वामपंथी चोले में सम्राज्यवादी आचरण

पंचशील जैसी लोकतंत्रिक अवधारणाएं चीन के लिए उस सिंह की तरह हैं, जो गाय का मुखौटा ओढ़कर धूर्तता से दूसरे प्राणियों का शिकार करते हैं। चेकोस्लोवाकिया, तिब्बत और नेपाल को ऐसे ही मुखौटे लगाकर चीन जैसे साम्यवादी देशों ने बरबाद किया है। पाक आतंकियों को भी चीन, भारत के खिलाफ छायायुद्ध के लिए उकसाता है।

चीन दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है, जो चोला तो वामपंथी वैचारिकता का ओढ़े हुए है, लेकिन उसके सभी आचरण निरंकुश और सज्ञम्राज्यवादी हैं। इसकी शुरूआत चीन ने 1950 में तिब्बत के दमन और वहां की जनता के साथ क्रूरता बरतते हुए की थी। माओत्से-तुंग उस समय कम्युनिस्ट चीन के प्रमुख थे। इस आक्रमण को करने वाली सेना को ’जनमुक्ति सेना’ नाम दिया गया था। इस अमानवीय हमले को जरूरी बताते हुए वामपंथी नेताओं ने इसे ’मुक्ति अभियान’ का नाम दिया था। इस समय प्रचारित किया गया कि चीनी सेना तिब्बती जनता को प्रतिक्रियावादी शासन से मुक्त कराने के लिए तिब्बत में घुसी है। तब चीन की कम्युनिस्ट क्रांति और माओत्से-तुंग के व्यक्तित्व से आकर्षित और प्रभावित लोगों ने जब चीन के हाथों तिब्बत की स्वतंत्रता हथियाने के सैनिक हमले पर चुप्पी साध ली थी। भारत के कम्युनिस्ट भी अपने ओंठ सिले रहे। किंतु डॉक्टर राममनोहर लोहिया ने स्पष्ट तौर से कहा था कि ’चीन का यह हमला भारतीय हितों पर आद्यात है। यह हमला करके चीन ने एक बालक को मार डालने का राक्षसी काम किया है।’ इस चेतावनी के बावजूद नेहरू ने तिब्बत को चीन का अंग मानने की सौहार्दपूर्ण घोषणा करके चीन के दमन को सही ठहराने की बड़ी गलती कर दी थी। तत्काल तो चीन ने इस समर्थन के मिल जाने पर ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ के नारे लगाए और फिर इन नारों की ओट में पंचशील के पवित्र सिद्धांतों पर अतिक्रमण शुरू कर दिया। इसी का परिणाम 1962 में भारत पर चीन के हमले के रूप में देखने में आया। तबसे से लेकर आज तक चीन की साम्राज्यवादी लिप्सा सुरसा मुख की तरह फैलती जा रही है और चीन ऐसे व्यापार के बहाने विस्तार दे रहा है।

दसअसल चीन में कुछ समय पहले अपने संविधान को संशोधित करके राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री पदों पर केवल दो बार बने रहने की शर्त हटा दी गई थी। इसके बाद से ही सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के नेता शी जिनपिंग राष्ट्रपति और दूसरे बड़े नेता ली क्विंग प्रधानमंत्री बने हुए हैं। अब ये आजीवन बने रह सकते हैं। जिनपिंग को इस समय चीन में माओत्से-तुंग माना जाता है। जीवनपर्यंत पथ पर बने रहने की छूट के बाद जिनपिंग की साम्राज्यवादी लिप्सा बेलगाम होती जा रही है। वे चीन की केंद्रीय सैनिक समिति के अध्यक्ष भी हैं। इसलिए चीन का यह नेतृत्व पंचशील मसलन शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के लिए ऐसे पांच सिद्वांतों को मानने को तैयार नहीं है, जिन पर इस संधि से जुड़े देश अमल के लिए वचनबृद्ध हैं। पंचशील की शुरूआत पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री चाउ एन लाई ने 28 जून 1954 में की थी। बाद में म्यांमार ने भी इन सिद्धातों को स्वीकार लिया था। ये पांच सिद्धांत थे, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का परस्पर सम्मान करना, परस्पर रूप से आक्रामक नहीं होना, एक दूसरे के आंतरिक मामलों ने हस्तक्षेप नहीं करना और परस्पर लाभ एवं शांतिपूर्ण सह अस्तित्व के अवसर को बनाए रखना। लेकिन चीन परस्पर व्यापारिक लाभ के सिद्धांतों को छोड़ सब सिद्धातों को नकारता रहा है। लाभ में भी उसकी सीमाएं भारत में अपने उत्पाद बेचकर आर्थिक हित साधना है। चीन सबसे ज्यादा उस सिद्धांत को चुनौती दे रहा है, जो भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से जुड़ा है। यही मनमानी चीन अपने अन्य पड़ोसी देशों के साथ कर रहा है।

