युद्धकामी चीन को पीछे हटना ही होगा

इस वर्ष जब भारत और चीन के कूटनीतिक संबंधों की 70वीं वर्षगाँठ है  और दोनों देश मिलकर कुल 70 कार्यक्रम करने वाले थे तब चीन ने एक बार फिर धोखा देते हुए गलवान घाटी में घुसपैठ करके युद्ध का माहौल बनाया है। इस बार 5 और 9 मई को चीनी सैनिकों ने लद्दाख और उत्तरी सिक्किम में घुसपैठ  करने का प्रयास किया तथा दोनों स्थानों पर तीन बार झड़प हुई। सूत्रों के अनुसार गलवान घाटी में चीनी सैनिकों ने भारतीय पोस्ट के.एम.120 से लगभग 15 किलोमीटर दूर अपने तंबू गाड़े हैं। इनकी अनुमानित संख्या 5000 के आस-पास है। इसी इलाके में भारतीय सेना पैट्रोलिंग पोस्ट 14 के पास गलवान नदी पर पुल बना रही है जो 60 प्रतिशत तक पूरा हो गया है। चीनी सेना डोकलाम का बदला लेने के लिए इसे रुकवाना चाहती थी जिसे भारतीय सेना की दृढ़ता और मनोबल नाकाम कर दिया। गौरतलब है कि चीन पहले ही तिब्बत में एल.ए.सी.के पास तक सड़क व ढांचागत सुविधाओं का जाल बिछा चुका है। अब जब भारतीय सेना वैसा ही कर रही है तो उसे नागवार गुजर रहा है।
   चीन ने पहले युद्ध का माहौल बनाया ।चीनी राष्ट्रपति ने सेना को युद्ध की तैयारी और अपने देश को सबसे बुरे परिणाम के लिए तैयार रहने को कहा। लेकिन जब उसे लगा कि भारतीय सेनाएं कोरोना कहर के दौरान भी पूर्णतः सुसज्जित हैं और उनका मनोबल बहुत ऊंचा है तो उसका सुर बदल गया । भारत में चीन के राजदूत सन विंडोग को कहना पड़ा कि दोनों देश एक दूसरे के लिए खतरा नहीं हैं। चीनी विदेश मंत्रालय ने राग अलापा है कि वह भारत के साथ सीमा संबंधी सभी समझौतों का पालन करेगा और सीमा पर स्थिरता एवं शांति है। आखिरकार ऐसा क्या हुआ है जो युद्धकामी चीन को बार-बार पीछे हटने के लिए मजबूर कर देता है।
  आज भी चीनी सेना भारतीय सेना द्वारा दिए गए दो दुःस्वप्नों को भूल नहीं पायी है। पहला दुःस्वप्न है लद्दाख की चुशुल घाटी के पहाड़ दर्रे रेजांगला का युद्ध। 18 नवंबर 1962 को मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में कुमाऊँ रेजीमेंट के 120 सैनिकों ने तोपों और बड़े हथियारों से लैस लगभग 6000 चीनी सैनिकों का मुकाबला किया और 1300 चीनी सैनिकों को मार गिराया। फलतः शेष घायल और भयभीत चीनी सैनिक मैदान छोड़कर भाग गए। चीन अपने 861 सैनिकों के शव को भी बर्फ़ की सफ़ेद चादर पर छोड़कर भाग खड़ा हुआ जिसे वह 20 साल बाद 1982 की गर्मियों में ले जाता है।  इस युद्ध में भारतीय सेना के 114 जवानों ने वीरता से लड़ते हुए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। यदि उस समय भारतीय नेतृत्व वायुसेना का प्रयोग करता तो भारत अपने रणबांकुरों की बदौलत युद्ध जीत गया होता। आज भारत का इतिहास दूसरा होता। इसी तरह दूसरा दुःस्वप्न है सितम्बर 1967 में  सिक्किम के नाथुला दर्रे का युद्ध जिसमें कैप्टन डागर एवं मेजर हरभजन सिंह के नेतृत्व में भारतीय सेना ने 440 चीनी सैनिकों को मार