नेपाल में चीनी ड्रेगन का शिकंजा

चीनी राजदूत होऊ यांछी की पिछले तीन महीनों में नेपाल के राजनीतिक नेताओं से मुलाकातों से इतना तो साफ हो गया है कि नेपाल में भारत विरोधी खेल की वे सूत्रधार हैं। नेपाली प्रधानमंत्री ओली तो इस राजदूत महिला के हाथों कठपुतली बन गए हैं। जो कभी भारत के करीब माने जाते थे वे अब चीनी ड्रेगन के पंजे में जकड़ गए हैं।

पिछले साल नवम्बर में जब सीमा के नक्शे को लेकर नेपाल में आक्रोश पैदा हुआ था, तब काफी लोगों को आश्चर्य हुआ। नेपाल तो हमारा मित्र देश है, वहां से ऐसी प्रतिक्रिया का आना विस्मयजनक था। वह बात आई-गई हो पाती, उसके पहले ही लद्दाख में चीनी घुसपैठ की खबरें आने लगीं। उन खबरों के साथ ही नेपाल सरकार ने फिर से सीमा विवाद को उठाना शुरू कर दिया और देखते ही देखते वहां की संसद ने संविधान संशोधन पास करके नया नेपाली नक्शा जारी कर दिया। इस घटनाक्रम से यह जरूर स्पष्ट हुआ कि नेपाल की पीठ पर चीन का हाथ है। यह भी कि किसी योजना के तहत नेपाल सरकार ऐसी हरकतें कर रही है। प्रकारांतर से देश के सेनाध्यक्ष मनोज मुकुंद नरवणे ने इशारों-इशारों में यह बात कही भी कि नेपाल किसी के इशारे पर यह सब कर रहा है।

नक्शा प्रकरण ठंडा पड़ भी नहीं पाया था कि नेपाल के प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली के विरुद्ध उनकी ही नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर से आवाजें उठने लगीं। उनके प्रतिस्पर्धी पुष्प दहल कमल इस अभियान में सबसे आगे हैं, जो ओली के साथ पार्टी अध्यक्ष भी हैं। यानी ओली के पास दो पद हैं। एक प्रधानमंत्री का और दूसरे पार्टी अध्यक्ष का। उनके व्यवहार को लेकर पिछले कुछ महीनों से पार्टी के भीतर हस्ताक्षर अभियान चल रहा था। संभवतः इस अभियान से जनता का ध्यान हटाने के लिए ओली ने भारत के साथ सीमा का विवाद उठाया था।

भारत-विरोधी जहर

जनता की राष्ट्रवादी भावनाओं का गलत तरीके से इस्तेमाल करते हुए उन्होंने भारत के विरुद्ध काफी जहर उगला और जब उनकी ही पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने उनसे सवाल किए, तो उन्होंने कहना शुरू कर दिया कि भारत के साथ मिलकर कुछ लोग मेरे खिलाफ साजिश कर रहे हैं। अपनी बातों के जाल में अब वे बुरी तरह से उलझ गए हैं। उनके प्रतिस्पर्धी पुष्प दहल कमल ने उनसे प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष दोनों पदों से इस्तीफे देने की मांग की है। वे इस्तीफा नहीं देते तो संसद में उनके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाया जा सकता था। इस आशंका को देखते हुए उन्होंने संसद का सत्रावसान करा लिया। राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी उनके खेमे की थीं। उन्होंने संसद के दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों से सलाह किए बगैर सत्रावसान कर दिया। इस बात को लेकर वहां शोर भी हुआ, पर ओली अपनी झोली को बचाने के प्रयास में हर तरह के काम कर रहे हैं।

लगता है कि जब तक ओली और दहल आपसी बातचीत से समझौता नहीं कर लेते, बैठक नहीं होगी। ओली के पास प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष के दो पद हैं। दहल की मांग है कि ओली दोनों से इस्तीफा दें। पार्टी अध्यक्ष के पद पर ओली के साथ दहल भी सुशोभित हैं। पार्टी की स्थायी समिति के 44 में से 30 सदस्य ओली के खिलाफ हैं। यानी बैठक हुई तो ओली को अध्यक्ष पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी।

स्थायी समिति की बैठक की संभावनाओं को देखते हुए ओली दबाव में आ गए हैं। उन्होंने समझौते की कोशिशें भी शुरू कर दी हैं। दूसरी तरफ स्थायी समिति की बैठकों को टाला जा रहा है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक यह बैठक शुक्रवार तक के लिए टाल दी गई है, पर राजनीतिक संकट खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। तीन महीने से चल रही राजनीतिक कशमकश निर्णायक मोड़ पर आती दिखाई पड़ रही है, पर यह मोड़ क्या होगा, यह अभी साफ नहीं है।

