी की पाठशाला में अपने अनुभवों से उन्हें इससे कुछ बेहतर हासिल हो जाए।

अंक लानेवाली मशीन नहीं हैं बच्चे

बच्चों में भरपूर कल्पनाशीलता और सीखने की इच्छा होती है, लेकिन वर्तमान शिक्षा प्रणाली, लंबा-चौड़ा पाठ्यक्रम, बच्चों के वजन से भारी बस्ते और आज का बोझिल शिक्षातंत्र। ये सब मिल कर बच्चों के अंदर की छुपी प्रतिभा को कहीं गायब कर देते हैं। इसी वजह से आज के दौर के ज्यादातर बच्चे इस भेड़चाल में शामिल होकर सिर्फ मार्क्स लानेवाली मशीन बन कर रह गए हैं। उनकी असली प्रतिभा तो शायद ही कभी उभर कर सामने आ पाती है। वह कहीं किसी कोने में दुबक कर रह जाती है और बच्चों का पूरा बचपन अपने अभिभावकों की अपेक्षाओं को पूरा करने में ही बीत जाता है।

जरूरत है उन्हें बिना शर्त प्यार और सम्मान देने की

मुश्किल और अनिश्चितता की इस घड़ी में आपके बच्चों को सबसे ज्यादा जरूरत है आपके प्यार और भरोसे की। आपको विपरीत परिस्थितियों में भी कदम-से-कदम मिलाकर उनके साथ चलना होगा। केवल अभिभावकों को ही नहीं, बल्कि आसपड़ोस, नाते-रिश्तेदार सभी को उन्हें भरपूर सपोर्ट और प्यार देना होगा, ताकि किसी भी बच्चे को निराश होकर आत्महत्या जैसा भयावह कदम न उठाना पड़े। आपके नि:स्वार्थ प्रेम के दम पर ये लोग एक दिन जरूर दुनिया जीतेंगे।

हार और जीत जिंदगी का हिस्सा है

उन्हें यह समझाएं कि निराश नहीं होना है। न ही अपने अंदर नकारात्मकता समाहित करके गलत कदम उठाना है। हारना-जीतना तो जिंदगी का एक हिस्सा है। हमें बस जरूरत है, सही समय पर उनसे सही सीख लेने की और निरंतर अपने ईमानदार प्रयास जारी रखने की। ऐसा करने से आज जो हारा है, वह निश्चित रूप में कल जीतेगा। हमें हर राह पर अपनी दृढ़ता का प्रदर्शन करना होगा, बाकी इस तरह की छोटी-मोटी बाधा रूपी लहरें तो आती ही रहती हैं हमारे धैर्य एवं संयम की परीक्षा लेने के लिए, असली शिक्षा तो संस्कारों को प्रदर्शित करती है। हमारे अंदर कितनी कमियां रह गई हैं, हमें इस बात का आभास कराता है।

अभी समय है। आप बहुत कुछ प्राप्त कर सकतें हैं। निराश न हों। अपने अंदर जीतने की चाह को कभी खत्म न होने दें। यह होनी भी नहीं चाहिए। किसी की उम्मीद के मुताबिक परिणाम न आने पर कुंठित न हों।

शिक्षातंत्र में हैं सुधार की जरूरत

महात्मा गांधी ने अपनी पत्रिका हरिजन में लिखा था कि अंग्रेजी एजुकेशन सिस्टम हमें गिटिर-पिटिर अंग्रेजी बोलनवाले ग्रेजुएट देगी, जो चाय कीदुकानों पर जॉबलेस रह कर सिर्फ देश की बदहाली पर चर्चा करते मिलेंगे। वास्तविकता के धरातल पर वह देशहित में योगदान देने में असमर्थ होंगे। आज हम उसी दौर में शामिल हो गए हैं। आज जिस गति से देश-दुनिया की आबादी बढ़ रही है और उसके अनुकूल संसाधनों की पर्याप्तता पर प्रश्नचिह्न लग रहा है, ऐसे में क्या हम इस वर्तमान शिक्षा प्रणाली के सहारे समग्र विकास का सपना साकार कर सकते हैं, इस बारे में गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

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