गावों की और बढ़ता विकास

भारत में वर्तमान की उभरी समस्याओं ने जहां भारत के पूरे आर्थिक, राजनीतिक तंत्र को हिला कर रख दिया है वहीं यह भी सोचने को मजबूर कर दिया
है कि हम अपने विकास के प्रतिमान (मॉडल) की पुनः समीक्षा करें। आज कोरोना वायरस के कारण जहां दुनिया के देश परेशान हैं वहीं भारत भी इससे कहीं ज़्यादा प्रभावित है। इस बीमारी और उसके प्रभाव ने जहां भारत के पूरे स्वास्थ्य तंत्र की कलई खोल दी है, वहीं यह सोचने के लिए सबको मजबूर किया कि हमने आज़ादी के इतने वर्षों में किया क्या?

इस बीमारी ने भारत के सामने एक और समस्या पैदा की है और वह है शहरों से मज़दूरों का पलायन। शहरों में बंद हुए काम-धंधों और उनसे फैली बेरोज़गारी ने मजदूरों को वापस अपने गांवों की ओर जाने को मजबूर कर दिया है। जैसे-तैसे कुछ दिन तो शहरों में काट लिए परंतु देशबंदी की बार-बार बढ़ती अवधि ने इनके सामने जीवन के संकट का प्रश्न खड़ा कर दिया है। अब ये मज़दूर किसी भी हालत में अपने गांव, अपनों के पास पहुंचना चाहते हैं। इसलिए सरकारों ने नहीं चिंता की तो पैदल ही चल दिए।

बाद में उत्तर प्रदेश समेत कई राज्य सरकारों ने इन मज़दूरों को वापस उनके गांवों में पहुंचाने के लिए व्यवस्था की। इन मज़दूरों की संख्या को देखें तो स़िर्फ बिहार जाने वाले राजस्थान से ही 28 लाख लोगों ने अपने को पंजीकृत किया है, वहीं देश के अन्य शहरों की क्या स्थिति होगी? इन सब उपजी परिस्थितियों के कारण भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कहना पड़ा कि कोरोना संकट ने अब भारत को मजबूर कर दिया है कि वह आत्मनिर्भर बने, वहीं देश की बुद्धिजीवी जमात को बौद्धिक मंथन का अवसर भी दिया है जिसमें वे भारत के पूरे अर्थ तंत्र और उसके विकास के प्रतिमान को पुनः विश्लेषण करें।

सन 1947 को भारत आज़ाद हुआ। आजादी के बाद देश के नेताओं और बुद्धिजीवियों को यह तय करना था कि वे भारत के विकास के लिए कौन सा आर्थिक प्रतिमान अपनाए। एक तरफ़ अमेरिकी पूंजीवादी प्रतिमान था तो दूसरी तरफ रूस दृष्टिक्षेप का साम्यवादी प्रतिमान भी था। यही क्यों डॉ. आंबेडकर एवं पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का अपना देशज प्रतिमान था। बाबासाहब आंबेडकर ने कहा कि देश में भारी उद्योग लगने चाहिए। इनकी आवश्यकता है, लेकिन साथ ही देश में कृषि का भी विकास हो; क्योंकि एक ओर यह इन भारी उद्योगों को कच्चा माल उपलब्ध कराता है, वहीं ये लोगों को सबसे ज़्यादा रोज़गार भी देता है। लेकिन उस समय ये दोनों ही नेता राजनीतिक अस्पृश्यता के शिकार हुए और तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने ऊपर से समाजवादी दिखे लेकिन अंदर से पूंजीवादी प्रतिमान ही हो इसे देश के लिए उपयुक्त माना। नेहरू का मानना था कि शहरों के तेज़ी से विकास का बड़ा हिस्सा धीरे-धीरे गांवों की ओर जाएगा। इसीलिए सभी भारी उद्योगों को शहरों की ओर लाया गया। कुछ वर्षों के बाद देश के योजनाकर्ताओं को लगा कि कुछ ग़लत हो गया और नीति को बदलना चाहिए तो उन्होंने क्षेत्रीय विकास की बात की जिसमें जनजातियों और जंगलों में काम-धंधे स्थापित करने की ओर ध्यान दिया। इसने जहां एक ओर प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ा वहीं नक्सलवादी आंदोलन भी सरकारों के ख़िलाफ़ खड़ा किया। भारत में ये छद्म समाजवादी प्रतिमान तो नहीं चला इसलिए जिस कांग्रेस ने कभी इसकी वकालत की थी उसी ने 1991 में आकर इसको बदल दिया और मार्केट को खोल दिया।