तीन-चार संभावित रास्ते दिखाई पड़ रहे हैं। एक, ओली अध्यक्ष पद छोड़ दें और प्रधानमंत्री बने रहें। दूसरे वे अध्यक्ष बने रहें और प्रधानमंत्री पद छोड़ें। तीसरा रास्ता है, पार्टी का विभाजन। पार्टी में विभाजन हुआ, तब देश फिर से बहुदलीय असमंजस का शिकार हो जाएगा और नेपाली कांग्रेस की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाएगी। इन सब बातों की पृष्ठभूमि में परीक्षा इस बात की भी है कि क्या भारत-विरोध की राजनीति नेपाल में सफल हो सकती है?

चीनी राजदूत की भूमिका

विदेश-नीति के मोर्चे पर के पी एस ओली की सरपट चाल के उलट परिणाम अब सामने आ रहे हैं। पुष्प दहल के साथ समझौता करके क्या वे अपनी सरकार बचा लेंगे? हालांकि यह बात मुश्किल लगती है, पर ऐसा हुआ भी तो यह स्थायी हल नहीं है। उनके सामने विसंगतियां कतार लगाए खड़ी हैं। उन पर आए संकट को टालने में नेपाल स्थित चीनी राजदूत होऊ यांछी के हड़बड़ प्रयास भी चर्चा का विषय बने हैं।

चीनी राजदूत ने पिछले तीन महीनों में देश के राजनीतिक नेताओं से मुलाकात करके समाधान की जो कोशिशें कीं, उससे इतना साफ हुआ कि चीन खुलकर नेपाली राजनीति में हस्तक्षेप कर रहा है। उन्होंने 3 जुलाई को राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी से भी मुलाकात की, जो खुद इस टकराव में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। औपचारिक शिष्टाचार के अनुसार ऐसी मुलाकातों के समय विदेश मंत्रालय के अधिकारियों को भी उपस्थित रहना चाहिए, पर ऐसा हुआ नहीं। पता नहीं उन्हें जानकारी थी भी या नहीं।

इसके पहले चीन की राजदूत होऊ ने अप्रैल और मई में भी हस्तक्षेप करके पार्टी को विभाजन के रास्ते पर जाने से बचाया था। बताया जाता है कि ओली ने भारतीय सीमा के नक्शे को लेकर जो वितंडा खड़ा किया था, उसकी सलाह भी चीन की इसी महिला राजदूत ने दी थी। ओली की चीन-मुखी विदेश नीति को लेकर भी अब सवाल उठने लगे हैं। मंगलवार को नेपाली कांग्रेस और जसपा की बैठक शेर बहादुर देउबा के निवास पर हुई, जिसमें विदेश नीति के झुकाव और लोकतांत्रिक संस्थाओं के क्षरण पर नाराजगी व्यक्त की गई।

साजिश का आरोप

संभव है कि कोई रास्ता निकल आए, पर इस राजनीति में भारत का नाम जिस तरह से लिया गया है, उस पर ध्यान देने की जरूरत है। नेपाल की राजनीति में भारत की भूमिका हमेशा से रही है, पर इस वक्त चीन की भूमिका के कारण भारत का संदर्भ बेहद महत्वपूर्ण हो गया है। शनिवार 4 जुलाई को उधर ओली ने यह कहकर मामले को उलझा दिया कि भारत के साथ मिलकर मुझे अपदस्थ करने और राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी के खिलाफ महाभियोग लाने की साजिश की जा रही है।

ओली ने इसके पहले दावा किया था कि उन्हें सत्ता से हटाने के लिए ’दूतावासों और होटलों’ में कई तरह की गतिविधियां चल रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जब से हमने लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को नेपाल में दर्शाता नया मानचित्र जारी किया है, हमारी सरकार के खिलाफ साजिश रची जा रही है, जिसमें नेपाली नेता भी शामिल हैं। यह बात वे बार-बार कह रहे हैं। इस वजह से पुष्प दहल कमल ने उनसे कहा कि वे या तो अपने आरोप को साबित करें या पद से इस्तीफा दें। दहल ने एक सभा में कहा, आपसे इस्तीफा भारत ने नहीं, हमने मांगा है। ज्यादातर वरिष्ठ नेता प्रचंड के साथ हैं। इनमें दूसरे वरिष्ठ नेता माधव कुमार नेपाल और झालानाथ खनाल भी शामिल हैं। नेपाल की संघीय संसद में मान्यता प्राप्त चार राजनीतिक दल हैं। नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी, नेपाली कांग्रेस, समाजवादी पार्टी नेपाल और राष्ट्रीय जनता पार्टी नेपाल।

