मंदिरों के सोने पर वामपंथियों की नजर

एक तरफ भारत सरकार ने साॅवरेन गोल्ड बाॅन्ड योजना के माध्यम से भारतीय रिर्जव बैंक में रखा सोना सस्ती दर पर बेचना शुरू कर दिया है, वहीं दूसरी तरफ वामपंथी जमात ने हिंदू मंदिरों में सुरक्षित सोने पर नजर गढ़ा दी है। इस जमात में शामिल एमके वेणु ने ट्वीट के जरिए मांग की है कि 1-4 ट्रिलियन डाॅलर के मूल्य का 25 हजार टन सोना मंदिरों से निकालकर  रिर्जव बैंक में जमा किया जाना चाहिए, ताकि इतने ही मूल्य के रुपए बाजार में आ सकें। हालांकि मंदिर न्यासों के पास कितने मूल्य के स्वर्ण भंडार हैं, इसके आंकड़े स्पश्ट नहीं हैं। ये तथाकथित विघटनकारी तत्व मंदिरों में रखे स्वर्ण भंडार पर तो बुरी नजर लगाए रहते हैं, लेकिन इन्हें चर्च और वक्फ बोर्ड की संपत्ति दिखाई नहीं देती, जबकि हरेक संकट काल में मंदिर मानवता का परिचय देते हैं। इस कोरोना-काल में भी मंदिर और आश्रमों से भारत सरकार को अरबों रुपए का दान तो दिया ही गया है, गरीबों को भोजन कराने और अस्पतालों को सुरक्षा उपकरण देने के साथ, मंदिर परिसरों में आईसोलेशन वार्ड भी बनाए गए हैं। जबकि चर्च जो अपने स्कूलों के माध्यम से करोड़ों रुपए सालाना कमाते हैं, वह धन देश के हित में कितना लगता है, इसका कोई लेखा-जोखा नहीं है, इसी तरह मुसलमानों की कमाई का 10 प्रतिशत जकात का हिस्सा कहां खर्च होता है. दिखाई नहीं देता? हां, हिंदुओं के धर्म परिवर्तन में जरूर यह कमाई लगाई जाती है। कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई में मंदिरों के ट्रस्टों ने प्रधानमंत्री राहत कोश में अरबों रुपए दिए हैं, लेकिन ईसाई और इस्लाम धर्म संस्थाओं ने बड़ी धनराशि इस लड़ाई में लगाई हो, ऐसा देखने-सुनने में नहीं आया, इसलिए मंदिरों के धन पर नजरें गढ़ाना अनुचित है, क्योंकि मंदिर के न्यासों पर किसी न किसी रूप में जिला प्रशासन का नियंत्रण रहता है, जबकि ईसाई और इस्लाम से जुड़ी संस्थाएं इस नियंत्रण से बाहर रहती हैं। मस्जिदों के लिए मध्य-पूर्व मुस्लिम और चर्चों के लिए यूरोपीय देश बड़ी धनराशि अनुदान में देते हैं।

बृहत्तर भारत में सोने का भण्डार लगातार बढ़ रहा है। यह सोना देश के स्वर्ण आभूषण विक्रेताओं, घरों, मंदिरों और  भारतीय रिजर्व बैंक में जमा है। 2014-15 में ही 850 टन सोना आयात किया गया था। इसके आलावा इसी साल अधिकारियों का अनुमान था कि देश में 175 टन सोना तस्करी के जरिए भी आया है। इतनी बड़ी मात्रा के बावजूद विश्व स्वर्ण परिषद् का मानना है कि भारत के सरकारी खजाने में सिर्फ 557-7 टन सोना है। सोने के सरकारी भंडार के मामले में भारत 11वें स्थान पर है। इसके इतर इसी परिषद् का अनुमान है कि भारत में 22 हजार टन सोना घरों, मंदिरों और धार्मिक एवं पूंजीपतियों के न्यासों के पास है। गुजरे जमाने के सामंतों के पास भी अकूत सोना है। सोने की उपलब्धता की जानकारी देने वाली यह रपट इंडिया हार्ट आॅफ गोल्ड 2015 शीर्षक से जारी की गई थी। यह रिपोर्ट विश्व के तमाम देशों में सोने की वस्तुस्थिति के सिलसिले में किए गए एक अध्ययन के रुप में सामने आई थी। अमेरिका के पास 8133-5 टन सोने के भंडार हैं। दुनिया का लगभग 32 प्रतिशत सोना भारत के पास है। 1991 में जब भारत की आर्थिक स्थिति डांवाडोल थी, तब तात्कालीन प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर सरकार ने बैंक आॅफ इंग्लैण्ड में 65-27 टन सोना गिरवी रखकर अर्थव्यवस्था को गति दी थी। देश में सोने की मजबूत स्थिति के चलते ही, देश को सोने की चिड़िया कहा जाता है।