बड़े-बड़े आर्थिक पैकेज उद्योग घरानों को मिले, जिसने फिर पूंजीवाद को ही बढ़ाया। अब पैसा कुछ घरानों के पास ही केंद्रित होने लगा। इसने समाज में और अधिक असमानता पैदा की। नेहरू की सोच थी कि विकास शहरों से छनकर गांवों तक जाएगा। आज की परिस्थितियों को देखकर लगता है कि यह सोच पूरी तरह असफल साबित हुई। आज हमें उस प्रतिमान की ओर देखना पड़ेगा जिसकी बात पंडित दीनदयाल उपाध्याय, बाबासाहब आंबेडकर ने की थी।

आंबेडकर की यह दूरदृष्टि ही थी कि जहां वे भारत में 1918 में उद्यमिता की बात कर रहे थे और सरकारों को छोटे-मंझोले काम-धंधों के लिए महिला और समाज के कमज़ोर दलित वर्गों को आर्थिक सहायता देने और कृषि को सरकार ने प्रोत्साहन देने का आग्रह कर रहे थे। वे मानते थे कि भारत में कृषि की बुरी स्थिति का कारण जोतों के छोटे आकर का होना है। अगर गांव के लोग आपस में मिलकर खेती करें और सरकार इस पर अपना नियंत्रण रखें तो किसानों का जीवन ख़ुशहाल हो सकता है।

अभी हाल ही के पंजाब सरकार के आंकड़ें बड़े चौंकाने वाले परिणाम देते हैं। पंजाब में राज्य-बंदी के समय खेतों में कटाई, भंडारण आदि सभी गतिविधियां सरकार ने अपनी निगरानी में कीं। उसका परिणाम उत्पादन में बढ़ोतरी के रूप में दिखा। पंजाब में पिछले साल गेहूं की कड़ाई में कुल उपज प्राप्त हुई 1.4 मिलियन टन, वहीं इस बार यह बढ़कर 2.8 मिलियन टन हो गई। सरकार का इस पर कहना है कि अन्न की बर्बादी को रोकने से यह प्रतिशत बढ़ा है।

अब देखें कि आंबेडकर आज से कितने वर्षों पहले कृषि के बारे क्या कह रहे थे। अगर लोग कनेक्टिंग कलेक्टिव फ़ार्मिंग करते हैं तो खेती में लागत कम उपज अधिक और जोखिम कम रहता है, जो किसानों के हित में है। इसके साथ ही अगर उपज अधिक तो बाज़ार में उत्पादन अधिक, सामान की क़ीमत कम और ख़रीदार का अधिक पैसा बच जाता है, जो सब व्यक्ति की बचत को बढ़ाता है। यह देश का देशज प्रतिमान है, जिसकी आंबेडकर ने बात की। भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि का बहुत महत्वपूर्ण योगदान है जिसको समझना बेहद ज़रूरी है। देश के कुल कार्यबल की 54.6% आबादी कृषि और उससे संबंधित क्षेत्र के कार्यकलापों में लगी हुई है।

जनगणना 2011 के अनुसार और वर्ष 2017-18 में देश के सकल मूल्य संवर्धन में इसकी भागीदारी 17.1% रही है, वहीं वर्ष 2017-18 के लिए देश में कुल खाद्यान्न उत्पादन 284.83 मिलियन टन है जो वर्ष 2016-17 के दौरान प्राप्त 275.11 मिलियन टन के खाद्यान्न के पिछले रिकॉर्ड उत्पादन की तुलना में 9.72 मिलियन टन अधिक है। इसीलिए वर्तमान सरकार मूल ढांचे के परिवर्तन की ओर बढ़ रही है। कृषि क्षेत्र के विकास का लेकर वर्ष 2016 में एक नई योजना- प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना- शुरू की गई, जिसका उद्देश्य छोटे किसानों को फायदा पहुंचाना था। 2019 में प्रधानमंत्री किसान आर्थिक राहत योजना का ऐलान किया गया। इस योजना के तहत 5 एकड़ से कम कृषि योग्य भूमि वाले छोटे और सीमांत किसानों को 6000 का लाभ पहुंचाना था ताकि वे किसी भी जोखिम की स्थिति में आसानी से उबर सके।

