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चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग हाल ही में १२ – १३  अक्टूबर को भारत की दो दिवसीय यात्रा पर आए थे। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने इस दौरान नई दिल्ली या आगरा में भेंट करने के रिवाज को छोड़ कर तमिलनाडु में महाबलीपुरम में शी जिनपिंग का स्वागत किया। जिनपिंग के दौरे के लिए महाबलीपुरम को चुनने के कुछ महत्वपूर्ण कारण हैं।

महाबलिपुरम ४ वीं शताब्दी ईस्वी के बाद से तमिलनाडु और चीन के बीच व्यापार का प्रवेश द्वार रहा है। तत्कालीन पल्लव शासकों के दिनों में, तमिलनाडु के व्यापार और आयात और निर्यात का सीधा संबंध चीन से था। जिनपिंग ने यह भी महसूस किया कि एक बार मजबूत रिश्ते से वर्तमान और भविष्य को उज्ज्वल किया जा सकता है।

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच बैठक के दौरान, दोनों देशों के आम लोगों के बीच एक व्यक्तिगत संबंध और सहयोग को बढ़ावा देने, एक ऋण बांड बनाने पर चर्चा हुई। भारत और चीन की सीमा लगभग ३ हजार ५०० किमी है। हम चीन की आक्रामक नीति को भी जानते हैं। मोदी-जिनपिंग ने इसके बारे में भी बात की। दोनों नेता सीमा पर शांति स्थापित करने के लिए सहमत हुए। मोदी ने यह भी कहा कि उन्हें एक-दूसरे की चिंताओं को संवेदनशीलता से देखना चाहिए।

  • भारत यात्रा में कश्मीर मामले का उल्लेख नहीं

कश्मीर प्रश्न में अनुच्छेद ३७० को हटाने के बाद से, चीन ने संयुक्त राष्ट्र, अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और अन्य मंचों में पाकिस्तान का जोरदार समर्थन किया है। भारत आने से पहले, जिनपिंग ने कश्मीर मुद्दे पर भारत पर हमला करते हुए कहा था कि पाकिस्तान के साथ चीन की दोस्ती अविभाज्य है।

कश्मीर मुद्दे पर पाक का साथ देने वालें चीन को उसकी ही भाषा में जवाब देने के लिए भारत को हांगकांग में असंतुलित माहौल, तिब्बत पर कब्ज़ा और चीन में मुस्लिम समाज पर अत्याचार, मानव अधिकार उल्लंघन और दक्षिण चीन सागर के बारे में बात करनी चाहिए। चीन पाकिस्तान का इस्तेमाल करके भारत को कमजोर करने की अपनी नीति को नहीं छोड़ेगा। जिनपिंग चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे पर बहुत अधिक जोर दे रहे है।

चीन का मुख्य उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र में भारत-पाक प्रश्न को पुनर्जीवित करना है, लगभग ४३००० वर्ग किलोमीटर इलाके पर कब्जा करना है। इसमें भारत में जम्मू और कश्मीर का क्षेत्र भी शामिल है, साथ ही १९६३ में पाकिस्तान द्वारा पुनः प्राप्त ५,१६८ वर्ग किलोमीटर भूमि भी शामिल है। यह इलाक़ा ‘चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा’ (CPE) के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। भारत ने ५ अगस्त को जम्मू और कश्मीर की विशेष स्थिति को रद्द कर दिया। इसके कारण, चीन को क्षेत्र पर नियंत्रण हासिल करने में अधिक कठिनाई होगी। भारत – पाकिस्तान मुद्दे को पुनर्जीवित कर चीन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी ताकत दिखाने की कोशिश कर रहा है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में, भारत-पाकिस्तान मुद्दा १९७१ के बाद ठंडा हो गया। पाकिस्तान ने जिनपिंग की भारत यात्रा में इस मुद्दे पर समर्थन मांगा। लेकिन शी जिनपिंग ने अपने भारत यात्रा में कश्मीर मामले का जिक्र तक नहीं किया। दुनिया के अधिकांश देशों से समर्थन नहीं मिलने पर पाकिस्तान ने कश्मीर मुद्दे पर चीन से ही आखिरी उम्मीद रखी थी लेकिन दोनों ही नेताओं ने महाबलीपुरम में इस मुद्दे पर बात तक नहीं की।

  • भारत चीन के बीच व्यापार विषमता को कम करने में सफल रहा

दोनों देशों के बीच संबंधों का केंद्र व्यापार था। अमेरिका पिछले कुछ समय से चीन के साथ व्यापार युद्ध में लगा हुआ है और ट्रम्प चीन को और बदतर बनाना चाहते हैं। भारत, जिसकी एक निर्यात-उन्मुख अर्थव्यवस्था है, को अमेरिकी व्यापार युद्धों जैसे हालत से बचने के लिए चीन को भारत की सख्त जरूरत है। इसलिए, चीन की योजना भारत के साथ सहयोग करने, निर्यात बढ़ाने और दोनों देशों के बीच व्यापार को २००  बिलियन डॉलर तक लाने की है। वर्तमान में, दोनों देशों के बीच व्यापार ९५  बिलियन डॉलर के स्तर पर पहुंच गया है और जल्द ही १०० बिलियन डॉलर के स्तर को पार कर जाएगा। अतीत २०१८ – १९ में, व्यापार $ ८७  बिलियन का था। इस व्यापारिक समीकरण में भारत का नुकसान है और भारत-चीन के बीच व्यापार में चीन का लाभ है। हालाँकि भारत कई क्षेत्रों में प्रमुख है, भारत की ये बातें चीन तक नहीं पहुँचती हैं क्योंकि चीन भारत को कानून और व्यवस्था के चक्र में रखता है। पिछले साल भारत का घाटा लगभग ६३  बिलियन डॉलर था। हालांकि, पिछले दो दशकों में पहली बार नुकसान कम से कम हुआ है।