गिराया था। इस युद्ध में 70 भारतीय  सैनिक शहीद हुए थे। उसके बाद चीन ने डरकर समझौता किया कि अब दोनों सेनाएं सीमा पर गोली नहीं चलाएंगी। इस समझौते का अब तक पालन होता रहा है। अतः भिड़ंत के समय दोनों सेनाएं हाथापाई और धक्का-मुक्की ही करती हैं। इन दु:स्वप्नों के कारण आज भी चीनी सेना मानती है कि यदि युद्ध जीतना है तो एक भारतीय सैनिक पर हावी होने के लिए दस चीनी सैनिकों की जरूरत होगी जो व्यावहारिक दृष्टि से लगभग असंभव है। अतः चीनी सेना जब भी भारतीय सेना के समक्ष आती है तो उसका मनोबल टूट जाता है।
ऐसा माना जा रहा है कि इस बार चीन ने भारत को पी.ओ. के.पर कब्जा करने से रोकने के लिए सीमा पर तनाव पैदा किया है। वह भारत से इस कारण भी चिढ़ा है कि इस समय अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया तथा यूरोपीय देशों की जो कंपनियां चीन छोड़ कर जा रही हैं वे भारत को अपना अगला ठिकाना बना सकतीं हैं। इसके अलावा भारत विश्व स्वास्थ्य संगठन की कार्यकारिणी का अध्यक्ष बन गया है जिसके ऊपर चीन में कोरोना की उत्पत्ति और वैश्विक संक्रमण की जांच का दायित्व है।  इस समय कोरोना कहर से सर्वाधिक प्रभावित राष्ट्र अमेरिका है । अमेरिका का इतिहास बताता है कि वह अमेरिकी लोगों को मारने वाले अथवा कारण बनने वाले के साथ भयावह बदला लेता है। हम भलीभांति जानते हैं कि जो अमेरिका पर्ल हार्बर हमले में मारे गए 2500 और 9/11 आतंकी हमले में मारे गए 3200 लोगों की मौत का बदला ले चुका है वह एक लाख से ज्यादा नागरिकों की मौत को चुपचाप झेल जाएगा यह लगभग असंभव है। ऐसी स्थिति में देर-सबेर अमेरिका चीन को सबक अवश्य सिखाएगा। भारत ने चीनी कंपनियों द्वारा भारतीय कंपनियों के अधिग्रहण को नियंत्रित करके उसके सपनों पर तुषारापात कर दिया है। फलतः उसकी बौखलाहट सीमा पर निकल रही है।
  कोरोना संकट का एक सुखद पक्ष यह है कि संपूर्ण विश्व चीन के असली चरित्र से परिचित हो  चुका है और चीन इस संकट का अपने पक्ष में कोई लाभ नहीं ले पाएगा। उसकी विस्तारवादी नीति ने पहले जापानी द्वीपों पर अतिक्रमण किया फिर ताइवान पर कब्ज़े के इरादे से उसके आस-पास अपनी वायुसेना तथा नौसेना का युद्धाभ्यास करवाया। फिर दक्षिण चीन सागर में द्वीपों तथा समुद्र के भीतर के स्थानों के नाम बदल दिए। उसने वियतनाम के जहाज को भी उड़ा दिया। अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया को नौसेनाओं ने दक्षिण चीन सागर में गश्त लगाकर उसके इरादे को असफल कर दिया तथा अमेरिका ने प्रशांत महासागर क्षेत्र में अपने छः विमानवाहक पोत और पनडुब्बियां भेजकर ताइवान पर उसके संभावित कब्ज़े को रोक रखा है। चीन यहीं नहीं रुका ।उसने हिंद महासागर क्षेत्र में अपने एक दर्जन से अधिक युद्धपोत और पनडुब्बियां भेजी जिसे सतर्क भारतीय नौसेना ने समय पर अपनी उपस्थिति का अहसास करवा दिया। साथ ही, भारतीय वायुसेनाने सुखोई-30 एम.के.आई.