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कौन जाने, बरसों पहले 1984 में मरे दिलदार सिंह जैसे किसी सिख दंगा-पीड़ित की उस दिन ‘वापसी‘ हुई हो और उसकी रूह ने सुमंतो घोष के शरीर में प्रवेश करके दुर्जन सिंह से अपना बदला ले लिया हो। …. बरसों बाद दंगा-पीड़ितों को इंसाफ़ मिल गया।

कालीबाड़ी, कोलकाता के रहने वाले पैंतीस वर्षीय सुमंतो घोष पहली बार दिल्ली पहुंचे । वे एक वैज्ञानिक थे और एक अंतरराष्ट्रीय विज्ञान सम्मेलन में भाग लेने के लिए दिल्ली आए थे। वह अक्टूबर-अंत, 2018 का एक दिन था। वे पालम हवाई अड्डे से होटल मौर्य शेरेटन जा रहे थे जहां उनके रहने का बंदोबस्त किया गया था। उनका सम्मेलन भी इसी होटल के सभागार में होना था। अपने कमरे में पहुंच कर सुमंतो घोष ने थोड़ा आराम किया। दो दिवसीय सम्मेलन कल से शुरू होना था। दोपहर का भोजन करने के बाद उन्होंने एक टैक्सी बुलाई और घूमने के इरादे से निकल पड़े।
जब वे एक इला़के से गुज़र रहे थे तो अचानक न जाने क्या हुआ कि उन्होंने टैक्सी-ड्राइवर को किराया दे कर विदा कर दिया और पास के एक मकान की ओर ऐसे चलने लगे जैसे वे वहां रहने वाले व्यक्ति को जानते हों। मकान का दरवाज़ा खोल कर सुमंतो घोष सधे कदमों से भीतर की ओर चले। घर के अंदर से उन्हें किसी बुजुर्ग के खांसने की आवाज़ सुनाई दे रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे सुमंतो घोष के व्यक्तित्व में अचानक परिवर्तन हो गया था। वे निडर और किसी मिशन पर निकले हुए व्यक्ति जैसे लग रहे थे।
कमरे में दाखिल होने पर उन्हें वहां दाढ़ी वाला एक बुजुर्ग व्यक्ति दिखाई दिया। उसे देखते ही सुमंतो घोष की आंखों से चिंगारियां निकलने लगीं। उनका मुंह विकृत हो गया। वे उसे पंजाबी में गंदी गालियां देने लगे जबकि उन्हें पंजाबी आती ही नहीं थी। उन्होंने फटाफट अपनी जेब में पड़े दस्ताने निकाल कर पहने। फिर उन्होंने दोनों हाथों से उस बुजुर्ग को हवा में उठाया और उसे ज़ोर से ज़मीन पर पटक दिया। सुमंतो घोष ख़ुद छोटे क़द के सामान्य व्यक्ति थे। पर उस समय उनमें न जाने कहां से इतनी प्रचंड शक्ति आ गई थी कि वे उस बुजुर्ग को हवा में उठा-उठा कर पटकते जा कहे थे। फिर उन्होंने दोनों हाथों से उस बुजुर्ग का गला पकड़ा और उसका दम घोंट कर उसे मार डाला। लग रहा था जैसे उनके दोनों हाथ अपने-आप यह काम कर रहे थे। जैसे अपने हाथों पर सुमंतो घोष का नियंत्रण नहीं रहा था।
बुज़ुर्ग की हत्या करने के बाद सुमंतो घोष ने वहीं रखी बोतल से पानी पिया, अपने कपड़े ठीक किए, कुछ लम्बी सांसें लीं और सधे क़दमों से चल कर मकान से बाहर निकल आए। लेकिन उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि अभी कुछ देर पहले उन्होंने क्या किया और क्यों किया। उन्हें लग रहा था जैसे वे सुमंतो घोष न होकर कोई और ही थे। उनका दिमाग़ भन्ना रहा था। किसी तरह वे अपने होटल पहुंचे और सो गए।
अगली सुबह के अख़बारों में कल दोपहर-बाद दिल्ली में एक राजनीतिक दल के एक बुज़ुर्ग नेता दुर्जन सिंह की सनसनीख़ेज़ हत्या की ख़बर छपी थी। चोरी या लूटपाट के इरादे से यह हत्या नहीं की गई थी, यह तय था क्योंकि दुर्जन सिंह के घर से कोई सामान ग़ायब नहीं पाया गया। पुलिस को शक था कि 1984 के किसी दंगा-पीड़ित के परिजन ने बदला लेने के इरादे से यह हत्या की होगी। लेकिन बहुत खोज-बीन के बाद भी पुलिस को उंगलियों के कोई निशान वहां नहीं मिले। पुलिस के खोजी कुत्ते भी सड़क तक आए और फिर उनकी नाक से हत्यारे की गंध खो गई। ऐसा माना गया कि हत्यारा सड़क पर आ कर किसी गाड़ी में बैठ कर भाग गया होगा। इसलिए पुलिस को हत्यारे का कोई सुराग़ नहीं मिला। हार कर कुछ महीनों के बाद पुलिस ने दुर्जन सिंह की हत्या की फ़ाइल ‘अनसुलझी‘ क़रार दे कर बंद कर दी।
दुर्जन सिंह की हत्या की ख़बर जब अगले दिन दिल्ली के तिलक नगर में रहने वाले 1984 नरसंहार के दंगा-पीड़ितों को पता चली तो उस रात उन्होंने अपने घरों के बाहर घी के दीए जलाए।
सुमंतो घोष दिल्ली में उस सम्मेलन में भाग लेने के बाद वापस कोलकाता लौट गए। वे पहले जैसे सीधे-सादे, पढ़ने-लिखने वाले वैज्ञानिक का सामान्य जीवन जीते रहे। वे दोबारा कभी दिल्ली नहीं आए। जब भी वे दिल्ली में घटी उस असाधारण और अपसामान्य घटना को याद करते तो उन्हें हैरानी होती कि उस दिन उन्होंने क्या कर डाला था। उस दिन उन पर न जाने कौन-सा भूत सवार हो गया था। उनकी तो उस आदमी दुर्जन कुमार से कोई दुश्मनी नहीं थी। वे तो उसे जानते तक नहीं थे। वे सोचते कि क्या उस दिन कुछ समय के लिए उनके भीतर कोई और प्रवेश कर गया था जिसने उन पर नियंत्रण करके उनसे यह काम करवा लिया। उन्होंने यह बात कभी किसी को नहीं बताई। वे आजीवन मंदिरों में जाकर दान-पुण्य करते रहे ताकि इस हत्या-कांड के बाद उनका अंतर्मन कुछ राहत महसूस कर सके।
सुमंतो घोष अक्सर यही सोचते कि न जाने उस दिन उन्हें क्या हो गया था। कौन जाने, बरसों पहले 1984 में मरे दिलदार सिंह जैसे किसी सिख दंगा-पीड़ित की उस दिन ‘वापसी‘ हुई हो और उसकी रूह ने सुमंतो घोष के शरीर में प्रवेश करके दुर्जन सिंह से अपना बदला ले लिया हो। पर यह बात सुमंतो घोष कैसे जान सकते थे? जो भी हो, बरसों बाद दंगा-पीड़ितों को इंसाफ़ मिल गया था।
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