चीनी हितों की रक्षा

जब तक देश में राजतंत्र था, राजा के मार्फत ही नेपाल के साथ चीन संवाद करता था। पर 2008 में राजतंत्र की समाप्ति के बाद जब माओवादी सत्ता में आए, तो चीन के संपर्क का तरीका बदल गया। उसने नेपाल की राजनीति में सीधे हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया। फरवरी 2018 में कम्युनिस्ट गठबंधन की सरकार बनने के बाद नेपाल ने चीन के साथ व्यापार और पारगमन संधि की, जिससे उसकी भारत पर निर्भरता खत्म हो गई। इस दौरान राजनीतिक नेताओं और पत्रकारों को चीन यात्राएं कराई गईं और पार्टी के स्तर पर प्रशिक्षण के कार्यक्रम चलाए गए।

अक्टूबर 2019 में चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की नेपाल यात्रा के ठीक पहले नेपाल और चीन की कम्युनिस्ट पार्टियों ने शी चिनफिंग के विचार-दर्शन पर एक संगोष्ठी का आयोजन भी किया था। चीन ने नेपाल के इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश की योजनाएं बनाई हैं। दूसरी तरफ चीन ने कम्युनिस्ट पार्टियों के अलावा देश के दूसरे राजनीतिक दलों के साथ भी रिश्ते बनाकर रखे हैं। नेपाली कांग्रेस और भारत से लगे तराई के इलाके में सक्रिय मधेशी दलों के साथ भी उसका संपर्क है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी अब वैचारिक आधार पर रिश्ते नहीं बनाती है, बल्कि उसकी दिलचस्पी अपने राष्ट्रीय हित में ज्यादा है।
पचास के दशक से लेकर नब्बे के दशक तक देश में नेपाली कांग्रेस का वर्चस्व रहा। पर धीरे-धीरे देश में माओवाद का प्रवेश हुआ और अंततः उनका लोकतांत्रिक प्रक्रिया में प्रवेश हुआ। अक्टूबर 2017 में नेपाल के संसदीय चुनाव के ठीक पहले के पी एस ओली की एकीकृत मार्क्सवादी लेनिनवादी कम्युनिस्ट पार्टी और पुष्प दहल कमल के माओवादी सेंटर ने जब चुनाव गठबंधन किया, तब उसकी एकता को लेकर कई तरह के संदेह थे, पर चुनाव में सफलता मिलने के बाद वे संदेह दूर हो गए। इसके बाद के पी एस ओली देश के प्रधानमंत्री बने और उसके दो महीने बाद ही मई 2018 में दोनों पार्टियों का विलय हो गया।

सन 2015 में संविधान बन जाने के बाद से ज्यादातर समय के पी एस ओली देश के प्रधानमंत्री पद पर रहे हैं। इस बीच पुष्प दहल कमल और शेर बहादुर देउबा को भी प्रधानमंत्री बनने का मौका मिला है, पर 2017 के चुनाव के बाद फरवरी 2018 में प्रधानमंत्री बनने के बाद से ओली इस पद पर हैं। शुरू में उन्हें भारत के करीब माना जाता था, पर इस वक्त वे चीन के करीब माने जाते हैं।

चीन के साथ रिश्ते बनाए रखने में तो ओली सफल रहे, पर लम्बे अरसे से सत्ता में रहने के कारण उनके व्यक्तित्व में अकड़ पैदा हो गई और पार्टी के भीतर उनकी पकड़ कम होती गई। करीब तीन दशक तक माओवादी राजनीति में तपे हुए पुष्प दहल की महत्वाकांक्षाएं भी जोर मार रही हैं। ओली ने केवल पुष्प दहल की ही अनदेखी नहीं की। माधव कुमार नेपाल और झालानाथ खनाल जैसे वरिष्ठ नेताओं को भी हाशिए पर पहुंचा दिया। ये दोनों नेता पूर्ववर्ती एकीकृत मार्क्सवादी लेनिनवादी पार्टी से जुड़े रहे हैं। अब वे दहल के साथ खड़े हैं। वरिष्ठ नेता वामदेव गौतम भी ओली से नाराज हैं।
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