पंडित दीनदयाल जी ने जैविक विकास प्रतिमान एवं स्वदेश निर्मित विकास प्रतिमान की बात की। यह पूर्ण स्वदेशी है, जिसमें कृषि, छोटे-मंझोले उद्योग, नैतिक मूल्य इन तीन तत्वों का मेल है। दीनदयाल जी का मानना था कि कृषि को अधिक उन्नत बनाना चाहिए। देशी विधियों में बहुत बदलाव किए बिना इसका आधुनिकीकरण करने से कोई परेशानी नहीं है। गांव के उद्योग की इकाई होने से गांव का विकास होगा, जिससे जितनी आवश्यकता उतना उत्पादन होगा। भारत में नैतिकता का सदैव बड़ा प्रभाव रहा है। इसलिए हम औद्योगिक विकास की आंधी में पश्चिम के विकास के प्रतिमान की ही तरह नैतिकता को ना भूल जाए। विकास के साथ पर्यावरण की भी चिंता करनी चाहिए। भारत को पश्चिम के प्रतिमान का अक्षरश: अनुसरण नहीं करना चाहिए। वहां की भोगवादी संस्कृति है, वहीं हमारे यहां त्याग का बड़ा महत्व है। प्रकृति से उतना ही लेना है जितने कि हमें आवश्यकता है, बाकी औरों के लिए छोड़ देना है।

वर्तमान सरकार की नीतियों का यदि विश्लेषण किया जाए तो दिखता है कि ये योजनाएं भारत को एक आत्मनिर्भरता की ओर ले जा रही हैं। 2014 को प्रधानमंत्री जन धन योजना की शुरुआत की। इसके तहत अभी तक 3 करोड़ से अधिक खाते खोले जा चुके हैं। इसका उद्देश्य है हर किसी को बैंकिंग सुविधाओं का लाभ पहुंचाना। प्रधानमंत्री मोदी ने स्वदेशी विचार से प्रेरित होते हुए भारत में वैिेशक निवेश और विनिर्माण को आकर्षित करने के लिए 2014 में मेक इन इंडिया प्रोग्राम की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य भारत में ही रोजगार के अवसर पैदा करना था और अर्थव्यवस्था को बढ़ाना था। भारत में छोटे व्यापारियों, स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज एव छोटे उद्यमों के लिए अनेक परियोजनाएं आरंभ कीं जिनमें स्टार्ट अप इंडिया, स्टैंड अप इंडिया शामिल हैं। इनके तहत 10 लाख से 1 करोड़ तक का ॠण अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों और महिलाओं को दिया जाता था। इसके अलावा 2015 में मुद्रा लोन योजना आरंभ की। इसके तहत किसी भी सरकारी बैंक से 50000 से 10 लाख तक का ऋण दिया जाता था ताकि छोटे कारोबारी अपना व्यवसाय आरंभ कर सके, साथ ही भारत को डज्ञळश्रश्र उरळिींरश्र ष थेीश्रव बनाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने 2015 में प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना चलाई, जिसका प्रमुख उद्देश्य भारत में लोगों को कौशल प्रशिक्षण की शिक्षा देना था ताकि भारत में सभी व्यक्तियों को कार्यबल उपलब्ध कराया जा सके। 15 अगस्त 2018 को दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य सेवा योजना की शुरूआत भी आयुष्मान भारत के नाम से की। इसका उद्देश्य देश के 10 करोड़ परिवारों का 5 लाख तक का फ्री हेल्थ इंश्योरेंस कराना था; ताकि गरीब व्यक्ति बीमारी की स्थिति में अपना इलाज करा सके। इसमें सरकारी और प्राइवेट अस्पताल में इलाज भी शामिल है। इसे प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना भी कहा जाता है। ये योजनाएं आज़ादी के 70 वर्षों में बाद प्रारंभ हुईं। अगर हमने गांव केंद्रित योजनाओं का निर्माण किया होता तो शायद हमें मजदूरों के पलायन की समस्या का सामना न करना पड़ता।

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