चीन में भारत का निर्यात २०१७ – १८ में $ १३ बिलियन था, यह २०१८ – १९ में $ १८ बिलियन तक बढ़ गया, जबकि आयात भी $ ७६ बिलियन से $ ७० बिलियन तक आ गई। इसका अर्थ यह हुआ कि नुकसान में १० बिलियन डॉलर की कमी आई है। चीन को भारत का निर्यात बढ़ाने के लिए, भारत ने चीन को लगभग ३८० वस्तुओं और उत्पादों की एक सूची भेजी है। इनमें सूचना प्रौद्योगिकी, बागवानी, कपड़े, रसायन, दवाएं और दूध-डेयरी उत्पाद शामिल हैं। भारत को चीन में अपना निर्यात बढ़ाने और उन उत्पादों तक पहुंच की आवश्यकता है जो चीन आयात करता है। चीन $ ४५० बिलियन इलेक्ट्रॉनिक मशीनरी, $ ९७ बिलियन मेडिकल उपकरण और $ १२५ बिलियन लौह अयस्क का आयात करता है। भारत को उसमें भी जगह मिलनी चाहिए।

  • नेपाल में चीनी कम

जिनपिंग भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ दो दिवसीय वार्ता के बाद शनिवार को काठमांडू पहुंचे। चीन अगले दो वर्षों में नेपाल को उसके विकास और सड़क संपर्क के लिए 56 बिलियन नेपाली रुपये की सहायता करेगा। जिनपिंग पिछले 23 वर्षों में नेपाल जाने वाले पहले चीनी राष्ट्रपति हैं।

उन्होंने २०१५ में भूकंप के बाद से बंद हुए काठमांडू को तातोपनी पारगमन बिंदु से जोड़ने वाले अर्निको राजमार्ग की मरम्मत करने का वादा किया है। ट्रांस-हिमालयन रेलवे पर एक अध्ययन जल्द ही शुरू किया जाएगा। शी ने नेपाल को केरूंग-काठमांडू भूमिगत मार्ग के निर्माण में सहायता करने का भी आश्वासन दिया है। चूंकि यह क्षेत्र पहाड़ी है, इसलिए ट्रांस-हिमालयन रेलवे दोनों को आर्थिक दृष्टी से लाभदायक नहीं होगा। नेपाल को अन्य देशों के साथ व्यापार करने के लिए भारत पर निर्भर रहना होगा, चाहे वह कितना भी प्रयास करे।

  • और क्या करना है ?

हम चीन के खिलाफ नुकसान को कम करने की कोशिश भी कर रहे हैं और चीन पर निवेश करने का दबाव भी बना रहे हैं। भारत के पास चीन के कुल विदेशी निवेश का केवल 5.5 प्रतिशत है, जो वर्तमान में ८ बिलियन डॉलर है। चीन ने भारत में २० बिलियन डॉलर के निवेश का वादा किया है, लेकिन भारत को कम से कम ५० बिलियन डॉलर के निवेश की उम्मीद है। इससे दोनों देशों के व्यापार संबंधों में समान स्तर पर तेजी आएगी। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भेंट में व्यापार, व्यवसाय, आयात-निर्यात और निवेश का मुद्दा भी महत्वपूर्ण था और महाबलिपुरम दोनों देश के प्राचीन व्यापार केंद्र होने के कारण  इसे चुना गया था।

महाबलिपुरम में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच वार्ता कितनी सफल रही, यह पता लगाने में कुछ समय लगेगा। जिनपिंग भारत आए और दो दिनों के लिए प्रधान मंत्री के साथ बातचीत की। चीन के साथ भारत का कोई भी प्रश्न पिछले 70 वर्षों में हल नहीं हुआ है और इसके समाधान की कोई संभावना नहीं है। चीन की महत्वाकांक्षा दुनिया की एकमात्र शक्ति बनने की है। चीन ऐसा देश है जो एक प्रतियोगी नहीं चाहता है और एशिया महाद्वीप में चीन के साथ बराबरी कर सकता है, वो एकमात्र भारत है। 2013 में, रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि चीन भारत का नंबर एक दुश्मन है, यह आज भी कटु सत्य है।

भारत को अपनी सुरक्षा और आर्थिक दृष्टिकोण तैयार करना चाहिए। देशभक्त भारतीय नागरिकों को आने वाली दिवाली में चीनी सामानों का बहिष्कार कर व्यापार घाटे को कम करने में योगदान देना चाहिए।

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