यदि इस सोने को देश की कुल आबादी में बराबर-बराबर टुकड़ों में बांटा जाए तो देश के प्रत्येक नागरिक के हिस्से में करीब आधा औंस सोना आएगा। हालांकि प्रति व्यक्ति सोने की यह उपलब्धता पश्चिमी देशों के प्रति व्यक्ति की तुलना में बहुत कम है। लेकिन विशेषकर भारतीय महिलाओं में स्वर्ण आभूषणों के प्रति लगाव के चलते रिर्जव बैंक ने सोने की जो बिक्री शुरू की हैं, उसके चलते व्यक्तिगत सोने की उपलब्धता में और बढ़ोत्तरी होगी। वैसे भी हमारे यहां लोग धन की बचत करने में दुनिया में सबसे अग्रणी हैं। भारतीय अपनी कुल आमदनी का तीस फीसदी हिस्सा बचत खाते में डालते हैं। इसमें अकेले सोने में 10 फीसदी निवेश किया जाता है। शादियों में भी बेटी दामाद को स्वर्ण आभूषण दान में देने का प्रचलन है, इस कारण भी सोने की घरेलू मांग देश में हमेशा बनी रहती है। इसीलिए इस कोरोना-काल में सोने के दाम आसमान छू रहे हैं।

भारत के स्वर्ण बाजार को ख्याल में रखते हुए विश्व स्वर्ण परिषद् द्वारा यह रिपोर्ट इस मकसद से जारी की गई थी, जिससे विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियां यहां निर्मित स्वर्ण आभूषण बाजार में पूंजी निवेश करने की संभावनाएं तलाशें। क्योंकि भारत दुनिया में सोने का सबसे बड़ा बाजार है। अंतरराष्ट्रीय सराफा बाजार के लिए भारत के आभूषण बाजार बेहद महत्वपूर्ण हैं। वैसे सोना भारतीय समाज का अंतरंग हिस्सा है। देश में सोना जमीन-जायदाद व अन्य अचल संपत्तियों से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। घरों में सोना रखना इसलिए भी जरुरी माना जाता है, जिससे विपरीत परिस्थिति, मसलन हारी बीमारी में सोना गिरवी रखकर नकद रकम हासिल की जा सके। सोने में बचत निवेश लोग इसलिए भी अच्छा मानते हैं क्योंकि इसके भाव कुछ समय के लिए स्थिर भले ही हो जाएं, घटते कभी नहीं हैं। लिहाजा सोने में पूंजी निवेश को कमोबेश सुरक्षित माना जाता है। बशर्ते सोना चोरी न हो. हालांकि अब सक्षम लोग बैंक लाॅकरों में सोना रखने लगे हैं। वर्तमान में उंची कीमतों के बावजूद लोग सोने में खूब निवेश कर रहे हैं।

रिजर्व बैंक अधिनियम 1934 के अनुच्छेद 33 (5 के अनुसार रिर्जव बैंक के स्वर्ण भंडार का 85 प्रतिशत भाग बैंक के पास सुरक्षित रखना जरुरी है। यह सोने के सिक्कों, बिस्किट्स, ईंटों अथवा शुद्ध सोने के रुप में रिजर्व बैंक या उसकी एजेंसियों के पास आस्तियों अथवा परिसंपत्तियों के रूप में रखा होना चाहिए। इस अधिनियम से सुनिश्चित होता है कि ज्यादा से ज्यादा 15 फीसदी स्वर्ण भंडार ही देश के बाहर गिरवी रखा जा सकता है अथवा बेचा जा सकता है। जबकि 1991 में इंग्लैण्ड में जो 65-27 टन सोना गिरवी रखा गया था, वह रिजर्व बैंक में उपलब्ध कुल सोने का 18-24 प्रतिशत था। जो रिजर्व बैंक की कानूनी-शर्तों के मुताबिक ही 3-24 फीसदी ज्यादा था। रिजर्व बैंक में जो सोना सुरक्षित होता है, उसका एक प्रतिशत से भी कम रिटर्न हासिल होता है।

चूंकि बीते करीब दो माह से देश में लाॅकडाउन चल रहा है और उद्येग धंधे बंद हो जाने से गरीब तबका बड़ी संख्या में बेरोजगार हो गया है। ऐसे में भारत सरकार ने कई लाख करोड़ के पैकेज बेरोजगार हुए वंचितों और उद्योगों को दिए हैं। गोया, रिजर्व बैंक कोे साॅवरेन गोल्ड बाॅन्ड के जरिए सोना बेचना जरूरी हो गया है। इस सोने की कीमत 4590 रुपए प्रति 10 ग्राम तय की गई है। जो खरीददार आॅनलाइन आवेदन करके डिजीटल भुगतान करेंगे उन्हें प्रति ग्राम पचास रूपए की छूट दी जाएगी। इस खरीद पर जीएसटी भी नहीं लगेगा। रिजर्व बैंक की तरह ही मंदिरों का सोना देष के लिए इसलिए सुरक्षित है, क्योंकि आपात स्थिति में सभी मंदिर जनकल्याण में लग जाते हैं। मंदिर न्यास अनेक शैक्षिक संस्थान भी चलाते हैं, इसलिए वामपंथी जमात को चर्चों और मस्जिदों की आमदनी जनकल्याण में लगवाने की पहल करनी चाहिए, न कि मंदिरों की ।

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