से उसी क्षेत्र में ब्रह्मोस मिसाइल का सफल परीक्षण करके चीनी नौसेना को बता दिया कि यदि वह इस क्षेत्र में रुकने के इरादे से आई है तो हम उसका कब्रिस्तान बना सकते हैं। चीन दूसरे देशों की जमीन के लिए किस हद तक भूखा है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उसकी सरकारी वेबसाइट ने माउंट एवरेस्ट जो नेपाल में है उसे अपना बताया। यही नहीं उसने हद तो तब कर दी जब संपूर्ण किर्गिज़स्तान तथा कजाकिस्तान को अपना क्षेत्र बताया दिया जिससे रूस एवं मध्य एशियाई देशों में हड़कंप मच गया।इसी क्रम में उसने नेपाल की वामपंथी सरकार को भारतीय क्षेत्र लिपुलेख तथा कालापानी को अपना क्षेत्र बताने के लिए विवश किया। ये घटनाएं इस बात का सबूत हैं कि चीन कोरोना कहर से उत्पन्न स्थिति का किसी-न-किसी रूप में फायदा लेना चाहता है।
चीनी सेना की वर्तमान हरकत को भारत सरकार ने बड़ी सतर्कता के साथ कूटनीतिक स्तर पर निपटाया। हमारे रक्षामंत्री श्री राजनाथ सिंह ने ऑस्ट्रेलिया के रक्षामंत्री से बात की। अमेरिकी राष्ट्रपति श्री डोनाल्ड ट्रंप ने चीन के मनोबल को तोड़ने के लिए मध्यस्थता की पेशकश कर दी।अमेरिकी प्रतिनिधि स्काॅट पेरी ने तिब्बत और हांगकांग को स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देने के लिए वहां की कांग्रेस में विधेयक पेश कर दिया । चीन अभी भी इस सत्य से अनभिज्ञ है कि अमेरिका-भारत-जापान और ऑस्ट्रेलिया का शक्तिशाली सामरिक गठजोड़ किस स्तर पर  सक्रिय है। पिछले साल प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने डोनाल्ड ट्रंप तथा आबे शिंजो के समक्ष कहा था कि  जापान अमेरिका और इंडिया मिलकर ( JAI ) बनाते हैं जिसका अर्थ ही सफलता अथवा विजय है। अतः चीन यह समझ नहीं पा रहा है कि यदि वह भारत पर युद्ध थोपता है तो जापान, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ताइवान, फिलीपीन्स एवं वियतनाम जैसे देश भी उसके विरुद्ध मोर्चा खोल सकते हैं जो उसके सर्वनाश का कारण भी बन सकता है। इसके अलावा भारतीय सेना ने जिस त्वरा के साथ लद्दाख से अरुणाचल प्रदेश के सीमांत तक सैन्य तैनाती की है उससे भी चीनी सेना हतप्रभ है।
  भारत के जिन हथियारों से चीनी सेना खौफ खाती है उसमें सबसे बड़ा और गुप्त हथियार काली-5000 है ।यह प्रत्यक्ष ऊर्जा हथियार ( Direct Energy Weapon) है जो महाशक्ति काली की तरह ही शत्रु के सारे हथियारों तथा संचार प्रणालियों को भारत में पहुंचने के पहले ही तबाह कर सकती है। इसके द्वारा फेंके जाने वाले बीम  से लाखों गीगावाट की चुंबकीय ऊर्जा पैदा होगी जिससे शत्रु का कोई भी विमान और  मिसाइल उड़ने के पूर्व ही नष्ट हो जाएगा। यह भारतीय सेना का कितना गुप्त और प्रभावी हथियार है कि इसे 2050 तक आधुनिक माना जाएगा। चीनी सेना भारतीय मिसाइल अग्नि-5 की मारक क्षमता से भी भयभीत है। भारत के अनुसार इसकी मारक क्षमता 5500 किलोमीटर है जबकि चीन के अनुसार इसकी मारक क्षमता 8000 किलोमीटर तक  है ।