भारत के लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारतीय राजनीतिक नेतृत्व ने कभी भी चीन के लोकतांत्रिक मुखौटे में छिपी साम्राज्यवादी मंशा को नहीं समझा। यही वजह रही कि हम चीन की हड़प नीतियों व मंसूबों के विरुद्ध न तो कभी दृढ़ता से खड़े हो पाए और न ही कड़ा रुख अपनाकर विश्व मंच पर अपना विरोध दर्ज करा पाए। अलबत्ता हमारे तीन प्रधानमंत्रियों, जवाहर लाल नेहरू, राजीव गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी ने तिब्बत को चीन का अविभाजित हिस्सा मानने की भी उदारता जताई। इस खुली छूट के चलते ही बड़ी संख्या में तिब्बत में चीनी सैनिकों की घुसपैठ शुरू हुर्ह। इन सैनिकों ने वहां की सांस्कृतिक पहचान, भाषाई तेवर और धार्मिक संस्कारों में पर्याप्त दखलंदाजी कर दुनिया की छत को कब्जा लिया। ग्वादर बंदरगाह के निर्माण की शुरूआत चीन ने ही की थी, लेकिन बाद में पाकिस्तान सरकार ने यह काम सिंगापुर की एक निर्माण कंपनी को दे दिया। धीमी गति से निर्माण होने के कारण पाकिस्तान की बेचैनी बढ़ रही थी। लिहाजा इस अनुबंध को खारिज कर पाकिस्तान के केंद्रीय मंत्रिमंडल ने यह काम चीन के सुपुर्द करने की मंजूरी दे दी। यह सौदा 1331 करोड़ रूपए का है। अब यह बंदरगाह लगभग बनकर तैयार है। चीन ने यहां अपना नौसैनिक अड्रडा भी बना लिया है। अब यहां युद्ध के माहौल में युद्धपोतों की आवाजाही भी बढ़ जाने की आशंका है। यदि इसका उपयोग रक्षा संबंधी मामलों के परिपे्रक्ष्य में होने लग गया तो चीन यहां से मघ्य-पूर्व में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों की भी निगरानी करने लगेगा। गौरतलब है कि बलूचिस्तान में अशांत माहौल होने के बावजूद चीन यहां विकास कार्य करने का जोखिम उठा रहा है। जाहिर है चीन की रणनीतिक मंशा मजबूत है। इस बंदरगाह से चीन शिनचांग प्रांत के लिए तेल और गैस भी ले जा सकता है। लेकिन इस मकसद पूर्ति के लिए उसे मोटी और लंबी पाइपलाइन शिनचांग तक बिछानी होगी। यह काम लंबे समय में पूरा होने वाला जरूर है, किंतु ऐसे चुनौतीपूर्ण कार्यों को चीन अंजाम तक पहुंचाता रहा है।

1999 में चीन ने मालदीव के मराओ द्धीप को गोपनीय ढ़ंग से लीज पर ले लीया था। चीन इसका उपयोग निगरानी अड्डे के रूप में गुपचुप करता रहा। वर्ष 2001 में चीन के प्रधानमंत्री झू राँन्गजी ने मालदीव की यात्रा की तब दुनिया इस जानकारी से वाकिफ हुई कि चीन ने मराओ द्वीप लीज पर ले रखा है और वह इसका इस्तेमाल निगरानी अड्डे के रूप में कर रहा है। इसी तरह चीन ने दक्षिणी श्रीलंका के हंबनतोता बंदरगाह पर एक डीप वाटर पोर्ट बना रखा है। चीन ने श्रीलंका में इस बंदरगाह समेत अन्य विकास कार्यों के लिए 520 अरब रुपए उधार दिए थे। श्रीलंका एक छोटा व कमजोर आर्थिक स्थिति वाला देश है, लिहाजा वह इस राशि को लौटाने में असमर्थ रहा। इसके बदले में चीन ने 99 वर्ष के लिए हंबनतोता बंदरगाह लीज पर ले लिया। भारतीय रणनीतिक क्षेत्र के हिसाब से यह बंदरगाह बेहद महत्वपूर्ण है। यहां से भारत के व्यापारिक और नौसैनिक पोतों की अवाजाही बनी रहती है। बाग्ंलादेश के चटगांव बंदरगाह के विस्तार के लिए चीन करीब 46675 करोड़ रुपए खर्च कर रहा है। इस बंदरगाह से बांग्लादेश का 90 प्रतिशत व्यापार होता है। यहां चीनी युद्धपोतों की मौजदूगी भी बनी रहती है। म्यांमार के बंदरगाह का निर्माण भारतीय कंपनी ने किया था, लेकिन इसका फायदा चीन उठा रहा है। चीन यहां पर तेल और गैस पाइपलाइन बिछा रहा है, जो सितवे गैस क्षेत्र से चीन तक तेल व गैस पहुंचाने का काम करेगी। इन बंदरगाहों के कब्जे से चीन की राजनीतिक व सामरिक पहुंच मध्य-एशिया से होकर पाकिस्तान और मध्य-पूर्व तक लगभग हो गई है। दक्षिण चीन सागर पर चीन ने इतना निर्माण कर लिया है कि वह उसे अपना ही हिस्सा मानने लगा है।