चीन का आरोप है कि भारत ने जानबूझकर इसकी मारक क्षमता को छिपाया है। उसके अनुसार इस मिसाइल के परीक्षण के समय भारत ने पहले 2500 किलोमीटर सीधे ऊपर जाने के बाद 5500 किलोमीटर की दूरी तय करवाई थी जिससे इसकी कुल दूरी 8000 किलोमीटर तक पहुंचती है। इस मिसाइल का वैशिष्ट्य यह है कि यह वायुमंडल पार करने के बाद अपने गंतव्य की ओर ध्वनि से 27 गुना तेज गति से बढ़ती है जिससे इसे रोक पाना लगभग असंभव है। भारत के पास विश्व की सबसे तेज क्रूज़ मिसाइल ब्रह्मोस है जिसकी काट विश्व के किसी भी देश के पास नहीं है। फलतः जमीन पर हमारा वर्चस्व सुनिश्चित है और युद्ध की स्थिति में भारतीय सेना तिब्बत को आजाद करवा सकती है।
  इसके अलावा भारतीय वायुसेना के चंडीगढ़, बरेली, तेजपुर स्थित विमानतल तथा हवाई पट्टियां समुद्र तल के बराबर उंचाई पर स्थित हैं जिससे तिब्बत स्थित चीनी विमानों की तुलना में वे दुगुना भार ले जा सकते हैं। फलतः एक भारतीय युद्धक विमान के लिए दो चीनी विमानों की जरूरत पड़ेगी। इसी तरह चीन की अर्थव्यवस्था का सर्वोत्तम उसके पूर्वी तट पर है जहां जापान तथा अमेरिका से उसका मुकाबला है। फलतः वह भारत के विरुद्ध जिन हथियारों का प्रयोग कर सकता है उनपर भारत हावी है। इसी तरह युद्ध के समय चीन अपनी नौसेना का जो हिस्सा हिंद महासागर क्षेत्र में भेज सकता है उससे निपटने के लिए भारतीय नौसेना पर्याप्त सुसज्जित है। युद्ध की स्थिति में भारतीय नौसेना मलक्का जलसंधि को ब्लाॅक करके चीन के 80% व्यापार को अवरुद्ध कर सकती है।यदि दिएगोगार्शिया स्थित अमेरिका के सातवें बेड़े ने भी साथ दिया तो हम दक्षिण चीन सागर तक उसका क्षरण कर सकते हैं।
 हमारी वर्तमान सरकार ने भारत को घेरने की चीनी रणनीति ‘ मोतियों की माला’ को तोड़ने के लिए दक्षिण कोरिया, जापान, वियतनाम, सिंगापुर, इंडोनेशिया, अमेरिका तथा फ्रांस के साथ रणनीतिक साझेदारी का जो समझौता किया है वह एक ऐतिहासिक कदम है। अब हम ऑस्ट्रेलिया के साथ भी वैसा ही समझौता करने जा रहे हैं  जिससे हिंद -प्रशांत महासागर क्षेत्र में हमारी शक्ति बढ़ जाएगी। इस तरह हमारे अत्याधुनिक हथियारों, कूटनीतिक सक्रियता , भारतीय सेना के मनोबल तथा विश्व राजनीति में अलग-थलग पड़ने के डर से चीन पीछे हटने के लिए मजबूर हुआ है।यही उसकी नियति भी है। लेकिन यह एक प्रकार से अस्थायी शांति है। चीन निकट भविष्य में दुबारा ऐसी हरकत कर सकता है अतः हमें हर स्तर पर अपनी तैयारी बरकरार रखनी होगी। साथ ही, चीन के हर प्रपंच से सावधान  रहना होगा। समूचे विश्व समुदाय को उसकी हरकतों की जानकारी से अवगत कराते रहना होगा। चीन को भी अब समझना होगा कि वर्तमान विश्व व्यवस्था में हर राष्ट्र की संप्रभुता और उसकी सीमा का सम्मान करके ही वह आगे बढ़ सकता है अन्यथा सही समय पर संपूर्ण विश्व उसके विरुद्ध एकजुट हो रहा है।

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