चीन ब्रह्मपुत्र नदी पर एक साथ तीन आलीशान बांधों का निर्माण कर रहा है। ब्रह्मपुत्र नदी भारत के असम और अन्य पूर्वोत्तर क्षेत्र की प्रमुख नदी है। करोड़ों लोगों की आजीविका इसी नदी पर निर्भर है। इन बांधों के निर्माण से भारत को यह आशंका बढ़ी है कि चीन ने कहीं पानी रोक दिया तो नदी सूख जाएगी और नदी से जुड़े लोगों की आजीविका संकट में पड़ जाएगी। एक आशंका यह भी बनी हुई है कि चीन ने यदि बांधों से एकसाथ ज्यादा पानी छोड़ा तो भारत में तबाही की स्थिति बन सकती है और कम छोड़ा तो सूखे की। इस लिहाज से जो जलीय मामलों के विशेषज्ञ हैं, वे चाहते थे कि बांधों का निर्माण रोक दिया जाए। इस मुद्दे पर चीन बस इस बात के लिए राजी हुआ है कि मानसून के दौरान अपने हाइड्रोलॉजिकल स्टेशनों के जल स्तर व जल प्रवाह की जानकारी दिन में दो बार देता रहेगा। तय है, शंकाएं बरकरार रहेंगी।

दरअसल, पंचशील जैसी लोकतंत्रिक अवधारणाएं चीन के लिए उस सिंह की तरह हैं, जो गाय का मुखौटा ओढ़कर धूर्तता से दूसरे प्राणियों का शिकार करते हैं। चेकोस्लोवाकिया, तिब्बत और नेपाल को ऐसे ही मुखौटे लगाकर चीन जैसे साम्यवादी देशों ने बरबाद किया है। पाक आतंकियों को भी चीन, भारत के खिलाफ छायायुद्ध के लिए उकसाता है। दरअसल चीन के साथ दोहरी मुश्किल यह है कि वह, बहुधु्रवीय वैश्विक मंच पर तो अमेरिका से लोहा लेना चाहता है; किंतु एशिया महाद्वीप में चीन एक धु्रवीय वर्चस्व का पक्षधर है। इसलिए जापान और भारत को जब-तब उकसाने की हरकतें करता रहता है। चीन के इन निरंकुश विस्तारवादी मंसूबों से साफ होता है कि इस वामपंथी देश के लिए पड़ोसी देशों की सांस्कृतिक बहुलता, सहिष्णुता, शांति और पारस्परिक समृद्धि से कोई लेना-देना नहीं है।
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This Post Has 2 Comments

  1. Dr. Pramod Pathak

    एक समझना चाहिए की चीनी जनता अपनी पहचान(identity) को लेकर उस की समर्थक है| और उसके रहते अपना प्रभाव फैलाने में उसे कुछ आगेपिछे देखने की आवश्यकता नहीं होती| जैसा हम देखचुके है की साम्यवाद एक ढकोसला रहा है| चीन से निपटने के लिये बातों से नहीं लातों से काम देना होगा| और यह भी ख्याल यांना होगा की हम लाथ मारते है तो हमको भी लगने वाला है| हमे यह देखना होगा की शी अपने पद से हटाया जाय|
    प्रमोद पाठक

  2. RAVINDRA SHUKLA

    अच्छा लेख है।

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